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दलितों के सम्मान की लड़ाई के लिए आगे आई भीम आर्मी

मानवी कपूर /  06 07, 2017

पड़ताल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में हमेशा दलितों का बहुमत रहा है लेकिन भीम आर्मी ने उन्हें ज्यादतियों के प्रतिरोध की दी है सशक्त आवाज

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक अलसाया हुआ सा गांव घड़कोली पार करते समय नीले रंग का एक अनूठा बोर्ड नजर आता है। बोर्ड पर हिंदी में बड़े अक्षरों में साफ-साफ लिखा हुआ है 'द ग्रेट चमार'। हालांकि इस बोर्ड पर हिंसा या उपद्रव के कोई निशान नहीं नजर आते हैं लेकिन इस बोर्ड पर अंकित शब्दों ने इस गांव और आसपास के इलाकों में उस चिंगारी को हवा दी है जिसकी चपेट में सभी जातियां आ गई हैं। हालांकि 'चमार' शब्द का इस्तेमाल प्रतिबंधित है और अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार उन्मूलन अधिनियम,1989 के तहत इसके लिए कड़ी सजा का भी प्रावधान है। लेकिन इलाके के ठाकुरों और यादवों जैसी जातियों को सबसे ज्यादा एतराज बोर्ड पर इसके साथ लिखे 'ग्रेट' शब्द को लेकर है। 

इसका नतीजा यह हुआ कि इस बोर्ड को दो बार जलाने की कोशिश की गई। जब दूसरी बार इस बोर्ड को आग के हवाले किया गया तो माहौल बिगड़ने की आशंका से परेशान पुलिस ने खुद ही वहां पर दूसरा बोर्ड लगवा दिया। यह बोर्ड उन कई दलित प्रतीकों में से एक था जिन पर सहारनपुर के इस इलाके में हमले किए गए। घड़कोली में आंबेडकर की प्रतिमा को भी कई बार विरूपित करने की कोशिश की गई। हालात को संभालने के लिए गांव में हरेक कुछ सौ मीटर की दूरी पर पुलिस के जवानों को तैनात किया गया है। आसपास के जिलों से भी पुलिस अधिकारी बुलाए गए हैं। 

सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच हाल ही में हुए हिंसात्मक संघर्ष के बाद प्रशासन की तरफ से ये एहतियाती कदम उठाए गए हैं। हालांकि इस इलाके में पहले से ही दलितों की आबादी अधिक रही है लेकिन एक नए संगठन 'भीम आर्मी' के उभार ने दलितों को वह निर्भीकता प्रदान की है कि वे अपने साथ अन्याय का प्रतिकार करने के लिए खड़े होने लगे हैं। दलित युवक चंद्रशेखर की अगुआई वाले इस संगठन को सरल शब्दों में दलितों का सामाजिक आंदोलन कहा जा सकता है। इसका दावा है कि वह दलितों की बेहतरी के लिए काम करेगा, चाहे वह चिकित्सा सुविधाओं के अभाव वाले इलाकों में मेडिकल सेंटर खोलना हो या शादी एवं श्राद्ध जैसे कार्यक्रमों के लिए आर्थिक मदद देना। भीम आर्मी के पास दलित युवकों की ऐसी टोली भी है जो दलितों के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसा का जवाब देने के लिए तैयार रहती हैं। इस संगठन के संस्थापक चंद्रशेखर इन दिनों फरार हैं लेकिन उनके समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम दलित बच्चों की शिक्षा और युवकों को एकजुट करने में बदस्तूर जुटी हुई है। 

घड़कोली में एक दुकानदार रोहताश सिंह कहते हैं, 'हमारे समुदाय को एकजुट करना महाभारत के युद्ध जैसा काम है। भीम आर्मी ने बिखरे और बंटे दलित समुदाय को वजूद का अहसास कराया है।' उनकी दुकान की दीवार के ठीक बगल में दो पुलिसकर्मी दोपहर की अपनी नींद से जाग चुके हैं और हमारी बातचीत को बड़े गौर से सुन रहे हैं। उनमें से एक पुलिसकर्मी बड़े ही शालीन तरीके से मुस्कराते हुए हमारी तरफ पानी की बोतल भी बढ़ाता है। पुलिस उप निरीक्षक जीतेंद्र कुमार का तो कहना था कि इस इलाके में कोई तनाव नहीं है। वह कहते हैं, 'यहां हर कोई शांति एवं खुशहाली के साथ रह रहा है। आप देखिए, हमने तो एक दिन के ही भीतर वह बोर्ड भी दोबारा लगा दिया।' उनके इस दावे को सुनकर दुकानदार रोहताश मंद-मंद मुस्कराने लगते हैं। उनकी दुकान में भीमराव आंबेडकर के कई पोस्टर टंगे हुए दिख गए।

घड़कोली के बारे में यह सुरम्य विवरण उस समय खंडित हो जाता है जब टिंकू के घर के बाहर कुछ लोग जुटने शुरू हो जाते हैं। 23 साल के टिंकू ने पतंजलि के कारखाने में कुछ समय तक काम करने के बाद भीम शक्ति नाम से अपना एक डिटर्जेंट पाउडर लेकर आने की सोची और अपने साझेदार जसवंत के साथ मिलकर इस दिशा में काम शुरू कर दिया। दोनों साझेदारों ने अपना कारखाना लगाने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी और दूसरे लोगों से कर्ज भी लिए। उनकी इस पहल को भीम आर्मी का भी समर्थन हासिल था।

टिंकू ने चंद्रशेखर के असर को स्वीकार भी किया। फोन पर हुई बातचीत में टिंकू ने कहा, 'चंद्रशेखर भैया हम लोगों से हमेशा कहते हैं कि पहले जानो फिर मानो। हम नहीं चाहते हैं कि लोग अंध भक्त की तरह हमारा अनुसरण करें। हम चाहते हैं कि न्याय के लिए संघर्ष का जज्बा रखने वाले लोग ही हमारे साथ आएं।' टिंकू अपने डिटर्जेंट ब्रांड के कारोबार के बारे में सटीक ब्योरा नहीं दे पाए। मगर अभी तक 2 लाख रुपये के कारोबार का अनुमान है।  

भीम आर्मी के कार्यकलापों को देखें तो यही लगता है कि यह संगठन सहारनपुर में दलित समुदाय की आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए क्राउड सोर्सिंग का सहारा लेता है। अगर इस समुदाय का कोई सदस्य बीमार है और उसे खून चढ़ाने की जरूरत है तो भीम आर्मी के कार्यकर्ता उसकी मदद करने के लिए आगे आते हैं। इसी तरह किसी बीमार आदमी को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस बुलाने या फिर किसी लड़की की शादी के इंतजाम में भी भीम आर्मी पूरी सक्रियता से जुट जाती है। टिंकू घर पर नहीं है लेकिन उसके घर पर जुटे लोग अपनी बात को जोरशोर से रखने के लिए आगे आते हैं। उन्हीं लोगों के बीच खड़ी सपना जोर से कहती है, 'भीम आर्मी ही क्यों? हम खुद पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ खुद ही खड़े हो सकते हैं और ऐसा करेंगे भी।' 19 साल की सपना जातिगत भेदभाव से बखूबी परिचित है और इस तरह की घटनाओं को उजागर नहीं करने के लिए मीडिया को ही दोषी बताती है। थोड़ा कुरदने पर सपना की पीड़ा उसकी आंखों की नमी के साथ कुछ यूं बाहर आती है, 'मीडिया हरेक संघर्ष, हरेक समस्या और हरेक मुद्दे को सिर्फ एक ही नजरिये से देखता है। उसे इसमें दलितों की गलती नजर आती है। सच तो यह है कि मीडिया केवल ठाकुरों के बारे में सोचता है।' 

पक्की ईंटों से बने उस छोटे कमरे में जब सपना अपने गुस्से का इजहार कर रही होती है तो वहां खड़े अन्य पुरुष और महिलाएं भी उसकी बात से सहमति जताने के लिए अपना सिर हिला रहे होते हैं। उन लोगों के बीच मौजूद एक शख्स गजराज हमें जमीनी हकीकत से रूबरू कराते हैं। वह कहते हैं, 'देखिए, हम किसी भी सेना का हिस्सा नहीं हैं और किसी तरह की समस्या भी पैदा होते हुए नहीं देखना चाहते हैं। लेकिन भीम आर्मी ने हमें वह वजह दी है कि हमें अपने समुदाय को लेकर एक तरह का गौरवपूर्ण अहसास हो। हम अपने लिए हरिजन जैसे मीठे शब्दों का इस्तेमाल नहीं चाहते हैं। असलियत तो यह है कि हम चमार हैं और किसी दूसरे नाम से बुलाने भर से हमारी मुश्किलें कम नहीं हो जाएंगी।' उन्होंने कहा, 'पहले हम अक्सर यह सोचा करते थे कि अत्याचार जैसी बातें केवल हमारे दिमाग की उपज हैं। आज हमें यह अहसास होने लगा है कि किस तरह ठाकुर लोग हमें अपनी खाट पर नहीं बैठने देते थे।'

गजराज के दिमाग में अपने वजूद और भरोसे पर ही संदेह करने वाली इस मन:स्थिति को मनोविज्ञान में 'गैसलाइटिंग' का नाम दिया जाता है। शायद यही वजह है कि अगड़ी जातियों के साथ पुलिस-प्रशासन के रवैये में भी दलित समुदाय के प्रति दिखने वाली गैसलाइटिंग प्रवृत्ति को खारिज करने के लिए 'चमार' शब्दावली का खुलकर और गर्व के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। 

दलित समुदाय के बीच भीम आर्मी की लोकप्रियता बढ़ने से राजनीतिक दलों में एक तरह की बेचैनी देखी जा रही है। तिवई में सिलाई मशीन का मुफ्त प्रशिक्षण केंद्र चलाने वाले मांगे राम की मानें तो सभी राजनीतिक दल भीम आर्मी और चंद्रशेखर की भूमिका को लेकर शंकालु बने हुए हैं। मांगे राम कहते हैं, 'असल में चंद्रशेखर सामाजिक मुद्दों को लेकर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और उनका कोई राजनीतिक मकसद नहीं है। उनके प्रति लोगों के आकर्षण की सबसे बड़ी वजह भी यही है।' हालांकि वह भीम आर्मी के साथ ताल्लुक रखने की बात से इनकार करते हैं लेकिन सहारनपुर के कई दलित तो अपना नाम इस संगठन के साथ जोड़कर खुद को किसी भी मुश्किल से बचाने का आसान जरिया मानते हैं। इन लोगों का मानना है कि इस तरह वे उनके ही लड़ रही भीम आर्मी को सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं ताकि मीडिया या स्थानीय प्रशासन के निशाने पर आने से उसे बचाया जा सके। मांगे राम का साथी कहता है, 'आपको नई दिल्ली में जंतर मंतर पर हुआ दलितों का विरोध प्रदर्शन देखना चाहिए था। उसने दिखा दिया कि भले ही हम मुखर समर्थक न हों लेकिन दिल से हम सभी भीम आर्मी के साथ खड़े हैं।'

दलित कार्यकर्ता और डायनैमिक एक्शन ग्रुप के सदस्य राम कुमार कहते हैं कि भीम आर्मी की सफलता का राज उसके सदस्यों की युवा उम्र है। वह शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों और दलितों के बीच हुए हिंसात्मक संघर्ष का हवाला भी देते हैं। उस हिंसा में ठाकुर बिरादरी के एक युवक की मौत हो गई थी जिसके बाद उसके परिजनों को क्षतिपूर्ति देने के साथ सरकारी नौकरी भी देने का वादा किया गया। कुमार कहते हैं, 'आज के समय में दलितों को यह लगता है कि किसी संघर्ष की स्थिति में केवल एकतरफा जांच ही होगी। लेकिन अब उन्हें यह भी मालूम है कि उनके पास एक सशक्त आवाज है और वे इस तरह का रवैया बर्दाश्त नहीं करेंगे।' 

सहारनपुर के दलितों का यह प्रदर्शन देश के अन्य हिस्सों में भी हुए दलित प्रदर्शनों की तर्ज पर नजर आया। असल में, उत्पीडऩ के बाद अपनी जान दे देने वाले हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला और गुजरात के वकील एवं सामाजिक कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी के नाम भी यहां अनजान नहीं हैं। सहारनपुर के इस दूरदराज के इलाके में भी हर कोई इन नामों से परिचित नजर आया। हिंसा के बाद सहारनपुर के इस इलाके में धारा 144 लागू होने और सभी तरह की इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी के बाद भी दलित आंदोलन के ये नए चेहरे अपनी चमक बिखेरने में कामयाब रहे हैं। मांगे राम अपना पुराना फीचर फोन दिखाते हुए कहते हैं, 'हर कोई व्हाट्सऐप से नहीं जुड़ा हुआ है। लेकिन हमारे भीतर का आक्रोश और अपनी जिंदगी को बदलने की चाहत ही हमें एक दूसरे से जोड़ने के लिए काफी है।' 

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर के घर छुटमलपुर में तो उनके अचानक हस्ती बन जाने का असर और भी साफ दिखता है। उनके घर का रास्ता पूछने पर दो दुकानदार काफी उत्साह में नजर आए। आगे बढऩे पर गहरे लाल रंग का एक गेट नजर आता है जिस पर हिंदी में भीम आर्मी लिखा हुआ है। उस घर की छत पर भीम आर्मी के नीले झंडे फहराते हुए नजर आते हैं। थोड़ी देर बाद चंद्रशेखर के 31 वर्षीय भाई भगत सिंह बाहर निकलते हैं और बड़े ही सधे हुए अंदाज में हाथ मिलाकर हमारा स्वागत करते हैं। गांव की चौपाल पर उनके साथ तीन और लोग भी मौजूद हैं जो भीम आर्मी के सदस्य हैं। 

भगत अपने संगठन के सफर की कहानी बताते हैं, 'भीम आर्मी की शुरुआत हमारे पिता की मौत के बाद ही हुई। उनकी मौत के बाद ही हमें जाति की वजह से होने वाले भेदभाव का अहसास हुआ। पिता ने अपनी जिंदगी में हमारी सामान्य परवरिश के लिए इन सभी बातों को हमसे छिपाया हुआ था।' वह एक वाकये का जिक्र करते हैं जिसमें उनके स्कूल टीचर पिता को एक छात्र के घर पर खाने के लिए बुलाकर अपमानित किया गया था। भगत के साथ मौजूद लोगों ने भी इंटर कॉलेज में पढ़ाई के दौरान हुई प्रताडऩा के अनुभव बताए। दिनेश गौतम कहते हैं, 'हम ठाकुर समुदाय के लिए चपरासी जैसे थे। अगर हम उनके लिए बीड़ी का बंडल खरीदने जाने से मना कर देते थे तो हमारी खूब पिटाई होती थी।'

दलित समुदाय के छात्रों के लिए स्कूल में अलग नल होते हैं। उन्हें अपनी पीड़ा के बारे में शिकायत का कोई मंच नहीं दिया जाता है। भगत कहते हैं, 'अगर छोटे बच्चों को भी यह मालूम है कि 'चमार' बुरे बर्ताव किए जाने के लिए ही हैं तो इसका मतलब है कि यह बात उनके मन में बैठी हुई है।' इस संगठन को मालूम है कि दलितों के साथ अत्याचार और भेदभाव की समस्या को शिक्षा और जागरूकता के जरिये ही हल किया जा सकता है। भीम आर्मी के बढ़ते रसूख का अंदाजा राम कुमार की उस चेतावनी से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर इस संगठन के नेताओं को खलनायक की तरह पेश करने की कोशिश की जाती रही तो सहारनपुर फिर से झुलस सकता है। वह कहते हैं, 'यह पहली बार है जब दलित समुदाय इतना सख्त संदेश दे रहा है। इसके बाद अगर कोई हिंसा होती है तो दलित जख्मी शेर की तरह पहले से भी अधिक तीव्रता से जवाब देंगे।' इस बयान से यह अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि सहारनपुर के ग्रामीण इलाकों में एक तूफान अंदर ही अंदर जन्म ले रहा है।
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