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खानपान को पौष्टिक तत्त्वों से भरपूर बनाएगा जैव-सुदृढ़ीकरण

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  June 13, 2017

अब अधिक पौष्टिकता वाली फसलों की किस्मों का विकास करने के लिए कृषि क्षेत्र के शोधकर्ता जैव-सुदृढ़ीकरण पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। सरल शब्दों में कहें तो इस अवधारणा का मतलब खाद्य फसलों में अंतर्निहित पौष्टिक सामग्री को परंपरागत प्लांट ब्रीदिंग तकनीक, आधुनिक दौर की जैव-प्रौद्योगिकी या कृषिविज्ञान के तौर-तरीकों से समुन्नत करने से है। इसमें वैज्ञानिक सामान्य तौर पर रोजमर्रा के खानपान में शामिल उन खाद्य उत्पादों की ही पौष्टिकता बढ़ाने पर ध्यान देते हैं जिनमें अत्यावश्यक खनिज और विटामिन जैसे पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में नहीं होते हैं। इन कमियों को दूर करना और भोज्य पदार्थों की पोषकता बढ़ाकर उन्हें स्वास्थ्यप्रद बनाना ही इसका मकसद है। इन अनुसंधानों से शारीरिक दुर्बलताओं को दूर करने, बेहतर स्वास्थ्य हासिल करने और उपभोक्ताओं की उत्पादकता में वृद्धि जैसे फायदे होते हैं। इससे होने वाले फायदे इतने अधिक हैं कि ये वैज्ञानिक अनुसंधानों पर होने वाले खर्च पर भी भारी पड़ते हैं। 

 
हालांकि जैव-सुदृढ़ीकरण का मतलब प्रसंस्कृत एवं डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के साथ स्वास्थ्यवद्र्धक अनुपूरक लेकर सुदृढ़ता हासिल करने से बिल्कुल अलग है। पौधों की जेनेटिक संरचना को बदलकर इसकी उत्पादकता को अधिक स्वास्थ्यकर एवं पौष्टिक बनाना ही जैव-सुदृढ़ीकरण है। दुनिया भर में इसे बड़े पैमाने पर फैली कुपोषण की समस्या के खिलाफ सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। कुपोषण की वजह से न केवल गरीब एवं अपर्याप्त भोजन करने वाले लोग बल्कि अच्छा-खासा खाने वाले लोगों की भी सेहत खराब रहती है और उनका शारीरिक विकास बाधित होता है। इस तरह जैव-सुदृढ़ीकरण भारत और अन्य विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर फैली 'प्रच्छन्न भूख' यानी पौष्टिक खानपान की कमी से निपटने का कारगर तरीका हो सकता है। 
 
पोषण के बारे में हुए विभिन्न अध्ययनों ने असंतुलित भोजन की वजह से पैदा होने वाली प्रच्छन्न भूख की समस्या को स्वीकार किया है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आईएफपीआरआई) के हरेक साल जारी होने वाले वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) में यह समस्या और भी अधिक तीव्रता से सामने आती है। पिछले साल के अंत में जारी नवीनतम भूख सूचकांक में भारत को 118 देशों की सूची में काफी नीचे 97वां स्थान दिया गया था। अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत इस सूची में अपने पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल से भी नीचे है।
 
वैश्विक भूख सूचकांक मूलत: कम-पोषित जनसंख्या की हिस्सेदारी, पांच साल से कम उम्र के कमजोर एवं अविकसित बच्चों की संख्या और बाल मृत्यु दर जैसे मानकों पर आधारित होता है। इस पैमाने पर भारत का खराब प्रदर्शन विशेष चिंता की बात है क्योंकि देश लंबे समय पहले खाद्य पदार्थों के मामले में आत्म-निर्भर हो चुका है और खाद्य सुरक्षा कानून के तहत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सहयोग कार्यक्रम भी चला रहा है। निश्चित तौर पर इसके लिए खाने की कमी को दोष नहीं दिया जा सकता है। दरअसल भारत में मिलने वाले खाद्य पदार्थ ही पोषण के स्तर पर इतने निम्न हैं कि अच्छा खाने वाला इंसान भी कुपोषित और कमजोर हो सकता है। ऐसी स्थिति में इसका समाधान सामान्य खाद्य उत्पादों की पोषकता बढ़ाने में निहित है ताकि लोगों को पर्याप्त मात्रा में जरूरी पोषक तत्त्व मिल सकें।
 
वैश्विक रुझान के अनुरूप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने भी फसलों की 'पोषण से भरपूर' किस्मों के विकास पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। इसका मकसद पोषण के लिहाज से उन्नत खाद्य उत्पाद तैयार करना है जो किफायती दाम पर आम लोगों की पहुंच में भी हों। अतीत में फसल उत्पादकों का सबसे ज्यादा जोर फसल का उत्पादन बढ़ाने पर रहा है लेकिन अब पोषण सुरक्षा हासिल करने के लिए फसल किस्मों की पोषकता बढ़ाना मुख्य लक्ष्य बन चुका है। इस क्षेत्र में भारत पहले ही कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल कर चुका है।
 
हाल के दिनों में विकसित डब्ल्यूबी-2 और एचपीबीडब्ल्यू 01 जैसी गेहूं की कुछ किस्मों में जिंक की मात्रा 42 पीपीएम होती है जबकि सामान्य गेहूं में यह 28 से 30 पीपीएम ही होता है। आम तौर पर चावल में जिंक की मात्रा गेहूं की तुलना में कम होती है लेकिन डीआरआर धान-45 और छत्तीसगढ़ जिंक राइस-1 जैसी किस्मों में इस जरूरी खनिज की मात्रा को बढ़ाकर 22 पीपीएम तक ले जाने में कामयाबी मिली है।
 
जैव-सुदृढ़ीकरण के माध्यम से चावल में प्रोटीन की मात्रा को भी बढ़ाया जा चुका है। हीरा और सीआर धान-45 जैसी धान की किस्मों में प्रोटीन का अनुपात 10 से लेकर 12 फीसदी तक बढ़ाया जा चुका है। इन बदलावों के बाद पौष्टिक गुणवत्ता के मामले में चावल भी काफी हद तक गेहूं के करीब पहुंच गया है। मक्के में लाइसिन और ट्रिप्टोफैन जैसे उच्च गुणवत्ता वाले अमिनो अम्ल को समाहित करने की कोशिशें की जा रही हैं। आईसीएआर ने गुणवत्तापरक प्रोटीन मक्का विकास कार्यक्रम के तहत नई किस्में विकसित की हैं।
 
वैश्विक स्तर पर कृषि शोध में पोषक गुणवत्ता पर ध्यान देने के लिए हार्वेस्टप्लस नाम से एक पहल चल रही है। यह पहल खनिजों और विटामिनों से भरपूर खाद्यान्नों के विकास की अगुआई कर रही है। हैदराबाद का अंतरराष्ट्रीय अद्र्धशुष्क उष्ण कटिबंधीय फसल शोध संस्थान भी इस अभियान में अपना योगदान कर रहा है। इस पहल के जरिये खाद्य फसलों में विटामिन ए, जिंक और लौह तत्त्वों की मात्रा बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। खानपान के जरिये लोगों को सही पोषण मुहैया कराने की इस मुहिम की कामयाबी ही यह तय करेगी कि भारत और दुनिया के अन्य देशों में बड़े पैमाने पर विद्यमान पौष्टिक खानपान की समस्या से किस हद तक निपट पा रहे हैं।
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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