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मरीजों की हिंसा से खुद को कैसे बचाते हैं चिकित्सक?

वीर अर्जुन सिंह /  06 06, 2017

खौफ में चिकित्‍सा

एक अध्ययन के मुताबिक करीब 75 फीसदी चिकित्सकों को कभी न कभी
मौखिक या शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है

शाम के छह बजे हैं। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के 10 चिकित्सक शाम को एक पार्क में एकत्रित होकर ताइक्वांडो के दो विशेषज्ञों से आत्मरक्षा के गुर सीख रहे हैं। इनमें एक महिला और दूसरा पुरुष है। अगले एक घंटे या उससे अधिक समय तक इनको प्रशिक्षण दिया जाएगा कि किसी अप्रत्याशित हमले से कैसे बचा जाए या किसी हथियारबंद से कैसे निपटा जाए। 

प्रशिक्षण के बाद इनमें से कम से कम चार चिकित्सक मानते हैं कि उनको काम के दौरान हिंसात्‍मक दुर्व्‍यवहार का सामना करना पड़ा। हर रोज इस अस्पताल में बड़ी तादाद में लोग आते हैं और चिकित्सकों के लिए सबको संतुष्ट कर पाना असंभव है। जबकि मरीजों के साथ आए लोग चाहते हैं कि उनको पूरा ध्यान दिया जाए। ऐसे में वे अपना धैर्य गंवा बैठते हैं और ठीकरा चिकित्सकों के सर पर फूटता है। 

सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है। निजी सुरक्षा कर्मी इस आशंका में रहते हैं कि लोगों से सख्ती करने पर नौकरी जा सकती है या पुलिस प्रताडि़त करेगी। पूरे परिसर में सीसीटीवी कैमरा भी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं।  लंबे चौड़े और मृदुभाषी स्वभाव के जवाहर सिंह बताते हैं कि कैसे हाल ही में बंदूकों से लैस लोगों का एक समूह चिकित्साकर्मियों पर चढ़ बैठा था। उन्होंने कहा कि कैसे गोलियां चलाई गईं लेकिन कोई घायल नहीं हुआ। वह कहते हैं कि दोबारा ऐसी स्थिति से बचने के लिए वह प्रशिक्षण ले रहे हैं। 

हाल के महीनों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चिकित्सकों पर हमले किए गए। महाराष्ट्र में सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों ने तो एक के बाद एक हमलों के विरोध में हड़ताल भी की। इससे वहां संकट उत्पन्न हो गया। करीब 500 से अधिक शल्य चिकित्सा टालनी पड़ीं या रद्द कर दी गईं। चेन्नई में 1,000 से अधिक चिकित्सक सड़कों पर प्रदर्शन करने उतरे क्योंकि एक सरकारी अस्पताल में चिकित्सक पर हमला किया गया था। भारतीय चिकित्सा संघ के एक अध्ययन से पता चलता है कि 75 फीसदी चिकित्सकों को कभी न कभी मौखिक या शारीरिक गाली-गलौज झेलना पड़ता है।

ऐसे हमले सरकारी अस्पतालों में भी हुए हैं और निजी अस्पतालों में भी। कुछ निजी अस्पतालों ने तो अपने बढिय़ा चिकित्सकों के बचाव के लिए बाउंसर तक तैनात कर रखे हैं। सरकारी अस्पतालों में इसलिए हिंसा होती है क्योंकि वहां क्षमता से अधिक मरीज आते हैं। एम्स के चिकित्सक बताते हैं अस्पताल में हर महीने 30 लाख मरीज इलाज के लिए आते हैं लेकिन यहां मौजूद 600 चिकित्सक बमुश्किल 10 फीसदी मरीजों का ही इलाज कर पाते हैं। हिंसा की अधिकांश वारदात आपातकालीन व्यवस्था में होती हैं। एम्स के आपातकालीन वार्ड में 20 चिकित्सकों की जगह है। इनमें से 11 जगह खाली पड़ी हैं।

एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के प्रमुख विजय कुमार कहते हैं, 'डॉक्टरों के पास मरीज को देखने का वक्त शायद ही रहता है। केवल एक टेक्रीशियन रहता है और जब वेंटिलेटर या अन्य मशीनें गड़बड़ करती हैं तो अपने प्रियजन को अस्पताल लेकर आये हताश लोगों का गुस्सा फूट पड़ता है।' नतीजा यह कि अस्पताल के बाहर का पूरा इलाका हिंसा का अड्डा बनता जा रहा है। 

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के रहने वाले राकेश एक बढ़ई हैं। वह दो महीने पहले अपनी बच्ची वीणा को लेकर एम्स आए। वह बीमार है। वीणा इतनी दुबली पतली है कि उसकी आंखें बाहर को निकली हुई प्रतीत होती हैं। इतनी गर्मी में वह एक बैग पर बिछाए गए गुलाबी तौलिए पर लेटी हुई है। फिलहाल यही उसका बेड है। राकेश कहते हैं, 'डॉक्टर ने कहा कि उसके दिल की शल्य चिकित्सा होगी लेकिन उसे पोलियो भी है। पहले उसका इलाज जरूरी है। हमने मार्च में इलाज पूरा कर लिया और तब से हम अगले अप्वाइंटमेंट की प्रतीक्षा कर रहे हैं।'

बेबी देवी नामक एक महिला के दिल के ऑपरेशन के लिए नवंबर 2018 की तारीख दी गई है। उनके पति बृजलाल कहते हैं कि पता नहीं उनकी पत्नी इतनी लंबी प्रतीक्षा कर भी पाएगी या नहीं। न तो राकेश और न ही बृजलाल के दिमाग में अब तक हिंसा जैसी कोई चीज है लेकिन कई अन्य लोगों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की अपर्याप्तता गहरी निराशा का सबब बन जाती है। इससे उनके अंदर का गुस्सा बाहर आ जाता है। सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञों का एक दिन में 90 मरीजों को देखना तक अस्वाभाविक नहीं है। इतने कम समय में उनसे यह उम्मीद करना ठीक नहीं है कि वे हर मरीज के साथ न्याय कर सकेंगे। 

गत मार्च में महाराष्ट्र के धुले में लोगों ने एक चिकित्सक पर हमला कर दिया क्योंकि उन्होंने सर की चोट के एक मरीज को दूसरे अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया था क्योंकि उनके अस्पताल में कोई न्यूरो सर्जन नहीं था। हड्डिïयों के डॉक्टर रोहन म्हामुनकर अपने परिवार के साथ होली मनाने के बजाय 24 घंटे से लगातार काम कर रहे थे। उनके साथ हुई मारपीट के बाद उनके एक आंख की रोशनी जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। 

अधिकांश अस्पतालों में परिचारिकाओं और तकनीकी कर्मचारियों की इतनी कमी है कि मरीज के साथ आए लोग अंदर तक आ जाते हैं। चिकित्सक जानते हैं कि यह ठीक नहीं है लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते। यही वजह है कि अस्पतालों में मरीजों के साथ आए हुए लोगों की भीड़ लगी रहती है। वहां कोई गड़बड़ी होने पर संभालने वाला कोई नहीं रहता। निजी अस्पतालों के बारे में यह धारणा है कि चिकित्सक अनावश्यक दवाएं लिखते हैं और गैरजरूरी जांच कराते हैं। ये अस्पताल पूरी दुनिया को सस्ती चिकित्सा दे सकते हैं लेकिन देश के एक बड़े तबके के लिए वे लालच के अड्डे हैं। 

इसे आधिकारिक समर्थन तब मिल गया जब सरकार ने दिल की बीमारियों में इस्तेमाल होने वाले स्टेंट के मूल्य नियंत्रित करने की घोषणा की। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि चिकित्सकों को जल्दी ही केवल जेनेरिक दवाएं लिखने की इजाजत होगी बजाय कि ब्रांडेड के। फरवरी में, एक भीड़ ने कोलकाता में एक निजी अस्पताल पर हमला किया क्योंकि वहां पेट दर्द की शिकायत पर भर्ती कराई गई एक बच्ची की मौत हो गई थी। एक अन्य अस्पताल उस वक्त निशाने पर आ गया जब कहा गया कि किसी मृत व्यक्ति का शव सौंपने के पहले उसके रिश्तेदारों से पैसे चुकाने को कहा जा रहा है। हुगली पुलिस ने एक निजी चिकित्सालय के खिलाफ मामला दर्ज किया क्योंकि एक मृत व्यक्ति के घरवालों ने शिकायत की थी कि वहां हृदय रोग की चिकित्सा की पूरी व्यवस्था नहीं होने के बावजूद दिल के दौरे के मरीज को भर्ती कर लिया गया।

जनता के गुस्से को भांपते हुए प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सभी निजी अस्पतालों से बात की और उनको समझाइश दी। उन्होंने तो उनकी तुलना बूचडख़ाने तक से कर डाली। उन्होंने विधानसभा में एक विधेयक पेश किया जिसमें अस्पतालों द्वारा ज्यादा बिल वसूलने, दुर्घटना के मरीज का इलाज करने से मना करने और पैसे के लिए किसी के शव को रोकने को अपराध घोषित किया गया था। राज्य के अस्पतालों को मरीजों से पूरे इलाज के दौरान तयशुदा पैसे लेने का ही अधिकार होगा। अंतिम बिल, शुरुआती अनुमान से एक निश्चित राशि तक ही ज्यादा हो सकता है। विधेयक में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए एक नियामक तय करने की बात भी कही गई है। 

हाल में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर ऐंड डाइजेस्टव साइंस, कोलकाता में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि चिकित्सकों को मरीजों की सेवा करते वक्त मानवीयता का परिचय देना चाहिए। हालांकि इस दौरान उन्होंने अस्पतालों और चिकित्सकों पर किए जाने वाले हमलों की भी आलोचना की। फोर्टिस अस्पताल में डायबिटीज और मेटाबॉलिक समस्याओं के विभागाध्यक्ष और निदेशक अनूप मिश्रा कहते हैं, 'चिकित्सकों में संवाद की कमी है। अधिकांश चिकित्सक और कई शल्य चिकित्सक मरीजों से प्रभावी ढंग से बात नहीं कर पाते।' 

भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) के अध्यक्ष के के अग्रवाल कहते हैं कि मरीज अब भक्ति युग से ज्ञान युग में प्रवेश कर गए हैं।  अब उनको बीमारी और इलाज के बारे में सब पता है वे पहले की तरह चिकित्सकों पर अंधा विश्वास नहीं रखते। इसके विपरीत चिकित्सक अब तक वहीं अटके हैं जहां उनसे सवाल किए जाने पर उनको लगता है कि उनके अधिकार को चुनौती दी जा रही है। 

आईएमए के एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में पता चला है कि अधिकांश लोग चाहते हैं कि चिकित्सक आगे आकर अपने और अपनी योग्यता के बारे में बताएं, उनकी बातों को विस्तार से सुनें, बीमारी के बारे में उनको विस्तार से बताएं और भलीभांति समझने के बाद ही इलाज करें। जाहिर सी बात है चिकित्सकों को संवाद की इस कमी पर बात करनी है। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक मरीजों की नाराजगी बनी रहेगी। मरीजों और उसके साथ आए लोगों की पहली मुलाकात किसी जूनियर डॉक्टर से होती है। हाल की घटनाओं के बाद कुछकदम उठाए गए हैं। मुंबई के सायन अस्पताल में दो महीने पहले एक मृत मरीज के परिजन द्वारा मारपीट किए जाने के बाद अब नए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

हमले के बाद के दिनों में पुलिस ने वहां संरक्षण प्रदान किया। अब महाराष्ट्र सुरक्षा बल बोर्ड के लोग यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि एक मरीज के साथ दो से अधिक लोग अस्पताल में न जाएं। अस्पतालों में चिकित्सकों को सरकार के आश्वासन से भी राहत मिली है जिसने कहा है कि पुलिस हमला करने वालों पर त्वरित कार्रवाई करेगी और चोटिल होने वालों के इलाज और कानूनी सहायत की राशि उनसे वसूल की जाएगी। महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ रीजनल डॉक्टर्स के सचिव गगन सिंह कहते हैं, इस पेशे में आते वक्त हमें पता था कि हमें 24 से 36 घंटों तक काम करना पड़ सकता है। हम केवल बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।

कोलकाता के सेठ सुखलाल करनानी मेमोरियल सरकारी अस्पताल में मार्च में जूनियर डॉक्टर्स पर हमला हुआ क्योंकि वे कथित तौर पर एक मरीज को भर्ती करने में देरी कर रहे थे। वहां नए सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं लेकिन फिर भी सुरक्षा अपर्याप्त है। दिन के समय वहां 60 से अधिक गार्ड रहते हैं जबकि रात में उनकी तादाद घटकर 40 हो जाती है।

आईएमए के अग्रवाल कहते हैं कि उनका संघ एक कानून के लिए संघर्ष कर रहा है जो बलात्कार या बाल शोषण के कानून जैसा कड़ा हो।उसके आने से लोगों को चिकित्सकों के साथ उलझने में कुछ तो भय होगा। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक अस्पताल कोई कसर नहीं उठा रखना चाहते। दक्षिणी दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में लिखा है कि हिंसा कमजोरों का हथियार है। हमारे चिकित्सकों का साथ दीजिए जो दिन रात लोगों के लिए जुटे रहते हैं। हाल के दिनों की घटनाओं को देखते हुए अस्पताल ने सुरक्षा बढ़ा दी है और चिकित्सकों और कर्मचारियों को इस बात का प्रशिक्षण दिया है कि वे आक्रामक व्यवहार वाले लोगों को पहचान लें।

नई दिल्ली स्थित राम मनोहर लोहिया अस्पताल के प्रोफेसर और बर्न विभाग के प्रमुख समीक भट्टाचार्य कहते हैं मरीजों की हालत, उनकी बीमारी और उनके पैसे के चलते ऐसी वारदात होती हैं। वह अपने छात्रों को बताते हैं कि एकदम शुरू से ही स्पष्ट संवाद ऐसे हमलों को टाल सकता है। फिलहाल के लिए तो अधिकांश अस्पतालों ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर ली है लेकिन उनको छवि खराब होने का डर भी है। उनके सुरक्षाकर्मी सादे कपड़ों में रहते हैं और मौका पडऩे पर तुरंत सामने आते हैं। 

राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 20 वर्ष से कुछ ज्यादा उम्र का एक गार्ड वीआईपी पार्किंग के करीब तैनात है। वह कहता है कि लोग अक्सर अस्पताल में सुविधाओं या डॉक्टरों की कमी के लिए उसके साथ बदतमीजी करते हैं लेकिन वह विरोध नहीं करता। हां, हालात बिगड़ने पर बाउंसर बुलाए जाते हैं। लोग चिकित्सा में प्राथमिकता दिए जाने की मांग लेकर भी भिड़ जाते हैं। गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में हर 50 मीटर पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। तमाम जगहों पर काले सफारी सूट में सुरक्षाकर्मी देखे जा सकते हैं। कदम-कदम पर पूछा जाता है कि आप वहां क्यों आए हैं। लोगों की मदद करने वाले चिकित्सा क्षेत्र को खुद जबरदस्त सुरक्षा की आवश्यकता पड़ रही है।

हड़ताल की धमकी

भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) ने देश के सरकारी और निजी अस्पतालों में डॉक्टरों पर होने वाले हमलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए 18 अगस्त को देशव्यापी हड़ताल करने की चेतावनी दी है। आईएमए ने मंगलवार को दिल्ली में आयोजित प्रदर्शन मार्च के दौरान सरकार से डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून लाने की मांग रखी। आईएमए ने कहा कि अगर डॉक्टरों की सुरक्षा के उपाय नहीं किए गए तो उसके सदस्य डॉक्टर 18 अगस्त से देश भर में हड़ताल पर चले जाएंगे। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय में डॉक्टरों पर मरीजों के रिश्तेदारों की तरफ से मारपीट की घटनाएं काफी बढ़ी हैं। मरीजों के रिश्तेदार डॉक्टरों पर इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। दूसरी तरफ डॉक्टरों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और मरीजों की अधिकता को देखते हुए उनकी भी सीमाएं हैं। 

 (रिपोर्ट में मुंबई से रंजीता गणेशन और कोलकाता से अभिषेक रक्षित का योगदान)
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