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संकट से निपटने के लिए जरूरी सबक

एम पी राम मोहन /  June 12, 2017

नाभिकीय संयंत्रों में उपकरण की विफलता और मानवीय चूक दोनों ही तरह की गलतियों की आशंका हमेशा रहती है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं एम पी राम मोहन 

 
गुजरात के काकरापार एटॉमिक पावर स्टेशन (केएपीएस) में परमाणु दुर्घटना को एक वर्ष का समय बीत चुका है और यह संयंत्र अब तक बंद पड़ा है। 11 मार्च 2016 को सुबह 9 बजे केएपीएस की यूनिट वन अचानक आपातकालीन स्थिति में स्वत: बंद हो गई। दरअसल इसके प्राइमरी हीट ट्रांसपोर्ट सिस्टम में पानी की जबरदस्त लीकेज हुई थी। परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद (एईआरबी) ने कहा कि इस रिएक्टर की सुरक्षा व्यवस्था जिसमें बैकअप कूलिंग सिस्टम शामिल था, वह एकदम ठीक ढंग से काम कर रही थी। आईएईए की इंटरनैशनल न्यूक्लियर ऐंड रेडियोलॉजिकल इवेंट स्केल पर इस घटना को पहले स्तर का आंका गया। इसे संयंत्र स्तर की खामी करार दिया गया।
 
एईआरबी और न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) ने अपनी प्रेस विज्ञप्तियों में कहा कि घटना के बाद रेडियोधर्मिता के स्तर में कोई इजाफा नहीं हुआ और न ही कोई कर्मचारी किसी भी तरह के विकिरण की चपेट में आया। एईआरबी का कहना है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती है और जब तक समुचित उपाय नहीं अपनाए जाते तब तक संयंत्र को सुरक्षित ढंग से बंद रखा जाएगा। बहरहाल यह घटना अपने आप में एक अवसर है जिसकी मदद से हम नियामकीय प्रतिक्रिया की समीक्षा कर सकें। 
 
जापान के फुकुशिमा में घटी दुर्घटना के बाद नाभिकीय परियोजनाओं को लेकर सुरक्षा मानक और नियामकीय व्यवस्था खासी कड़ी की जा चुकी है। फुकशिमा हादसे के तुरंत बाद दुनिया भर में नाभिकीय बिजली संयंत्रों की सुरक्षा और उनके नियामकीय स्तर में सुधार किया गया और उनकी समीक्षा कर उनको उन्नत बनाया गया। भारत में ऐसे बिजली संयंत्रों की सुरक्षा जांच का काम एईआरबी और एनपीसीआईएल ने किया। जनता को आश्वस्त किया गया कि नई तकनीकी और नियामकीय व्यवस्था में तमाम बेहतरीन और नए सुरक्षा मानकों का ध्यान रखा जाएगा। कुलमिलाकर माना यही जा रहा है कि फिलहाल जो उपाय अपनाए जा रहे हैं वे अपने आप में किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। बहरहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि क्या आम जनता को पता है कि ये सुरक्षा जांच किस प्रकार की जाती हैं? व्यक्तिगत स्तर पर और सामूहिक स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया की जांच करना आपातकालीन टीम को यह तय करने में मदद करता है कि किसी आपदा या दुर्घटना की स्थिति में बचाव का स्तर क्या होगा? साथ ही यह भी तय करने में मदद मिलती है कि बतौर अंशधारक वे सुरक्षा परिचालन में क्या मदद कर सकते हैं?
 
एईआरबी के मुताबिक किसी संयंत्र में आपातकालीन परिस्थिति से तात्पर्य होता है घोषित रूप से रेडियो विकिरण का फैलना या उस संयंत्र के किसी खास हिस्से में कोई अन्य समस्या उत्पन्न होना। काकरापार में हुई दुर्घटना को संयंत्र स्तर की आपात घटना करार दिया गया था। एईआरबी द्वारा सन 2014 में बनाई गई नाभिकीय विकिरण सुरक्षा नीति के अनुसार संयंत्र परिचालक यानी इस मामले में एनपीसीआईएल को आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए व्यापक योजना तैयार करनी चाहिए थी। उसने यह भी कहा कि संयंत्र को चलाने वाला संगठन ही वहां घटने वाली किसी भी तरह की घटना के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। इसलिए आपात स्थिति से निपटने के लिए उसे पूरी तरह तैयार भी रहना चाहिए। इसके लिए ईपीआर यानी आपात तैयारी और प्रतिक्रिया की व्यवस्था होनी चाहिए।
 
प्रक्रियागत ढंग से देखें तो ईपीआर की योजना का अर्थ ही है किसी नाभिकीय संयंत्र में किसी अप्रिय स्थिति में वहां काम करने वाले लोगों तथा आम जनता को किसी भी तरह के विकिरण के जोखिम से हर स्तर पर बचाना। एईआरबी की वर्ष 2014-15 की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि हर संयंत्र में इस कवायद को लगभग हर तिमाही में दोहराया जाना चाहिए। कुलमिलाकर देखें तो सूचना साझा करने और संचार के स्तर पर एईआरबी जनता को रेडियो विकिरण के बारे में सही जानकारी देने का बीड़ा उठाती है और इसके लिए जरूरी कदम उठाती है। ऐसे में यह संदेह तो है ही, काकरापार मामले में प्रेस विज्ञप्ति भर जारी करना ऐसे अहम मसले पर जनसंचार का सही तरीका है भी या नहीं।
 
समय-समय पर होने वाली नियामकीय जांच के बारे में जानकारी साझा करना भी एक अहम तरीका है। इसमें स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसी जांच रिपोर्ट के बारे में वेब पर की गई खोज कुछ खास जानकारी सामने नहीं रखती। कुछ सूचना एईआरबी की सालाना रिपोर्ट में जरूर मिलती है। लोगों को अगर अपनी तथा अपने आसपास के समुदायों की रक्षा के बारे में समुचित जानकारी हो तो जनसंचार को प्रभावी तरीके से अंजाम दिया जा सकता है। इससे सोशल मीडिया जैसे माध्यमों पर प्रचलित गलतबयानी से बचा जा सकता है।
 
सुरक्षा निगरानी और जो कदम उठाए गए उनकी रिपोर्ट देशज भाषाओं में प्रकाशित कराने से विश्वास और यकीन का माहौल बनेगा। अगर ऐसा होता है तो विभिन्न समुदाय ऐसी परियोजनाओं में गंभीर साझेदार माने जाएंगे। इससे नियामक की भी मदद होगी और परिचालक की भी। काकरापार घटना के तत्काल बाद नाभिकीय ऊर्जा विभाग के पूर्व और पदस्थ अधिकारियों तथा एईआरबी के लोगों ने कुछ ऐसे वक्तव्य दिए, मसलन-आंतरिक निगरानी व्यवस्था में चूक थी और इससे सबक सीखे जाने की आवश्यकता है आदि। यह भी कहा गया कि यह लीकेज एक गंभीर और चकित करने वाली घटना थी। इन बातों ने ऐसी निगरानी की विश्वसनीयता को ही सवालों के घेरे में ला दिया। मान्यता तो यही थी कि ऐसी निगरानी से संयंत्र की सुरक्षा सुधारने में मदद मिलेगी। नाभिकीय ऊर्जा परियोजनाओं में हमेशा यह जोखिम रहता है कि मानवीय त्रुटि या उपकरण के स्तर पर खराबी से समस्या पैदा हो सकती है। नियामकीय जांच को ऐसे तैयार किया गया है कि इन विफलताओं को रोका जा सके।
 
एईआरबी के सुरक्षा निर्देशों में कहा गया है कि ऐसे मसलों से निपटते समय कड़े तरीके अपनाने चाहिए। इसके लिए व्यापक व्यवस्था आवश्यक है। ऐसे निरीक्षक होने चाहिए जो पेशेवर और प्रशिक्षित ढंग से निगरानी को अंजाम दें। आईएईए के एकीकृत नियामकीय समीक्षा सेवा मिशन ने 2015 में कहा था कि एईआरबी ने अपनी निगरानी का बोझ काफी हद तक एनपीपी से हासिल सूचनाओं पर डाल दिया है। सुझाव दिया गया कि बोर्ड को रूटीन ऑनसाइट निगरानी बढ़ानी चाहिए। जब एईआरबी और एनपीसीआईएल की जांच पूरी हो जाए तो इन सवालों के भी संतोषजनक उत्तर तलाश किए जाने चाहिए। चूंकि हमारी योजना नाभिकीय ऊर्जा क्षमता में विस्तार करने की है इसलिए ऐसे कई सबक हैं जो संकट से निपटने के लिए जरूरी तौर पर सीखने होंगे।
 
(लेखक आईआईएम-अहमदाबाद में बिजनेस पॉलिसी के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूर्णत: निजी हैं।)
 
Keyword: power, electric, atomic, काकरापार एटॉमिक पावर स्टेशन,
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