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आखिर किसानों को कब मिलेगा यह ई-नाम!

एन सुंदरेश सुब्रमण्यन /  06 11, 2017

नाम का ई-नाम !

ई-नाम की शुरुआत बेहद जोरशोर के साथ की गई थी लेकिन एक साल बाद भी इस पर काम चल ही रहा है, इसका मकसद देश भर में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल मुहैया कराना है

मध्य प्रदेश के किसानों को अपनी बंपर फसल के लिए खरीदार नहीं मिल पा रहा है लेकिन उनकी इस समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार द्वारा विकसित किए जा रहे इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) का काम अभी पूरा नहीं हुआ है।  ई-नाम की परिकल्पना एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल के रूप में की गई है जो मौजूदा कृषि उत्पाद विपणन समितियों की मंडियों को जोड़कर एकीकृत बाजार बनाएगा। कृषि उत्पादों की आवाजाही मंडियों के जरिये ही होगी लेकिन ऑनलाइन बाजार से लेनदेन की लागत घटेगी और किसानों तथा उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल अप्रैल में जोरशोर से ई-नाम को लॉन्च किया था। इसका लक्ष्य पहले साल के दौरान 400 और मार्च 2018 तक 585 मंडियों को पोर्टल से जोड़ना था। शुरुआत में इसके जरिये 25 जिंसों का कारोबार किया जाना था। कृषि मंत्रालय के तहत स्मॉल फार्मर्स एग्रीबिजनेस कंर्सोटियम (एसएफएसी) इस पोर्टल के क्रियान्वयन का काम संभाल रही है जबकि नार्गाजुन फर्टिलाइजर ऐंड केमिकल्स को तकनीकी सपोर्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

एक साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद यह पोर्टल अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया है। यहां तक जिन मंडियों का पंजीकरण किया गया है वहां भी सुविधाएं पूरी तरह विकसित नहीं की गई हैं। करीब एक दर्जन राज्य ई-नाम से जुड़े हैं जिनमें भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य मध्य प्रदेश भी शामिल हैं। ई-नाम पोर्टल के मुताबिक देशभर में 250 मंडियों को पंजीकृत किया गया है जिनमें से 21 मध्य प्रदेश में हैं। भोपाल की करोंद मंडी मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी मंडी है। इसमें सबसे अधिक जिंसों को कारोबार के लिए सूचीबद्ध किया गया है। राज्य में चल रहे किसान आंदोलन के केंद्र मंदसौर की मंडी को भी इस पोर्टल में पंजीकृत किया गया है। पोर्टल के मुताबिक मंदसौर की मंडी में चना, धनिया, सोयाबीन, मसूर चना दाल, चना डॉलर और चना देसी का कारोबार होता है।

जिंस बाजारों में हिस्सा लेने वालों का कहना है कि सुधार में समय लगेगा। मध्य प्रदेश में एसएफएसी के सलाहकारों में से शामिल आशिष बजाज कहते हैं कि राज्य में ई-नाम या ई-मंडी के मामले में ज्यादा काम नहीं हुआ है। उन्होंने टेलीफोन पर कहा, 'हमारे इलाके में कुछ नहीं हुआ है। यह अभी पंजीकरण के दौर में ही है।' कमोडिटी पार्टिसिपेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष शिव कुमार गोयल ने कहा कि यह एक व्यापक सुधार है जिसमें समय लगेगा। इसमें राज्य स्तरीय लोगों को भी शामिल करने की जरूरत है। 

कृषि विपणन राज्यों का मामला है और उन्होंने इसके लिए अपने हिसाब से कानून बना रखे हैं। एक राज्य को कई बाजारों के हिसाब से बांटा जाता है जिनमें से हरेक में मंडी समिति के अपने नियम लागू होते हैं। इनकी फीस भी अलग-अलग है। एक ही राज्य के भीतर विभिन्न बाजारों में भिन्नता की वजह से एक इलाके से दूसरे इलाके में जिंसों का मुक्त प्रवाह बाधित होता है। कृषि उत्पादों के कई स्तरों से गुजरने और मंडी में कई तरह के शुल्कों की वजह से उपभोक्ताओं को चीजें महंगे दाम पर मिलती है और किसानों को भी लाभ नहीं मिल पाता है।

इसी खामी को दूर करने के ई-नाम पोर्टल की परिकल्पना की गई है जो कृषि मंडियों से जुड़ी जानकारी और सेवाओं के लिए एकल खिड़की व्यवस्था है। कर्नाटक ने इस मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है। राज्य में 157 मंडियां ई-ट्रेडिंग, ई-परमिट, ई-पेमेंट्स और कई दूसरे वैज्ञानिक तरीके अपना रही हैं। किसानों की आय दोगुना करने के बारे में नीति आयोग की एक हालिय रिपोर्ट में कहा गया है कि यूनिफाइड मार्केट प्लेटफॉर्म (यूएमपी) से कर्नाटक के किसानों को फायदा हुआ है। किसानों की कमाई 2013-14 की तुलना में 2015-16 में 38 फीसदी बढ़ी है। नारियल, काला चना, तुअर और बंगाल चना जैसे जिंसों से किसानों को सबसे ज्यादा कमाई हुई है।

कर्नाटक में यूएमपी राष्ट्रीय ई-मार्केट सर्विसेज की पहल है जो एनसीडीईएक्स ई-मार्केट्स लिमिटेड और राज्य सरकार का संयुक्त उपक्रम है। आंध्र प्रदेश में भी इसी तर्ज पर निजी-सार्वजनिक भागीदारी पर काम चल रहा है। क्रांतिकारी उपायों को पूरी तरह कार्यशील बनाने में समय लगता है लेकिन नेफेड जैसी केंद्र सरकार की खरीद एजेंसियों का कहना है कि किसानों को नुकसान से बचाने के लिए वे अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रही हैं।

नेफैड के निदेशक अशोक ठाकुर ने कहा, 'हमने 2016-17 में करीब 5,500 करोड़ रुपये की खरीद की थी जो पूरी तरह कैशलेस थी। इस तरह हमने लीकेज को रोका और पैसे सीधे किसानों की जेब में गए।' भाजपा के सहकारी प्रकोष्ठï के प्रमुख का कहना है कि नेफेड जैसी सरकारी खरीद संस्थाओं के पास भंडारण की काफी कमी है। ठाकुर का मानना है कि ई-नाम जैसे दीर्घकालिक कदमों के लिए किसानों को शिक्षित और प्रशिक्षित करने की जरूरत है। इससे पिछले छह दशकों में उभरे बुनियादी ढांचे की कमी पूरी की जा सकती है।

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