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शेयर बाजार में निवेश तो रिटर्न में भी क्लेश

तिनेश भसीन /  June 11, 2017

बाजार में तेजी का दौर बना हुआ है और एक के बाद एक आने वाले कई चर्चित आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आईपीओ) को हाथोहाथ लिया भी गया है। इस वजह से लोगों ने शेयरों में सीधे रकम लगानी भी शुरू कर दी है। खबरों के मुताबिक 2016 में लगभग 24 लाख नए डीमैट खाते खुले, जो 2008 के बाद से सबसे बड़ा आंकड़ा है। इन नए डीमैट धारकों और निवेशकों को एक बात ध्यान रखनी चाहिए। यदि आपने शेयरों में कारोबार किया है तो आयकर (आई-टी) रिटर्न दाखिल करना आपके लिए दिक्कत भरा हो सकता है। 

 
आयकर के नजरिये से नफे और नुकसान को अलग-अलग तरीके से आंका जाता है। इसमें कई बातें देखी जाती हैं, जैसे आपने शेयरों की डिलिवरी लही या नहीं, आपने इंट्रा-डे कारोबार किया या नहीं, कहीं आपने वायदा-विकल्प में तो कारोबार नहीं किया। आपको अपना रिटर्न किस तरह दाखिल करना चाहिए, यह बात इस पर भी निर्भर करेगी कि आपने कितनी बार सौदे किए और कितने सौदे किए।
 
चुनें सही आईटीआर फॉर्म
 
यदि आपकी सभी लिवाली और बिकवाली डिलिवरी पर आधारित रही है और आपका शेयर कारोबार आपकी आय का बहुत मामूली हिस्सा है तो आयकर रिटर्न करना बहुत सरल काम है। आपको आईटीआर-2 फॉर्म दाखिल करना होगा। यदि आपने 12 महीने से कम समय में ही शेयर बेच डाले हैं तो आपको उनसे हुए मुनाफे पर 15 फीसदी की दर से अल्पावधि पूंजीगत लाभ कर चुकाना होगा। 
 
अगर आपने कुछ शेयर नुकसान उठाते हुए बेचे हैं तो उस नुकसान को उसी साल आपके अल्पावधि पूंजीगत लाभ कर में से घटा दिया जाएगा, जिससे आप पर कर की देनदारी कुछ कम हो जाएगी। पीडब्ल्यूसी इंडिया में व्यक्तिगत कर के पार्टनर एवं लीडर कुलदीप कुमार कहते हैं, 'अगर आपको संपत्ति, सोना, शेयर, डिबेंचर या कोई पूंजीगत संपत्ति बेचने पर किसी तरह का लाभ हुआ है तो आप इस नुकसान को उसमें से घटा सकते हैं। लेकिन अगर आपने शेयर अपने पास 1 साल से अधिक समय तक रखे थे और उसके बाद उन्हें घाटे में बेचा था तो आप उस घाटे को दीर्घावधि लाभ में से नहीं घटा सकते। इसकी वजह यह है कि दीर्घावधि लाभ पर किसी तरह का कर ही नहीं लगता।
 
रिटर्न दाखिल करने में दिक्कत उस वक्त आती है, जब आप बार-बार शेयर खरीदते-बेचते हैं और आपका कारोबार बहुत अधिक होता है। उस स्थिति में आपको कारोबारी यानी बिजनेस ओनर के तौर पर रिटर्न दाखिल करना होगा और उसके लिए आईटीआर-4 फॉर्म भरना होगा। क्लियरटैक्स डॉट इन में चार्टर्ड अकाउंटेंट और कर विशेषज्ञ प्रीति खुराना कहती हैं, 'अगर कोई शख्स भाव में उतार-चढ़ाव का फायदा उठाने के लिए ही कारोबार करता है तो आयकर विभाग उसे निवेश नहीं मानता।' 
 
कर का हिसाब-किताब लगाते वक्त इस बात पर विवाद कई साल से चल रहा है कि किसी व्यक्ति ने कीमतों में उतार-चढ़ाव से मुनाफा कमाने की कोशिश में शेयर बेचे थे या उसने कंपनी की वृद्घि का फायदा उठाने की कोशिश की थी। कर आकलन अधिकारी लेनदेन की प्रकृति देखकर इसका फैसला कर सकता है। खुराना बताती हैं कि अधिकारी वेतनभोगियों को कारोबारी यानी बिजनेस ओनर के तौर पर रिटर्न दाखिल करने की सलाह देने से पहले दो पैमानों पर विचार करते हैं। पहला, यदि शेयर ट्रेडिंग से हुआ कारोबार वेतन के बराबर है तो करदाता को शेयर कारोबारी मान लिया जाता है। दूसरे पैमाने के तौर पर वे देखते हैं कि कारोबार कितनी बार किया गया है। यदि लिवाली और बिकवाली लगातार चलती रही है तो इसका मतलब है कि उस शख्स ने कीमतों में उतार-चढ़ाव का फायदा उठाने की कोशिश की है और वह निवेशक नहीं है। यदि कोई वयक्ति खुद को शेयर कारोबारी या निवेशक साबित नहीं कर पाता है तो उसके लिए बिजनेस ओनर के तौर पर रिटर्न दाखिल करना ही बेहतर होगा।
 
अगर आप पेशेवर हैं, फ्रीलांसर हैं, गृहिणी हैं, सेवानिवृत्त हो चुके हैं या आपका अपना कारोबार है तो भी यही सिद्घांत लागू होता है। अगर आप अक्सर शेयरों के सौदे करते हैं तो रिटर्न दाखिल करते वक्त शेयर बाजार के सौदों को पूंजीगत लाभ के मद में नहीं दिखाएं। अगर आपने डेरिवेटिव्स में कारोबार किया है या इंट्रा-डे ट्रेडिंग करते रहे हैं तो आपको हुए नफे या नुकसान को सीधे कारोबारी आय मान लिया जाएगा। आपके डेरिवेटिव्स सौदे आपके वेतन के मामूली हिस्सा भर ही क्यों न हों और कभीकभार ही किए गए क्यों न हों, आपको रिटर्न तो बिजनेस ओनर के तौर पर ही दाखिल करना पड़ेगा। ऐसी सूरत में आपको आईटीआर-4 फॉर्म भरना होगा। कर विश्लेषकों की राय है कि आपने केवल चार या पांच डेरिवेटिव्स सौदे ही क्यों न किए हों, आईटीआर-4 भरना ही आपके लिए ठीक रहेगा। 
 
बिजनेस ओनर के तौर पर रिटर्न
 
इसमें सबसे पहले यह देखिए कि आपको अपने कारोबार में कितना मुनाफा हुआ है और कितना नुकसान झेलना पड़ा है। इसके अलावा सौदों से हुई सकल आय की गणना कीजिए और यह भी देखिए कि पूरे वित्त वर्ष में आपने कुल कितने सौदे किए हैं। बिजनेस ओनर के रूप में आप खर्चों को अपनी सकल आय से घटा सकते हैं और अपनी कर देनदारी कम कर सकते हैं। आप व्यवसाय के लिए इस्तेमाल होने वाली हमारत के किराये या रखरखाव के खर्च, मोबाइल फोन या टेलीफोन के बिल, इंटरनेट बिल, डीमैट खाते के शुल्क, ब्रोकर के कमीशन, कारोबार के लिए इस्तेमाला होने वाले लैपटॉप पर मूल्यह्रïास और अपने काम से जुड़े किसी भी अन्य खर्च को आय में से घटा सकते हैं। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि सभी खर्च वास्तविक हों क्योंकि कई करदाताओं को बाद में कर नोटिस भी मिल चुके हैं, जिनमें उनसे यह बताने के लिए कहा गया है कि खर्च कहां और कैसे हुए थे। आपको बैलेंस शीट भी तैयार करनी होगी, जिसका विवरण आपको आईटी-4 में करना होगा। यह आपकी परिसंपत्तियों और देनदारियों का ब्योरा यानी स्टेटमेंट होता है।
 
नुकसान का दावा करना
 
बिजनेस ओनर के तौर पर आपको जो भी नुकसान हुआ है, उसे आप अगले आठ वित्त वर्षों तक ले जा सकते हैं और उन आठों वर्षों में हुए फायदे में से वह नुकसान घटा सकते हैं। हालांकि वायदा-विकल्प और इंट्रा-डे में हुए नुकसान के मामले में प्रावधान अलग-अलग हैं। यदि आपने एफऐंडओ में नुकसान उठाया है तो आप उसी आकलन वर्ष में इसे किराये और ब्याज से हुई आय में से घटा सकते हैं। निवेश से हुए लाभ में से भी आप इसे घटा सकते हैं। लेकिन आप नुकसान को वेतन में से नहीं घटा सकते। अगर आप नुकसान को अगले वित्त वर्ष में ले जा रहे हैं तो आप उन्हें आगे के वर्षों में हुए पूूंजीगत लाभ में से ही घटा सकते हैं। जिन लोगों ने इंट्रा-डे सौदे किए हैं, उनके सौदों को कर विभाग 'सटोरिया आय' मानता है। इसका मतलब है कि नुकसान सिर्फ 'सट्टïा व्यवसाय' में ही समायोजित किया जा सकेगा और यह सहूलियत भी अगले चार साल तक ही मिलेगी। मेकमाईरिटन्र्स डॉट कॉम के संस्थापक विक्रम रामचंद कहते हैं, 'करदाता इन प्रावधनों का तभी लाभ उठा सकते हैं, जब वे समय पर रिटर्न फाइल करते हैं। साथ ही उन्हें अपने बहीखाते को ऑडिट भी कराना पड़ता है। विलंब की स्थिति में आप नुकसान को आगे नहीं ले जा सकते हैं।' बहीखाते को ऑडिट कराने में कम से कम 25,000 रुपये खर्च करने होंगे।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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