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सरकारी प्रयास से मजबूत होता इस्पात

ईशिता आयान दत्त / कोलकाता June 11, 2017

एक तरह से वर्ष 2005 इस्पात के लिए सहमति पत्र का वर्ष था। कई नई परियोजनाएं 10 करोड़ टन से अधिक की क्षमता वृद्धि के लिए तैयार थीं। इसलिए जब सरकार ने उस वर्ष राष्टï्रीय इस्पात नीति पेश की थी तो 2019-20 तक उत्पादन 10 करोड़ टन का लक्ष्य रखा गया था और इसे एक आसान लक्ष्य के तौर पर देखा गया था। वैश्विक तौर पर तीसरे सबसे बड़े इस्पात उत्पादक भारत में कुल क्षमता मौजूदा समय में 12.2 करोड़ टन की है। हालांकि भले ही भारत ने अपनी लक्षित क्षमता को पार कर लिया है, लेकिन इस सेक्टर में इस्तेमाल दर 75-80 फीसदी है। इस पृष्ठïभूमि में राष्टï्रीय इस्पात नीति 2017 के तहत निर्धारित किया गया वर्ष 2030 तक 30 करोड़ टन की क्षमता का लक्ष्य कितना वास्तविक है?

 
भारतीय इस्पात प्राधिकरण (सेल) के चेयरमैन पीके सिंह का कहना है कि असली चुनौती खपत को लेकर है। सिंह कहते हैं, 'सरकार ने वर्ष 2030 तक क्षमता बढ़ाकर 30 करोड़ टन करने की योजना बनाई है और हमें इसके लिए एक अच्छी नीति की जरूरत है। हम तब तक इतनी क्षमता हासिल नहीं कर पाएंगे जब तक कि हमारे पास इसके लिए मजबूत आधार उपलब्ध नहीं होगा। मौजूदा समय में उत्पादन लगभग 9 करोड़ टन है और इसे बढ़ाकर तीन गुना करने के लिए हमें मजबूत नीतियों की जरूरत है।'
 
भारत में इस्पात की प्रति व्यक्ति खपत 61 किलोग्राम पर है जो 208 किलोग्राम के वैश्विक औसत से नीचे है। टाटा स्टील के कलिंगनगर संयंत्र के उपाध्यक्ष राजीव कुमार कहते हैं कि टियर-2 शहरों में इस्पात की प्रति व्यक्ति खपत 160-170 किलोग्राम है, लेकिन गांवों में यह 30 किलोग्राम के आसपास है। सरकारी खरीद में घरेलू तौर पर निर्मित लौह और इस्पात को तरजीह दिए जाने के लिए सरकार एक नीति के जरिये खपत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। यह नीति उन सभी सरकारी निविदाओं पर लागू है जिनमें कीमत बोली अभी खोली जानी बाकी है। 
 
इसके अलावा, 1 मई 2017 से रियल एस्टेट रेग्युलेशन ऐक्ट के प्रभावी होने से इस्पात के लिए मांग में इजाफा होने की संभावना है। केयर रेटिंग्स के अनुसार ज्यादातर मांग हालांकि बुनियादी ढांचे, रेलवे और सड़कों पर सरकारी खर्च से संबंधित होगी। केयर रेटिंग्स ने एक रिपोर्ट में कहा है, 'मौजूदा समय में इस्पात की खपत का लगभग 40 फीसदी हिस्सा निर्माण और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है जिसके वर्ष 2030-31 तक बढ़कर 60 फीसदी हो जाने का अनुमान है।' 
 
जेएसडब्ल्यू के निदेशक (कॉमर्स ऐंड मार्केटिंग) जयंत आचार्य का कहना है बुनियादी ढांचा खर्च का इस उद्योग पर दोगुना असर होगा। आचार्य ने कहा, 'एक तरफ जहां इससे इस्पात खपत को मजबूती मिलेगी वहीं दूसरी तरफ इससे पूरी व्यवस्था को क्षमता बढ़ाने की सख्त जरूरत होगी।' प्रत्येक टन इस्पात के लिए तीन टन कच्चे माल की जरूरत होती है और इस हिसाब से 30 करोड़ टन इस्पात के लिए 90 करोड़ टन कच्चे माल की जरूरत होगी। रेलवे, बंदरगाहों, बुनियादी ढांचे के लिए इसके प्रबंधन की क्षमता होनी चाहिए। नीति में 11 लाख अतिरिक्त रोजगार पर जोर दिया गया है।
 
कम खपत और भूमि अधिग्रहण बाधाओं के बावजूद इस्पात निर्माताओं को नई क्षमता वृद्धि बरकरार रखनी होगी। इसके अलावा चिंता यह भी है कि 30 करोड़ टन क्षमता नई परियोजनाओं के जरिये जोड़ी जाएगी जिनमें भूमि को लेकर बड़ी समस्या सामने आ सकती है। राष्टï्रीय इस्पात नीति के अनुसार ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के विस्तार के लिए भूमि जरूरत अनुमानित तौर पर 91,000 एकड़ की होगी। 
 
उन्होंने कहा, 'मैं नहीं जानता कि भविष्य में कोई सकारात्मक भूमि अधिग्रहण नीति आएगी। इस्पात उद्योग को बड़े पैमाने पर भूमि की जरूरत है।' लेकिन यदि ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को भूमि संबंधी समस्या आती है तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रमुख उत्पादक अपनी बाजार भागीदारी बनाए रखने के प्रयास में ब्राउनफील्ड विस्तार पर आगे बढ़ सकते हैं। भारत की प्रमुख इस्पात निर्माता कंपनियों सेल, जेएसडब्ल्यू स्टील और टाटा स्टील ने पिछले एक दशक में 1.67 करोड़ टन की क्षमता जोड़ी जो इस अवधि के दौरान देश में की गई क्षमता वृद्धि का 21 फीसदी है। 
 
लेकिन कई अन्य अनिश्चितताएं और संदेह भी हैं। 30 करोड़ टन की क्षमता हासिल करने का मतलब होगा 10 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश करना। हालांकि ब्राउनफील्ड (मौजूदा इकाई में) विस्तार के लिए ग्रीनफील्ड यानी नई इकाई के मुकाबले कम निवेश की जरूरत होगी। आरबीआई की फाइनैंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2016 तक मूल धातुओं और उनके उत्पादों के लिए अग्रिम अनुपात 42.9 फीसदी पर काफी अधिक था। रिपोर्ट में कहा गया है, 'इसलिए बैंकिंग व्यवस्था में उद्योग के लिए अधिक उधारी नहीं दर्ज की गई, क्योंकि यह उद्योग बॉन्ड बाजार पर निर्भर हो रहा है।' लेकिन विभिन्न सरकारी उपायों की मदद से नकदी प्रवाह में सुधार आने और वैश्विक मांग में तेजी आने से उद्योग फिर से अपनी तेज रफ्तार की वापसी की उम्मीद कर रहा है।
Keyword: steel, company, इस्पात, न्यूनतम आयात मूल्य, एमआईपी,
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