बिजनेस स्टैंडर्ड - कड़े उपाय जरूरी
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कड़े उपाय जरूरी

संपादकीय /  June 08, 2017

बीते कुछ समय के दौरान दूरसंचार क्षेत्र का प्रदर्शन लगातार खराब होता रहा और सरकार मूकदर्शक बनी रही। आखिरकार अब वह हरकत में आती नजर आ रही है। सबसे पहले इस क्षेत्र की वित्तीय दिक्कतें दूर करने के लिए अंतरमंत्रालय समूह की स्थापना की गई। यह समूह विभिन्न नेटवर्क के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी समस्याओं का निवारण करेगा। इसके बाद दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा और विभिन्न  नेटवर्क के मालिकों और सीईओ की मुलाकात होगी। 

 
माना जा रहा है कि इस महीने के अंत तक कोई न कोई हल निकल आएगा। इस बीच भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के चेयरमैन आरएस शर्मा ने भी दूरसंचार कंपनियों के प्रमुखों को बुलाकर उनकी समस्याओं की जानकारी ली। ये कदम सही दिशा में हैं और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन बातों का पालन हो। क्योंकि दूरसंचार उद्योग के लिए माहौल दमघोंटू बना हुआ है। पांच सूचीबद्ध नेटवर्क में से केवल एक भारती एयरटेल ने बीती तिमाही में लाभ कमाया। रिलायंस कम्युनिकेशंस पहले ही भुगतान में चूक गई है। इस मामले में शीघ्र कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि भविष्य में और देरी से इस उद्योग में पूर्णकालिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
 
दूरसंचार उद्योग की खराब होती सेहत पिछले कई महीनों से दृष्टिगोचर है। गत वर्ष सितंबर में रिलायंस जियो के बाजार में प्रवेश के साथ ही विभिन्न नेटवर्क के राजस्व में तेज गिरावट देखने को मिली क्योंकि वह छह महीने के लिए डाटा नि:शुल्क दे रही थी। वॉयस कॉल के लिए भी कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा था। इसके चलते सरकार के उन तमाम शुल्कों में भी कमी आई जो वह नेटवक्र्स के सकल राजस्व पर वसूल करती है। इसके बाद आरबीआई ने संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए मानक प्रोविजनिंग के दिशानिर्देश जारी किए। इसकी शुरुआत दूरसंचार से हुई। विभिन्न नेटवर्क का ब्याज कवरेज अनुपात 1 फीसदी से नीचे आ गया और उनका परिचालन लाभ इतना नहीं था कि वे अपना ब्याज चुका पाते। तब आरबीआई ने बैंकों से कहा कि वे 30 जून तक इस क्षेत्र की समीक्षा करें। बैंक ने उनसे कहा कि वे इस क्षेत्र की मानक संपत्ति पर ऊंची दर पर प्रोविजनिंग करें ताकि बहीखातों में जरूरी मजबूती हासिल की जा सके। जाहिर है बढ़ी हुई प्रोविजनिंग बैंकों के मुनाफे पर असर डालेगी।
 
अब जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ कुछ कड़े फैसले किए जाएं। ठीक वैसे ही जैसे 15 वर्ष पूर्व अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने लिए थे और नेटवक्र्स को तयशुदा लाइसेंस शुल्क से राजस्व साझेदारी व्यवस्था की ओर ले गई थी। उस वक्त भी इनकी हालत बहुत खराब थी लेकिन सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप ने उनकी वित्तीय सेहत दुरुस्त की और देश में दूरसंचार क्रांति की जमीन तैयार की। आज भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार उपभोक्ता बाजार है। मौजूदा सरकार से वैसी ही इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की आकांक्षा है। इस बात पर आम सहमति है कि क्या कुछ किया जाना चाहिए। इस सिलसिले में ट्राई ने कई सुझाव दिए हैं। उनकी मदद से इस उद्योग में सुधार लाया जा सकता है। 
 
इसमें स्पेक्ट्रम यूजर शुल्क को समायोजित सकल राजस्व के 6 फीसदी से घटाकर 3 फीसदी करना और उसके बाद 1 फीसदी करना, लाइसेंस शुल्क को 8 फीसदी से कम करके 6 फीसदी करना और यूनिवर्सल सर्विसेज ऑब्लिगेशन फंड में योगदान को 5 फीसदी से घटाकर 1 फीसदी करना शामिल है। ट्राई ने यह सुझाव भी दिया है कि विभिन्न नेटवर्क को मौजूदा 10 साल के बजाय 20 साल के लिए स्पेक्ट्रम का भुगतान करने की इजाजत दी जाए। ये सभी सुझाव उचित हैं और इनसे दूरसंचार नेटवक्र्स की खस्ता हालत में सुधार हो सकता है।
Keyword: telecom, दूरसंचार trai,,
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