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बंधक बनाना सेना का काम नहीं मत अपनाएं पुलिस के तौर-तरीके

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  June 12, 2017

देश में सार्वजनिक बहस की परंपरा अब भी मजबूत है। यही वजह है कि कश्मीर के बडगाम जिले में तैनात सैन्य अधिकारी मेजर नितिन लीतुल गोगोई द्वारा एक निर्दोष व्यक्ति को पथराव करती भीड़ के सामने मानव कवच की तरह इस्तेमाल करने और इस क्रम में अपनी जीप में बांधने की आलोचना जारी है। वह भी तब जब सरकार इसे उचित ठहरा चुकी है। यह बहस महत्त्वपूर्ण है। यहां कोई ऐसी घटना बहस में नहीं है जिसमें अत्यधिक तनाव के चलते ऐसा कदम उठा लिया गया हो। बल्कि सरकार और सेना द्वारा सार्वजनिक रूप से अधिकारी के कदम का बचाव होने से यह प्रश्न एक अलग रूप में हमारे सामने है: क्या गोगोई का कदम उन मूल्यों और सिद्धांतों के अनुरूप है जिनका पालन सैन्य प्रतिष्ठान करता है।

 
सरकारी अधिकारियों और सेना प्रमुख ने शुरुआत से गोगोई की इस बात का समर्थन किया कि उनके पास निर्वाचन कर्मियों को सुरक्षित निकालने का इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने कहा कि उनकी जिंदगी को भीड़ से खतरा था जो मतदान में बाधा पहुंचाना चाहती थी। पत्थरबाजों के बीच से निकलने के लिए गोगोई ने फारूख अहमद डार नामक एक निर्दोष को उठाया और जीप के बोनट से बांध दिया। डार वोट देकर निकले ही थे। रिकॉर्डिंग बताती हैं कि गोगोई लाउडस्पीकर पर कह रहे थे कि पत्थर फेंकने वालों का हश्र भी डार जैसा होगा। डार को घंटों घुमाने के बाद रिहा कर दिया गया।
 
ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। सेना की छवि को धक्का पहुंचा। जिस बात के लिए अलगाववादी सेना की आलोचना करते हैं वह वीडियो में कैद थी। आमतौर पर साफ सुथरी छवि वाली सेना के लिए यह गहरा धक्का था। गोगोई के पक्ष में सबसे दमदार दलील यह दी गई कि ऐसा करके उन्होंने कई जानें बचाईं। उनके हिमायतियों में अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत शामिल थे। एक ओर जहां एक सैन्य अदालत मामले की जांच कर रही है, वहीं गोगोई की प्रशस्ति की जाने लगी। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने एक आलेख में कहा कि जब मेजर नितिन गोगोई ने एक आम आदमी को मानव कवच बनाकर पत्थरबाजों से अपने जवानों की रक्षा करने का निर्णय लिया तब वह केवल एक खतरनाक माहौल में एक कड़ा फैसला ले रहे थे।
 
यहां दो सवाल उठते हैं। पहली बात, यह चिंता का विषय है कि सेना को खुद सेना प्रमुख की ओर से प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वह सेना के बजाय पुलिस बल की तरह व्यवहार करे। सैन्य नियमों और सेना की परिचालन प्रक्रिया के मुताबिक सेना लोगों की जान बचाने का प्रयास करने के बजाय गोली चलाने का प्रशिक्षण होता है। वह एक व्यक्ति को बंधक बनाने के बजाय भीड़ के सर के ऊपर से गोलीबारी कर सकती थी। गोगोई को भीड़ को चेतावनी देनी चाहिए थी और फिर भी बात न मानने पर सीमित गोलीबारी की जा सकती थी। यही सही होता। सेना का यही नियम है और यह हर अधिकारी को पता है। गोगोई ने मानव कवच बनाकर प्रदर्शनकारियों की जान भले ही बचाई लेकिन उन्होंने सेना की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचाया। सेना को आत्मावलोकन करना चाहिए कि आखिर बड़ा नुकसान क्या है? सेना की छवि और विश्वसनीयता गंवाना या भीड़ पर गोलीबारी करना?
 
आखिर विद्रोहियों के इलाके में जान बचाने की दलील का क्या तुक है? क्या सेना प्रमुख तब भी यही दलील देंगे जब कोई अधिकारी किसी आतंकी की दो साल की बच्ची के माथे पर बंदूक टिकाकर उसकी पत्नी से कहे कि पति को समर्पण के लिए बाहर निकालो? वैसा करने से भी तो जान बचेगी। सेना प्रमुख ने हाल ही में संवाद समिति पीटीआई को दिए साक्षात्कार में कहा कि कश्मीर में एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है और छद्म युद्ध हमेशा गलत होता है। इसे लडऩे का तरीका गंदा होता है। ऐसे में कई बार नए तरीके अपनाने होते हैं। उन्होंने कहा कि गंदी लड़ाई नए तरीकों से लड़ी जाती है।
 
क्या यह सरकार की नीति है? क्या कश्मीर में सेना के आतंक विरोधी कदमों में सेना के बजाय पुलिसिया या खुफिया विभाग की झलक दिखेगी? क्या सरकार ने दो वरिष्ठ अधिकारियों की जगह जनरल रावत को सेना प्रमुख इसी इरादे से बनाया? अनौपचारिक बातचीत में सेना के प्रवक्ता ने कहा कि जनरल रावत को उस वक्त  सेना प्रमुख इसलिए बनाया गया था क्योंकि उन्हें कश्मीर का लंबा अनुभव था। क्या इसका मतलब यह हुआ कि वे असैन्य तरीके अपनाकर परिणाम हासिल करें? सेना नगालैंड, मिजोरम, असम और मणिपुर में भी विद्रोह से सफलतापूर्वक निपटी है और इस दौरान उसे अपने सैन्य चरित्र की कुर्बानी कभी नहीं देनी पड़ी। कश्मीर में भी अलगाववादी आंदोलन के शुरुआती दो दशक में ऐसा ही हुआ। वहां सफलतापूर्वक राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने में मदद मिली। 
 
वर्ष 2009 से जब कश्मीर में विरोध प्रदर्शन आतंकियों से आम जनता की ओर स्थानांतरित होने लगा। सेना इस नए माहौल से निपटने की अभ्यस्त नहीं थी। जनरल रावत ने पीटीआई को जो साक्षात्कार दिया उससे भी यह बात साबित होती है। उन्होंने कहा, 'काश ये लोग हम पर पत्थर फेंकने के बजाय गोली चलाते। तब मुझे खुशी होती। तब मैं वह कर पाता जो करना चाहता हूं।'
 
बहरहाल हालात ऐसे हैं कि सेना को बड़े पैमाने पर वह करना होगा जो वह नहीं करना चाहती। यानी निहत्थे, पत्थर फेंकने वाले हिंसात्मक विरोध प्रदर्शन का सामना। उसकी सबसे अहम चुनौती होगी बिना अपने युद्घ मूल्यों का ह्रïास किए ये काम करना। दरअसल सेना को राजनीतिक विफलताओं की भरपाई करनी होती है। यह अपने आप में एक बड़ा दबाव है उस पर। जैसा कि हाल के दिनों में सेना के सबसे विचारशील कमांडरों में से लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डïा ने गोगोई से जुड़े घटनाक्रम के बारे में कहा, 'राजनीतिक दबाव तो होगा। यह तो लोकतंत्र की प्रकृति है और जनमानस का दबाव भी है।' परंतु सैन्य नैतिकताओं को अपने सिद्घांतों पर खड़े रहना चाहिए और अपने मूल्यों पर टिके रहना चाहिए। 
Keyword: jammu kashmir, gogoi,,
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