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पुनर्गठन जरूरी

संपादकीय /  June 13, 2017

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ऐसे समय से गुजर रही है जब उसके पास राहत की सांस लेने का वक्त है। दरअसल निकट भविष्य में उसके सामने कोई चुनाव नहीं है। सवाल यह है कि इस अवसर का लाभ वह कैसे उठाने वाली है? सरकार ने हाल ही में कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे किए हैं और उसके तत्काल बाद यह अवसर उसके सामने है और 2019 में नियत अगला आम चुनाव दो साल दूर है। सरकार ने हाल में संपन्न कुछ विधानसभा चुनावों में अच्छी जीत हासिल की है लेकिन आने वाले दिनों में उसके समक्ष कई आर्थिक चिंताएं सर उठाने जा रही हैं। 

 
यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उचित वक्त है कि वह अपनी टीम के प्रदर्शन का आकलन करें और मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करें। आगामी 17 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव भी होना है लेकिन उसका सत्ताधारी दल के आंतरिक समन्वय और प्रबंधन से कोई संबंध नहीं है। प्रधानमंत्री के समक्ष मंत्रिमंडल में फेरबदल करने की कई वजह मौजूद हैं। सबसे अहम यह है कि अरुण जेटली को दो महत्त्वपूर्ण मंत्रालय एक साथ संभालने पड़ रहे हैं। मनोहर पर्रिकर के दोबारा गोवा के मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद से जेटली वित्त मंत्रालय के अलावा रक्षा मंत्रालय का काम भी संभाल रहे हैं। ऐसे में जाहिर सी बात है कि वह दोनों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि दोनों जगह ढेर सारा काम लंबित है। रक्षा तैयारी की बात करें तो देश के समक्ष तमाम चुनौतियां हैं। खासतौर पर पश्चिमी सीमा पर। नीतिगत दृष्टिï से भी यह अहम समय है क्योंकि भारत अपनी रक्षा विनिर्माण व्यवस्था को मजबूत करने में लगा है और उसे कई अहम खरीद मुद्दों पर निर्णय लेना है। 
 
वित्तीय मोर्चे की बात करें तो सरकार के जिम्मे नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था यानी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू कराने का महती कार्य है। अर्थव्यवस्था में मंदी की समस्या भी पिछले एक साल से परेशान कर रही है। उससे निपटना भी एक बड़ी चुनौती है। यहां पर सबसे अहम बात है अर्थव्यवस्था में निजी निवेश में इजाफा करना। जाहिर सी बात है कि दोनों मंत्रालयों पर पूरा ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इसके साथ कंपनी मामलों का मंत्रालय भी जेटली के ही हवाले है। 
 
इसके अलावा कई अहम मंत्रालयों का जिम्मा ऐसे मंत्रियों के पास है जो मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं हैं। मसलन, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी निर्मला सीतारामन के पास है जो कि स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री हैं। इसी तरह स्वतंत्र प्रभार वाले एक अन्य राज्य मंत्री पीयूष गोयल के पास चार मंत्रालयों- ऊर्जा, कोयला, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा और खान का दायित्व है। धर्मेंद्र प्रधान पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं। ये सभी मंत्रालय काफी अहम होने के बावजूद ऐसे मंत्रियों के हवाले हैं जो नीति-निर्माण की केंद्रीय इकाई मंत्रिमंडल में शामिल ही नहीं हैं। इसके अलावा भारतीय विकास का इंजन माने जाने वाले छोटे एवं मझोले उद्यम का महत्त्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे कलराज मिश्रा जल्द ही 76 साल के होने जा रहे हैं। यह अपने मंत्रियों की सेवानिवृत्ति के लिए प्रधानमंत्री की तरफ से तय उम्र सीमा से भी अधिक है। आखिर में, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अगर मंत्रिपरिषद में जवाबदेही को सुनिश्चित किया जाना है तो मंत्रिमंडल का पुनर्गठन जरूरी है। प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय विभिन्न मंत्रियों के कामकाज का परीक्षण कर रहा है जो कि एक स्वागत योग्य कदम है। हालांकि पुनर्गठन को लंबे समय तक लटकाए रखना बुद्धिमानी भरा फैसला नहीं होगा।
Keyword: narendra modi, development,,
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