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निराश करती यथास्थिति

संपादकीय /  June 07, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ब्याज दरों पर यथास्थिति बरकरार रखकर कुछ ज्यादा ही सतर्कता का परिचय दिया है। चालू वित्त वर्ष की अपनी पहली दोमाही नीति में आरबीआई का पहली छमाही का मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान 2 से 3.5 फीसदी और बाद की अवधि के लिए 3.5 से 4.5 फीसदी है। यह वर्ष 2018 के लिए पहले जताए गए क्रमश: 4.5 फीसदी (पहली छमाही) और 5 फीसदी (दूसरी छमाही) से काफी कम है। इसके साथ ही सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में वृद्घि में मामूली कमी आई है और यह 7.3 फीसदी रह गई है। आरबीआई ने जो कुछ किया है वह मुद्रास्फीति के जोखिम को देखते हुए उसकी नीति को तटस्थ बनाए रखने का उपक्रम है। वह इस मोर्चे पर और स्पष्टïता चाहता है। नीतिगत वक्तव्य में कहा गया है कि मौजूदा हालात में 'वैश्विक राजनीतिक और वित्तीय जोखिम आयातित मुद्रास्फीति की वजह हैं और सातवें वेतन आयोग के वितरण के अपने जोखिम हैं, हालांकि वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन का कुल मुद्रास्फीति पर प्रभाव पडऩे की उम्मीद नहीं है।'

 
आरबीआई ने अपने निर्णय के लिए अन्य स्पष्टïीकरण भी दिए हैं। इसमें नोटबंदी के क्षणिक प्रभाव के बारे में स्पष्टïता का अभाव, कृषि ऋण माफी के कारण राजकोषीय समस्या और शुरुआती कटौती का पूरा प्रभाव न पडऩे की बात शामिल है। इसके अलावा वह बढ़ती मुद्रास्फीति को सामने प्रत्यक्ष मंदी से भी अधिक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहा है। शायद यही वजह है कि वित्त वर्ष 2017 की चौथी तिमाही में सकल मूल्य वर्धन का गिरकर 5.6 फीसदी पर आना कृषि और सरकारी क्षेत्र के बिना इसका 3.8 फीसदी होना वक्तव्य से नदारद हैं। इसके बजाय आरबीआई ने इस बात पर ध्यान दिया है कि मई के अंत में आए प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017 का पूरे वर्ष का जीवीए फरवरी के अनुमान से महज 10 आधार अंक कम है।
 
बाजार में कई लोगों का कहना है कि नीति का नरम रुख बताता है कि अगस्त में इसमें कटौती हो सकती है। लेकिन चिंता की बात यह है कि यह केवल उम्मीद है क्योंकि इस बात को लेकर कोई स्पष्टïता नहीं है कि आरबीआई मुद्रास्फीति के रुख में और नरमी आने की प्रतीक्षा करेगा या नहीं। आश्चर्य नहीं कि यह निर्णय सर्वसम्मति से नहीं लिया गया क्योंकि मौद्रिक नीति समिति के एक बाहरी सदस्य ने अपनी असहमति जताई। तमाम उपलब्ध मानकों के मुताबिक तो यह दरों में कटौती का उपयुक्त समय था। मुद्रास्फीति कम थी, अप्रैल की खुदरा महंगाई, 3 फीसदी से नीचे रही जो कई सालों का निचला स्तर है। आर्थिक वृद्घि के मोर्चे पर सांख्यिकी कार्यालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017 के आरंभ से ही घरेलू मंदी नजर आ रही है। नवंबर में नोटबंदी के बाद यह और स्पष्टï हो गई। उसके चलते ऋण वृद्घि और निजी निवेश में कमी आई। इस साल फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन होने की उम्मीद है। मॉनसून भी इस साल सामान्य रहेगा। अंतरराष्टï्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी सहज बनी रहेंगी। 
 
इस लिहाज से देखें तो रीपो दर में कटौती न करना और सांविधिक तरलता अनुपात में केवल 50 आधार अंक की कमी निराश करती है। चाहे जो भी हो एसएलआर से शायद ही व्यवस्था को कोई मदद मिले क्योंकि बैंकों के पास पहले ही सरकारी प्रतिभूतियां मौजूद हैं। आरबीआई ने अपने वक्तव्य के समापन में कहा है कि इस मोड़ पर अपरिपक्व कदम से विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचने का खतरा है। प्रश्न यह है कि अगर वृद्घि दर में शीघ्र सुधार नहीं होता है तो नीतिगत बदलाव और विश्वसनीयता का संकट तो उत्पन्न होगा ही।
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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