Search BS HindiWeb         Follow us on 
Business Standard
Wednesday, June 28, 2017 12:29 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

मोदी सरकार के कार्यकाल की देन है नई मंदी

मिहिर शर्मा /  June 06, 2017

मौजूदा सरकार को विरासत में ऐसी अर्थव्यवस्था मिली थी जो सुधार की राह पर थी लेकिन उसके कार्यकाल में मंदी का नया चक्र शुरू हो गया है। विस्तार से बता रहे हैं मिहिर शर्मा 

अब इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि बीते एक वर्ष में अर्थव्यवस्था ने अपनी लय खो दी है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के ताजा आंकड़े इसकी बानगी हैं। इसमें कई बातें ध्यान देने लायक हैं। ये आंकड़े न केवल वार्षिक आधार पर मंदी को दर्शाते हैं बल्कि अलग-अलग तिमाहियों में भी मंदी प्रत्यक्ष नजर आती है। 

 
वृद्घि के कुछ प्रासंगिक तिमाही आंकड़ों पर नजर डालते हैं। इनके लिए वर्ष 2011-12 को आधार वर्ष माना गया है। वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही में जनवरी से मार्च 2016 तक वृद्घि दर 8.7 फीसदी रही। वहीं वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही में अप्रैल से जून के बीच यह 7.6 फीसदी रही। जुलाई से सितंबर 2016 के दौरान यह 6.8 फीसदी रही। अक्टूबर से दिसंबर 2016 की बात करें तो यह 6.7 फीसदी रही। कैलेंडर तिमाही में यह महज 5.6 फीसदी रही। यानी तिमाही आधार पर 8.7 फीसदी से गिरकर सीधे 5.6 फीसदी की वृद्घि दर। वह भी उस एक साल में जब मॉनसून बेहतरीन था और विश्व अर्थव्यवस्था में सुधार का चक्र चल रहा था। 
 
इन आंकड़ों का अध्ययन यह बताता है कि नोटबंदी की प्रक्रिया कितनी गैरजिम्मेदारी भरी रही। इसने पहले से ही धीमी चल रही आर्थिक गतिविधियों पर जबरदस्त चोट कर दी। कोई भी यह उम्मीद नहीं करता कि नोटबंदी जैसी त्रासद गतिविधि का प्राथमिक प्रभाव भी हमेशा बरकरार रहेगा। ऐसे में जाहिर है सुधार तो होना ही था। बहरहाल बतौर नीति इसके अध्ययन और देश में सर्वोच्च स्तर पर नीति निर्माण की प्रक्रिया की गुणवत्ता को लेकर और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है क्योंकि यह बात देश में निवेश के इरादों को प्रभावित करती है। यहां पर दूसरा प्रासंगिक बिंदु आता है। देश में निवेश पहले ही संकट का शिकार है। वर्ष 2016-17 में सकल स्थायी पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) जीडीपी के 29.5 फीसदी के बराबर था जबकि ठीक एक वर्ष पहले यह 30.9 फीसदी था। वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में जीएफसीएफ में और कमी आई और यह बस 28.5 फीसदी पर रह गया। निजी निवेश में कमी आई है और इसमें कोई दो राय नहीं। सरकार ने इससे निपटने के लिए अनदेखी करने की रणनीति अपनाई है। सरकार ने सरकारी निवेश पर अधिक ध्यान दिया है। लेकिन उसका आकार इतना बड़ा नहीं है कि वह निजी निवेश का मुकाबला कर सके। सरकार का मानना है कि अगर बुनियादी ढांचा तगड़ा किया जा सका तो निजी निवेश भी आने लगेगा। पता नहीं सरकार इस विफल नीति के साथ कितना आगे जाएगी? 
 
सवाल यह है कि निवेश में सुधार के लिए क्या करने की आवश्यकता है? बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार के लिए बैंकिंग व्यवस्था की सफाई आवश्यक है। इसके अलावा ऋण की गति में सुधार करना होगा। सरकार बीते कुछ महीनों में सही दिशा में बढ़ी है। उसने आरबीआई को कुछ और अधिकार दिए हैं ताकि बैंकिंग क्षेत्र की समस्या हल की जा सके। लेकिन साफ कहा जाए तो बैंकिंग संकट में जितनी कोशिशों की जरूरत है उसकी तुलना में बहुत कम प्रयास हो पा रहे हैं। 
 
ऋण की समस्या दरअसल मूल समस्या का आधा हिस्सा है। बड़ी दिक्कत यह है कि निवेशक भविष्य की गुलाबी तस्वीर से तनिक भी प्रभावित नहीं हैं। सरकार को वास्तविक तौर पर नीतिगत स्पष्टïता, एकरूपता और स्थिरता कायम करनी होगी केवल तभी काम बन पाएगा। इसके लिए दो काम करने होंगे। पहली बात, लालफीताशाही से निपटना होगा। सही मायनों में विनियमन करना होगा। नियमों में बदलाव करने होंगे ताकि निवेशकों के मन में भविष्य को लेकर किसी तरह की चिंता पैदा न हो। और दूसरा नियामकीय स्वतंत्रता में इजाफा किया जाए। और न्यायिक क्षमता में भी विस्तार किया जाए। बाद वाले बिंदु की बात करें तो सरकार इस मामले में आगे बढऩे के बजाय पीछे हटती नजर आ रही है। इसमें आश्चर्य नहीं है कि निवेशक जरूरत के मुताबिक आगे नहीं आ रहे हैं। 
 
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मोदी सरकार अहम ढांचागत सुधारों के मोर्चे पर भी खरी नहीं उतरी है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि जीएसटी और दिवालिया कानून बुरी तरह कमजोर होने के बाद कुछ खास मायने नहीं रखते। लेकिन जो सुधार अब तक नहीं लिए गए उनकी सूची भी खासी लंबी है। श्रम सुधार को राज्यों के भरोसे छोड़ दिया गया है। मंडियों का डिजिटलीकरण करने के बजाय अगर कृषि विपणन के प्रतिबंधात्मक प्रावधानों को खत्म किया जाता तो कहीं अधिक बेहतर होता। मंडियों के डिजिटलीकरण ने इक्कादुक्का सफलता के अलावा आपूर्ति शृंखला में कोई खास कामयाबी नहीं दिलाई है। एलईडी बल्ब, घरेलू गैस और डिजिटल भुगतान जैसी बातों पर ऊर्जा लगाई गई है जबकि देश की अर्थव्यवस्था की गति दुरुस्त करने संबंधी जरूरी सुधारों पर ध्यान नहीं दिया गया है। 
 
अभी प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल को विफल घोषित करना बहुत जल्दबाजी होगी। लेकिन फिर भी यह आवश्यक है कि हम सीएसओ के ताजातरीन आंकड़ों का विश्लेषण कर वृद्घि दर का अध्ययन करें। वर्ष 2011-12 से अब तक के आंकड़ों का अध्ययन करके यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वृद्घि दर में क्या बदलाव आया है। मुद्रास्फीति के आकलन आदि के तरीके में कुछ बदलाव के साथ ये आंकड़े निकाले जा सकते हैं। वर्ष 2012-13 के लिए यह दर 5.5 फीसदी रही, वर्ष 2013-14 में 6.4 फीसदी, 2014-15 में 7.5 फीसदी, 2015-16 में 8 फीसदी और वर्ष 2016-17 में 7.1 फीसदी। इससे पता चलता है कि वर्ष 2012-13 में हम निम्रतम स्तर पर थे। वह संप्रग दो का सबसे खराब कार्यकाल वर्ष था। प्रणव मुखर्जी के राष्टï्रपति बनने के बाद जरूर सुधार की प्रक्रिया आरंभ हुई। पिछले साल तक हमें तेल की कमजोर कीमतों का लाभ मिलता रहा फिर हालात बदल गए। 
 
अब सरकार पिछली सरकार को भी दोष नहीं दे सकती क्योंकि काफी वक्त बीत चुका है और आंकड़े स्पष्टï बताते हैं कि सुधार का चक्र पिछली सरकार के कार्यकाल में ही शुरू हुआ था। मंदी का नया दौर नई सरकार के कार्यकाल में आया है। उसे उसकी विफलताओं के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। ढांचागत सुधारों की कमी और नोटबंदी जैसे संकट उसने ही पैदा किए। दिक्कत यह है कि इस सरकार को आंकड़ों से कोई लेनादेना ही नहीं है। अरुण शौरी की बात याद कीजिए कि ये सरकार अर्थव्यवस्था का नहीं सुर्खियों का प्रबंधन करती है। मेरा सुझाव है कि सरकार को मंदी की वजह तलाश करनी चाहिए। इसके लिए मंदी को सुर्खियां बनाना पड़े तो वह भी करें। 
Keyword: india, economy, NPA, bank,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या जीएसटी से बढ़ेगी छोटे कारोबारियों की मुश्किलें?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.