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रिजर्व बैंक का अस्थिर नजर आता नजरिया

रथिन रॉय /  June 11, 2017

पिछली कुछ नीतिगत समीक्षाओं में दरों में कटौती नहीं की गई है। इसकी वजह तलाश करने पर आरबीआई की नीतिगत अस्थिरता प्रमुख रूप से उभरकर सामने आती है। विस्तार से बता रहे हैं रथिन रॉय

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिगत दरों को स्थिर रखने का निर्णय लिया जिसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। हालांकि इसके लिए जो वजह बताई गई उसे लेकर जरूर असहमतियां सामने आई हैं। बल्कि कहा जाए तो इस पर विवाद भी हुआ। यहां दो बातें हैं। पहली, एमपीसी के रुख की विश्लेषणात्मक विश्वसनीयता और दूसरा वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच सार्वजनिक असहमति का भाव।
 
नीतिगत दर में कटौती दिसंबर 2016 से ही स्थगित है। दिसंबर में एमपीसी ने कहा था कि कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वित्तीय बाजारों में अस्थिरता, खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी और नोटबंदी के प्रभाव के चलते दरों को स्थिर रखा जा रहा है। उस वक्त कहा गया था कि समझदारी इसी में है कि इन कारकों के असर पर नजर रखी जाए। फरवरी में एमपीसी ने अपना नीतिगत रुख बदला और 'समायोजन' की भावना के स्थान पर उसने 'निष्पक्षता' को अपनाया। उसने नीतिगत दरों को लंबित रखने के लिए नोटबंदी के मुद्रास्फीति और उत्पादन अंतराल पर पडऩे वाले अंतर को वजह बनाया। अप्रैल में एमपीसी ने जोर देकर कहा कि जिस मुद्रास्फीति संबंधी दबाव की बात की जा रही थी वह अब भी बरकरार है। उसने यह भी कहा था कि मांग के दबाव में इजाफा होता दिख रहा है जबकि नोटबंदी का असर उतना नही है और वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही तक उसका रहा सहा असर भी जाता रहेगा। 
 
अब तक यह मान लिया गया था कि मुद्रास्फीति में इजाफा होगा। गत 7 जून के वक्तव्य में एमपीसी ने कहा कि नोटबंदी का अस्थायी प्रभाव कीमतों पर लगातार बरकरार रहा। सब्जियों और फलों के मामले में अतिरिक्त आपूर्ति की स्थिति बन गई। इतना ही नहीं एमपीसी  ने आगे कहा कि अर्थव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि निजी निवेश में नई जान फूंकी जाए, बैंकिंग क्षेत्र की सेहत में सुधार किया जाए और बुनियादी ढांचा क्षेत्र के गतिरोध को दूर किया जा सके। मौद्रिक नीति तभी अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती है जब ये तमाम कारक काम कर रहे हों।
 
मुझे इस पूरी यात्रा में देश की वृहद अर्थव्यवस्था को लेकर कोई नीतिगत निरंतरता नहीं नजर आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है एमपीसी मुद्रास्फीति संबंधी अनुमानों को लेकर अपने रुख में तब्दीली लाई है और उसने नोटबंदी के अनित्य प्रभाव पर अपनी बात को भी उलट दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसने ढांचागत बाधाओं के आलोक में मौद्रिक नीति के असर को लेकर एक नए ढंग का कदम उठाया। ये ढांचागत समस्याएं पिछले काफी समय से मौजूद हैं। मैं इसकी व्याख्या दो तरह से कर सकता हूं। पहली बात, एमपीसी उस स्थिति में दरों में कटौती के खिलाफ है जब तक कि उसका असर नहीं होता। ऐसी स्थिति में भी जबकि खराब आर्थिक प्रदर्शन एकदम स्पष्टï नजर आ रहे हैं और इनको देखते हुए दरों में कटौती एकदम अपरिहार्य नजर आ रही है। 
 
हकीकत में एमपीसी से उम्मीद यह की जाती है कि वह मुद्रास्फीति पर ध्यान रखते हुए वृद्घि को भी पूरी तवज्जो देगी। दूसरी बात, एमपीसी यह समझती है कि वृद्घि में आए ठहराव और निवेश में कमी ही भारतीय अर्थव्यवस्था की असल दिक्कतें हैं। इसके लिए मुख्यतौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोर ढांचागत स्थितियां ही जिम्मेदार हैं। ऐसे में नीतिगत दरों में कटौती का कोई खास सकारात्मक प्रभाव नहीं मिलना निराश करता है। अगर ऐसा है तो एमपीसी को यह बात खुलकर कहनी चाहिए और यह दलील पेश करनी चाहिए कि सांविधिक तरलता अनुपात में कमी करते हुए दरों को थामना और जोखिम का आवास ऋण आदि पर होना आदि समझदारी भरे कदम हैं। 
 
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने एमपीसी के निर्णय पर एक सार्वजनिक वक्त्तव्य जारी किया और साथ ही वृहद आर्थिक स्थिति पर एक वैकल्पिक आकलन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति के आकलन के तरीके में कई खामियां हैं जिनकी वजह से मुद्रास्फीति बढ़ीचढ़ी हुई नजर आती है। इस दौरान उन्होंने यह दलील भी दी कि वृद्घि के लिए कमजोर पूर्वानुमान और बैलेंसशीट की दोहरी समस्या मुद्रास्फीति संबंधी समस्याओं को कम करती है। 
 
मैं उनकी इस राय से सहमत हूं कि मौजूदा हालात में मौद्रिक राहत की उतनी गुंजाइश नहीं है। बहरहाल अगर एमपीसी और सीईए दोनों सही हैं तो रीपो दर इस समय नीतिगत रूप से सक्षम नहीं है। अगर वृद्घि को ढांचागत बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है तो पारेषण प्रभावी साबित नहीं होगा। एसएलआर में कटौती भी अप्रासंंगिक होगी क्योंकि बैंक पहले ही बहुत अधिक सरकारी कर्ज से दबे हुए हैं। उसका स्तर एसएलआर की जरूरत से कहीं ज्यादा है। वहीं सस्ता आवास ऋण लोगों की मकान खरीदने में तो मदद कर सकता है लेकिन इससे संकटग्रस्त बैलेंस शीट वाले बिल्डरों को कोई फायदा नहीं मिलेगा। 
 
क्या इसका यह मतलब है कि मौद्रिक नीति एकदम बेनतीजा है? मुझे ऐसा नहीं लगता। समस्या यह है कि लक्ष्य और उपाय में आपसी भ्रम है। मुद्रास्फीति के लक्ष्य का निर्धारण तकनीकी अथवा कुछ मुद्रास्फीति सूचकांकों और नीतिगत दरों के रिश्ते के वृहद आर्थिक आकलन के आधार पर होता है। यह निर्णय सरकार द्वारा लिया जाना चाहिए वह भी समूचे वृहद आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए। एमपीसी का काम है ब्याज दरों को एक ऐसे उपाय के रूप में इस्तेमाल करना जो सरकार द्वारा तय लक्ष्यों का बचाव कर सके। 
 
इसलिए अगर सरकार चाहती है कि आरबीआई ढांचागत वजहों से दरों में कटौती करे तो तार्किक यही होगा कि वह मुद्रास्फीति की लक्षित दर को मौजूदा दर से ऊंचा रखे। यह काम 5-7 फीसदी के सीमित दायरे में किया जाना चाहिए। इसके बजाय सरकार ने कम ब्याज दर की मांग करने का मार्ग चुना जबकि इस दौरान उसने मौजूदा लक्ष्य को बरकरार रखा। यही वजह है कि दोनों संस्थानों के बीच असहमति सार्वजनिक रूप से सामने आ रही है। इससे उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है। 
 
मुद्रास्फीति का लक्ष्य सरकार तय करती है। इसके लिए आरबीआई गवर्नर और वित्त मंत्री को आपस में चर्चा करनी चाहिए। एमपीसी और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के बीच एक औपचारिक बैठक की जरूरत नहीं है क्योंकि एमपीसी को स्वायत्त ढंग से काम करना है और सभी अंशधारकों के नजरिये और प्राप्त सूचना के आधारित पर निर्णय लेना है। इसमें सरकार द्वारा दी गई लिखित सूचना भी शामिल है। 
Keyword: bank,rate, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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