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बंगाल और कारोबार का बिगड़ा रिश्ता

अशोक लाहिड़ी /  June 08, 2017

विभाजन ने बंगाल के कारोबार पर बुरा असर डाला। वह आज तक उस असर से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी 

 
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गत वर्ष कोलकाता में आयोजित बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट जैसे आयोजनों की मदद से राज्य में कारोबार को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही हैं। इस सिलसिले में प्रदेश में उद्यमिता को बढ़ावा देना काफी अहम होगा। फिलहाल देश के अन्य हिस्सों की तुलना में यहां उद्यमिता की स्थिति ठीक नहीं है। बीसवीं सदी के आरंभ तक प्रदेश में कारोबारियों की तादाद खूब थी लेकिन आज वह सब सपनों की बातें लगती हैं। उदाहरण के लिए 18वीं सदी में शोभाराम बसाक ईस्ट इंडिया कंपनी को कपड़े की आपूर्ति करके करोड़पति बन गए थे। सन 1810 में एक रुपये में 12 किलोग्राम से अधिक चावल मिलता था। जबकि आज एक रुपये में 50 ग्राम चावल भी नहीं मिलेगा। जाहिर है करोड़ों रुपये की बहुत अधिक कीमत हुआ करती थी। नुकु या लक्ष्मीकांत धर के पास इतना पैसा था कि वह ईस्ट इंडिया कंपनी को उधार दिया करते। वैष्णवचरण सेठ ने दूरदराज इलाकों में गंगा जल बेचकर पैसे कमाए। दक्षिणेश्वर मंदिर की स्थापना करने वाली रानी रासमणि, भगवान रामकृष्ण से संबद्घ थीं। उन्हें भी अपने ससुर प्रीतिराम दास से खूब धन संपदा मिली। प्रीतिराम महिष्य जाति के बांस बेचने वाले थे। सन 1780 के दशक में बांस की कीमतों में तेजी आने के बाद उन्होंने खूब पैसे कमाए।
 
सन 1832 में प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर, टैगोर ऐंड कंपनी ने बर्दवान के निकट घाटे में चल रही एक कोयला खदान को एक्लेक्जेंडर ऐंड कंपनी से खरीदा। इस कोयला खदान से पैसे कमाकर द्वारकानाथ ने मध्य कोलकाता में ऐतिहासिक जोरासांको ठाकुरबाड़ी बनाई। अब यहां पर रवींद्र भारतीय विश्वविद्यालय है। हजारों लोग इस जगह को देखने आते हैं क्योंकि यहां उनके सुप्रसिद्घ पोते रवींद्रनाथ पले बढ़े। 
 
सन 1890 में राजेंद्र नाथ मुखर्जी नामक एक युवा इंजीनियर और सर थॉमस एक्विन मार्टिन ने मिलकर मार्टिन ऐंड कंपनी की स्थापना की। आगे चलकर उन्होंने इंडियन आयरन ऐंड स्टील कंपनी (इस्को) की स्थापना बर्नपुर में की। इसके अलावा उन्होंने विक्टोरिया मेमोरियल भी बनाया। सन 1892 में 31 वर्ष की उम्र में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने बंगाल केमिकल्स की स्थापना की। यह देश की पहली दवा कंपनी थी। 
 
आगे चलकर बंगाल की उद्यमिता को क्या हुआ? देश के विभाजन ने एक स्वाभाविक आर्थिक क्षेत्र को ध्वस्त कर दिया और शरणार्थियों को जन्म दिया। इसका असर बंगाल की अर्थव्यवस्था और उद्यमिता पर पड़ा। राजनीतिक विरोध, औद्योगिक अशांति, हिंसात्मक बंद और वामपंथियों के घेराव आदि ने पूरी तरह कारोबार और कारोबारी विरोधी माहौल बना दिया। राजेंद्रनाथ मुखर्जी के बेटे सर वीरेन कहते हैं कि सन 1960 के दशक के अंत में इस्को  संयंत्र में लगातार श्रमिक अशांति रहने लगी। वह कहते हैं, 'मैंने अपनी आंखों से एक विशाल औद्योगिक परिसर देखा था। मैं उसके साथ 40 वर्ष तक जुड़ा रहा। लेकिन मेरे सामने ही वह धूल-धूसरित हो गया।'
 
बुनियादी ढांचा विकसित करने के बजाय पुनर्वितरण पर जोर देने से राज्य में सड़कों की हालत खराब हो गई, बंदरगाह ध्वस्त हो गए और शहरों का नियोजन पूरी तरह समाप्त हो गया। बिना औद्योगिक समर्थन के कृषि क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन भी किसी काम का नहीं रह गया। बंगाल का विभाजन सात दशक से भी पुरानी बात है। यह कोरिया के विभाजन से भी पहले की बात है। लेकिन दक्षिण कोरिया उस झटके से उबरकर विकसित देशों की कतार में है। इतना ही नहीं कुछ दक्षिण कोरिया कारोबारी समूह मसलन डीलिम और सैमसंग सात दशक बाद भी लगातार फलफूल रहे हैं। परंतु बंगाल के प्रमुख कारोबारी घराने कारोबारी जगत से एकदम गायब हो गए। बेहतर बुनियादी ढांचा जैसी मांगें खामोश कर दी गईं। इन बातों से एक सवाल यह उठता है कि क्या बंगाल के मूल्य तार्किक पूंजीवादी व्यवस्था में कारोबारी विकास की भावना के अनुरूप हैं? 
 
अपनी मशहूर पुस्तक 'द प्रोटेस्टेंट एथिक्स ऐंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म' में समाजशास्त्री मैक्सवेबर दलील देते हैं कि हर कोई यहां तक कि वेटर, चिकित्सक, कोचवान, कलाकार, वेश्याएं, बेईमान अधिकारी, सैनिक, गण्यमान्य लोग, जुआरी और भिखारी तक पैसा कमाने की प्रवृत्ति रखते हैं। उन्होंने पूंजीवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि यह ताकत के जरिये या अवैध तरीकों से धनोपार्जन नहीं है बल्कि मुनाफे के लिए अवसरों का इस्तेमाल है वह भी शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से। 
 
वेबर ने कहा कि पूंजीवादी दो तरह के हैं एक पारंपरिक और दूसरे तार्किक। पारंपरिक पूंजीवादी केवल बढिय़ा जीवनशैली और सामाजिक प्रतिष्ठïा के लिए धन कमाना चाहते हैं। उनके लिए एक बार यह सब हासिल करने के बाद बाकी चीजों का मतलब नहीं रहता। बंगाल के कारोबारी घरानों का उभार और पतन पारंपरिक पूंजीवाद के खांचे में सटीक बैठता है। उदाहरण के लिए द्वारकानाथ के परिवार में एक नोबेल पुरस्कार से सम्मानित समेत कई प्रतिष्ठित व्यक्ति पैदा हुए। लेकिन उनके परिवार में कोई कारोबारी व्यक्तित्व सामने नहीं आया जो मशाल थाम सके। द्वारकानाथ की जीवनी लिखने वाले एक व्यक्ति ने यह भी ध्यान दिया कि रवींद्रनाथ ने कभी अपने लेखन में अपने दादा का जिक्र नहीं किया। 
 
इसी तरह चोरबागान के मालिक कोलकाता में संगमरमर का महल बनाकर प्रसिद्ध हुए। उन्हें उनके सामाजिक कार्य के कारण भी प्रतिष्ठा मिली। लेकिन उन्होंने अपने पूर्वजों गंगा विष्णु और रामकृष्ण मलिक के व्यापक बैंकिंग कारोबार को तथा वाणिज्यिक लेनदेन के काम को कभी आगे नहीं बढ़ाया। जबकि उनके पुरखों का काम पश्चिमोत्तर प्रांतों और चीन तक फैला हुआ था। पारंपरिक स्वरूप के इतर वेबर ने जिस तार्किक पूंजीवाद की बात की है वह केवल जरूरतों के पूरा हो जाने तक सीमित नहीं है। बल्कि इसमें निरंतर मुनाफे की तलाश की जाती है। इसके लिए एक के बाद एक तार्किक और पूंजीवादी उद्यमों का इस्तेमाल किया जाता है। इसे तार्किक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मुनाफा कमाने के अवसर तैयार करता है। बंगाल के उद्यमी परिवारों में शायद ही तार्किक पूंजीवादी गुण देखने को मिले हों।
 
न केवल बंगाल में बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी हिंदू समाज ने तार्किक  पूंजीवाद को पीछे धकेल दिया क्योंकि कारोबारी समुदाय यानी वैश्यों को जात व्यवस्था में नीचे रखा गया। लेकिन बंगाल में कम से कम उन लोगों के बीच बौद्घिक तिरस्कार का भाव था जो पैसे कमाने के काम में लग गए थे। यही अवमाननापूर्ण भाव बंगाली समुदाय के मारवाडिय़ों के प्रति अमित्रवत व्यवहार के लिए भी उत्तरदायी है। 
 
उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला ने कोलकाता से अपना कारोबार ग्वालियर और बंबई स्थानांतरित करते समय इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने अपना कारोबार सन 1930-40 के दशक में समेटा। जानकारी के मुताबिक बिड़ला ने बाद में राहत के साथ कहा था कि कोलकाता में उनके पास बस 2,000 लिपिक रह गए। अब वक्त आ गया है कि बंगाल अपना रुख बदलकर कारोबारियों को स्वागत करे। अगर कारोबारी बंगाल छोड़ेंगे तो बंगाल को कई स्तरों पर नुकसान होगा।
Keyword: west bengal, mamta, business, summit,,
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