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बिजली क्षेत्र की दिक्कतें क्या कम हुई हैं उदय से!

आनंद पी गुप्ता /  June 07, 2017

कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य मिले हैं लेकिन स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि इससे कोई बड़ा सकारात्मक अंतर आया है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आनंद पी गुप्ता

 
बीस नवंबर 2015 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (उदय) पेश की थी ताकि राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की वित्तीय स्थिति और परिचालन किफायत में सुधार लाया जा सके। इसके लिए कुछ आकलित उपाय अपनाए जाने थे। सबसे पहले, इनके समेकित तकनीकी और वाणिज्यिक (एटीऐंडसी) घाटे को वर्ष 2018-19 तक कम करके 15 फीसदी पर लाना है और दूसरा औसत आपूर्ति लागत (एसीएस) और औसत राजस्व प्राप्ति (एआरआर) के बीच के अंतर को वर्ष 2018-19 तक शून्य पर लाना है। 
 
सरकार ने कई तरह के हस्तक्षेप तैयार किए ताकि इन नतीजों को हासिल किया जा सके। इनमें शामिल हैं: (अ) राज्य सरकार 30 सितंबर 2015 तक के डिस्कॉम के कुल ऋण का 75 फीसदी दो वर्ष की अवधि में वहन करेगी। वर्ष 2015-16 के लिए 50 फीसदी और 2016-17 के लिए 25 फीसदी। (ब) व्यापक आईईसी (सूचना, शिक्षा और संचार) अभियान की मदद से बिजली चोरी पकड़ी जाएगी और (स) टैरिफ की तिमाही समीक्षा की जाएगी खासतौर पर ईंधन कीमतों के मद्देनजर। 
 
क्या उदय से अंतर आया है? 
 
उदय की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुल 268,778.21 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड में से 232,500 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड जारी किए गए हैं। यह देखते हुए कि इन आंकड़ों में 27 राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में से 11 के आंकड़े शामिल नहीं हैं क्योंकि उन्होंने उदय का विकल्प नहीं चुना है और यह भी कि 268,778.21 करोड़ रुपये की राशि डिस्कॉम के कुल कर्ज का महज 75 फीसदी समेटती है वह भी बचे हुए 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश में। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि सितंबर 2015 तक इन कंपनियों का औसत कर्ज करीब 8 लाख करोड़ रुपये रहा होगा। यह राशि जीडीपी के 5.86 फीसदी के बराबर है। 
 
यह पूरी गड़बड़ी का केवल एक हिस्सा है। दूसरे हिस्से में बिजली उत्पादन क्षमता के कम इस्तेमाल, डिस्कॉम द्वारा पर्याप्त बिजली नहीं खरीदना आदि शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि बिजली की मांग नहीं है बल्कि उनकी कमजोर वित्तीय स्थिति उनको ऐसा नहीं करने देती। इसकी नतीजा कटौती के रूप में सामने आता है। मांग ज्यादा होने के कारण कई स्थानों पर डिस्कॉम के इस रवैये का जवाब कैप्टिव पावर प्लांट के रूप में सामने आ रहा है। ग्रिड की बिजली उपलब्ध नहीं होने पर कैप्टिव पावर प्लांट का प्रयोग किया जा रहा है। यह सिलसिला कई वर्षों से चल रहा है। सरकार को उम्मीद है कि एटीऐंडसी के घाटे को वर्ष 2018-19 तक 15 फीसदी तक लाने और एसीएस-एआरआर के अंतर को उस अवधि तक घटाकर शून्य करने के बाद डिस्कॉम जरूरत के मुताबिक बिजली खरीदनी शुरू कर देंगी और लोड शेडिंग बंद हो जाएगी। इस तरह उपभोक्ताओं की पूरी जरूरत ग्रिड की बिजली से ही पूरी हो जाएगी। अब यह योजना 18 माह पुरानी हो चुकी है। क्या कोई अंतर आया है? क्या चीजें सरकार के मनमुताबिक हो रही हैं? क्या एटीऐंडसी नुकसान में कोई कमी आई है? क्या एसीएस-एआरआर का अंतर कम हुआ है? क्या डिस्कॉम अतिरिक्त बिजली खरीद रही हैं? क्या कटौती में कमी आई है? क्या कैप्टिव पावर की मांग कम हुई है? 
 
क्या एटीऐंडसी नुकसान में कोई कमी आई है?
 
उदय का लक्ष्य एटीऐंडसी नुकसान को वर्ष 2018-19 तक कम करके 15 फीसदी पर लाने का था। यह कैसे होगा? इसके लिए एक व्यापक आईईसी अभियान चलाना होगा जो बिजली चोरी की व्यापक हो चली समस्या का निराकरण कर सके। इस अभियान के 31 दिसंबर 2016 तक पूरा होने की उम्मीद थी। आखिर यह डिजाइन किसने तैयार किया था और इस अभियान को किसने संभाला? आईईसी अभियसान और एटीऐंडसी के नुकसान के बीच क्या संबंध हैं?
 
उदय की वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2016 तक 16 राज्यों का एटीऐंडसी नुकसान औसतन 23.98 फीसदी था। परंतु यह नुकसान दिसंबर 2016 तक 22 राज्यों के लिए औसतन 19.95 फीसदी रहा। इसका अर्थ यह हुआ कि महज तीन महीने में इन नुकसान में 4.03 फीसदी तक की कमी आई। इससे एक संकेत यह मिलता है कि सरकार ने एटीऐंडसी नुकसान को 15 फीसदी करने का लक्ष्य 2018-19 से काफी पहले अभी ही हासिल कर लिया। एटीऐंडसी नुकसान में इतनी अधिक कमी कैसे आई? क्या ऐसा आईईसी अभियान की वजह से हुआ? ऐसा कोई संकेत नहीं मिल सका है। 
 
क्या एसीएस-एआरआर का अंतर कम हुआ है? 
 
सितंबर 2016 तक 16 राज्यों में यह अंतर प्रति यूनिट 67 पैसे था। परंतु दिसंबर 2016 तक 22 राज्यों में यह अंतर 48 पैसे प्रति यूनिट था। यानी तीन महीने में प्रति यूनिट महज 19 पैसे का अंतर आया। इस कमी का कितना श्रेय राज्य सरकारों द्वारा डिस्कॉम के कर्ज का 75 फीसदी वहन करने को दिया जा सकता है और कितना अन्य हस्तक्षेपों को? 
 
क्या डिस्कॉम ज्यादा बिजली खरीद रही हैं? 
 
उदय की वेबसाइट पर इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है। लेकिन टाटा पावर के एमडी अनिल सरदाना ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा था, 'उदय ने डिस्कॉम को मदद की है और भुगतान में सुधार हुआ है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अब भी बरकरार है। वह है बिजली की खरीद। डिस्कॉम अभी भी बिजली खरीदने की उत्सुक नहीं दिख रहीं।'ऐसा क्यों है? क्या उदय योजना देश की डिस्कॉम को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाने के अपने घोषित लक्ष्य को हासिल कर पाएगी ताकि वे देश के सार्वजनिक संसाधनों पर बोझ न बनें और उनको बार-बार उबारना न पड़े। निश्चित तौर पर कुछ सकारात्मक संकेत हैं लेकिन समुचित प्रमाण अब भी नहीं है। इसलिए स्पष्टï तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि उदय ने एक सकारात्मक अंतर पैदा किया ही है। अभी कुछ देर तक प्रतीक्षा करनी होगी उसके बाद ही उदय के असर के बारे में कोई ठोस बात कही जा सकती है। 
 
(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके हैं। )
Keyword: narendra modi, development,,
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