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अब साइबर बीमा को भी देनी होगी प्राथमिकता

भार्गव दासगुप्ता /  June 13, 2017

कॉर्पोरेट जगत को बीमा कंपनियों के साथ मिलकर साइबर सुरक्षा से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। इस खतरे के कारोबारी पहलू की पड़ताल कर रहे हैं भार्गव दासगुप्ता

साइबर अपराध एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में रैन्समवेयर हमले 'वानाक्राई' ने दुनिया भर के लाखों उपभोक्ताओं और कंपनियों को अपनी चपेट में लिया था। इस साइबर हमले की जद में 150 से अधिक देशों के 2 लाख से भी अधिक कंप्यूटर आ गए। निशाने पर आए लोगों और कंपनियों को फिरौती देने के लिए कहा गया और वे साइबर अपराधियों के रहमो-करम पर रहने के लिए मजबूर हो गए।

 
हालांकि इस घटना ने साइबर अपराध के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है लेकिन यह तो साइबर दुनिया के लिए रोजमर्रा की बात बन चुका है। वर्ष 2016 में पूरी दुनिया में रोजाना रैन्समवेयर के 4,000 से भी अधिक हमले हुए। इसके पहले वर्ष 2015 में रैन्समवेयर के करीब 1,000 मामले ही आए थे। साइबर अपराधों से पिछले साल कारोबारी जगत को 30 खरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा था और विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा आने वाले दिनों में 210 खरब डॉलर के हैरतअंगेज स्तर तक जा सकता है। चिंता की बात यह है कि अभी तक कंप्यूटरों को ही निशाना बनाते आ रहे साइबर मालवेयर की चपेट में अब स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट भी आने लगे हैं। भारतीय कंपनियां और उपभोक्ता भी समान रूप से खतरे में हैं। 
 
रैन्समवेयर हमले के आसपास ही करीब 1.7 करोड़ उपभोक्ताओं से संबंधित जानकारियां एक प्रमुख खानपान पोर्टल से चुरा ली गई थीं। आंकड़ों के कूटबद्ध रूप में रखे होने के बावजूद ऐसा हुआ। हम इसके पहले अक्टूबर 2016 में भी 32 लाख डेबिट कार्ड उपभोक्ताओं से जुड़ी सूचनाएं लीक होने का वाकया देख चुके हैं। साइबर हमलों की जद में सभी तरह के उद्योग और छोड़ी-बड़ी कंपनियां आती हैं। वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल, वित्तीय सेवाएं और खुदरा कारोबार साइबर हमलों के सर्वाधिक शिकार होते रहे हैं। भारत के मामले में साइबर हमलों का असर विभिन्न तरह के उद्योगों पर देखा गया है, भले ही वह उपभोक्ताओं से सीधे संपर्क रखने वाला हो या न हो। वित्तीय सेवाएं, औषधि, तेल एवं गैस के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र साइबर हमलों के प्रमुख निशाना रहे हैं। 
 
हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक भारतीय प्रबंधक साइबर हमलों को अपने संगठन के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में तो स्वीकार करते हैं लेकिन कम कंपनियों ने ही इसे अपने एजेंडा में जगह दी है। चार में से तीन कंपनियां साइबर हमलों के खतरे को लेकर विस्तृत आकलन तक नहीं कराती हैं और न ही उनके पास किसी हमले की सूरत में उससे निपटने की कोई योजना ही तैयार होती है। इससे पता चलता है कि भारतीय कंपनी जगत साइबर अपराध से होने वाले भारी कारोबारी नुकसान को लेकर काफी हद तक बेपरवाह है। इसके बावजूद बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, बीमा और आईटी क्षेत्र के कुछ संगठन सशक्त साइबर सुरक्षा ढांचा तैयार करने में लगे हुए हैं। हालांकि इन कंपनियों को भी अपने साझेदारों और वेंडरों की अपर्याप्त सुरक्षा तैयारी के चलते खतरा बना हुआ है। साइबर हैकर इस तरह की कंपनियों के सिस्टम और नेटवर्क में दाखिल होने के लिए उनके सहयोगियों के नेटवर्क का इस्तेमाल मोहरे के तौर पर करते हैं। 
 
चिंता का दूसरा कारण वह डाटा है जो क्लाउड स्टोरेज में रखा रहता है। क्लाउड कंप्यूटिंग की मांग पर डाटा साझा करने की प्रकृति भी नए तरह के सुरक्षा खतरों को जन्म देती है। एक क्लाउड परिवेश को भी परंपरागत कॉर्पोरेट नेटवर्क की ही तरह खतरा होता है लेकिन क्लाउड सर्वर पर सुरक्षित रखे डाटा की विशाल संख्या के चलते सेवा प्रदाता कंपनियां साइबर हमले की संभावित शिकार होती हैं।
 
साइबर जोखिम को आज के दौर में कारोबार के लिए एक गंभीर खतरे के तौर पर देखा जाता है लेकिन साइबर बीमा में निवेश का स्तर बहुत निम्न है। वैश्विक स्तर पर साइबर बीमा बाजार करीब 4 अरब डॉलर का है और इसके वर्ष 2025 तक बढ़कर 20 अरब डॉलर हो जाने का अनुमान है। इसकी तुलना में भारत में साइबर बीमा का बाजार 30 करोड़ रुपये ही है और वर्ष 2020 तक इसके 75 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। हालांकि इन पूर्वानुमानों में काफी उछाल का रुख दिखता है लेकिन नई प्रौद्योगिकी के दौर में तकनीक से जुड़े जोखिमों के भी आकार और आवृत्ति में बढऩे के मद्देनजर यह कोई खास नहीं है। इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि नए दौर का जोखिम आगजनी या पानी में सामान डूबने जैसे परंपरागत सुरक्षा जोखिमों से एकदम अलग है। यह न तो किसी एक परिपाटी तक सीमित है और न ही एक खास तरह के सुरक्षात्मक उपायों से इसे रोका ही जा सकता है।
 
बीमा कंपनियां नए युग के इस आक्रमण से निपटने के लिए तैयारी में जुट गई हैं। वे कारोबारी कंपनियों को परामर्श, संचार और भविष्योन्मुखी समाधान मुहैया कराने में जुड़कर अपनी भूमिका का विस्तार कर रही हैं। इसके अलावा उद्योग जगत के अगुआ इस तकनीकी एवं साइबर दौर में जोखिमों को कम करने से संबंधित सुझावों को परिभाषित करने एवं उसका मसौदा तैयार करने के लिए विश्व आर्थिक मंच जैसे मंचों के जरिये एक साथ आ रहे हैं। उद्योग जगत पहले ही यह प्रदर्शित कर चुका है कि यह सुरक्षा में दरार के पहले और बाद की स्थिति में परामर्श का स्रोत हो सकता है। 
 
मसलन, अतीत में कई रैन्समवेयर हमलों से जुड़े मामलों को देख चुकी बीमा कंपनियां वानाक्राई हमले के समय इस स्थिति में थीं कि वे अपनी कानूनी, संचार और सुरक्षा टीमों के सहयोग से उन्हें इस खतरे से निपटने में मदद कर सकें। उत्पाद के मोर्चे पर भी साइबर बीमा में समय के साथ बढ़ोतरी हुई है। पहला इंटरनेट बीमा कवर 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में सामने आया था। उस समय ऑनलाइन सामग्री की सुरक्षा के लिए इस तरह का बीमा लिया जा रहा था लेकिन उनका कवर काफी सीमित होता था। अमेरिका में डाटा निजता कानून के अमल में आने के साथ ही अपनी तरह के अनूठे साइबर बीमा उत्पाद की शुरुआत की गई।
 
मौजूदा समय में इस बीमा पॉलिसी के तहत प्रमुख रूप से साइबर हमले से होने वाले नुकसान और कानूनी लागत को कवर किया जाता है। इसमें साइबर हमले से छवि पर पडऩे वाले असर को कम करने के लिए उठाये जाने वाले कदमों और उपभोक्ताओं को खतरे के प्रति जागरूक करने के अलावा प्रभावित उपभोक्ताओं के लिए क्रेडिट निगरानी सेवाएं देने के लिए भी प्रावधान होता है। इसके अलावा पॉलिसी में फॉरेंसिक पड़ताल और गुम हो चुके डाटा को दोबारा तैयार करने में लगने वाले खर्च को भी कवर किया जाता है। वानाक्राई की तरह साइबर फिरौती मांगे जाने की स्थिति में साइबर बीमा पॉलिसी उस रकम का भी भुगतान करेगी। इसके अलावा इस पूरे मामले को देखने वाले विशेषज्ञों का मेहनताना भी पॉलिसी में कवर होता है। अगर साइबर हमले की वजह से कंपनी अपनी सेवाएं नहीं दे पा रही है तो उससे होने वाला नुकसान भी पॉलिसी के दायरे में आएगा।
 
साइबर हमलों का जोखिम बढऩे के साथ बीमा कंपनियां भी इन हमलों से होने वाले नुकसान को कवर करने लगी हैं। हमले के चलते उपभोक्ताओं के कम होने से कमाई में होने वाले नुकसान को भी अब इस तरह की पॉलिसी के दायरे में लाया जाने लगा है। अब साइबर हमलों से उत्पन्न हालात के लिए समग्र कानून बन चुका है लिहाजा बीमा कंपनियां इन नियामकीय जरूरतों के अनुरूप खुद को तैयार कर रही हैं। आगे चलकर साइबर हमलों की संख्या बढऩे की आशंकाएं हैं। ऐसी स्थिति में कॉर्पोरेट जगत और बीमा कंपनियों को इन खतरों से निपटने के लिए एक साथ आना पड़ेगा। बीमा कंपनियों के लिए तो यह नए दौर की नवाचार-परक अर्थव्यवस्था में जोखिम प्रबंधन की स्थिति में पहुंचकर अपना कारोबार बढ़ाने का यह एक और मौका है। 
 
(लेखक आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)
Keyword: cyber security, india, insurance,,
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