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भारत के लिए अवसर

संपादकीय /  June 05, 2017

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 68 वर्ष पुराने नाटो समझौते के अहम प्रतिरोध के प्रावधान पर देश की प्रतिबद्घता को नए सिरे से दोहराने से मना कर दिया था। इससे यह संकेत निकला कि दूसरे विश्व युद्घ के बाद की विश्व व्यवस्था में अहम बदलाव आ रहा है। पिछले दिनों पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने के उनके निर्णय को भी उतना ही महत्त्व दिया जाना चाहिए। एक प्रकार से अमेरिका ने वैश्विक नेतृत्व का भी समर्पण कर दिया है। कोयला खनन संबंधी रोजगार पैदा करना ट्रंप का एक अहम वादा था लेकिन सच यह है कि कोयला खनन संबंधी रोजगारों का स्थान तेजी से स्वचालन ले रहा है और नवीकरणीय ऊर्जा से पैदा हो रहे रोजगार राष्ट्रपति के वादे को धक्का पहुंचा सकते हैं। 

 
जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका के इस कदम का क्या असर होगा, इसका आकलन किया जा रहा है। परंतु चीजें बहुत स्पष्टï नहीं हैं। जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल के शब्दों में कहें तो अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश के अस्वीकरण, (जैसा कि क्योटो प्रोटोकॉल के वक्त हुआ था, अमेरिकी कांग्रेस ने उसे भी स्वीकृत नहीं किया था) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा ही भाव है जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र को अब विश्वसनीय साथी नहीं माना जा रहा है। आश्चर्य नहीं कि अधिनायकवादी चीन जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है और दूसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक भी है, उसने इसका फायदा उठाया। इस वर्ष दावोस शिखर बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वैश्वीकरण के  महत्त्व पर बात की। यह ट्रंप के संरक्षणवाद को संबोधित वक्तव्य था। उनकी सरकार पहली ऐसी सरकार थी जिसने अमेरिका के पीछे हटने के बाद यूरोपीय संघ से संपर्क किया कि वह पेरिस समझौते के अधीन अपनी प्रतिबद्घता दोहराए। इसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यूरोप से पेरिस समझौते के साथ होने की जो टिप्पणी की है वह भारत को एक जिम्मेदार देश का दर्जा प्रदान करती है। इस मामले में वह चीन का निकट सहयोगी नजर आता है। दोनों देश मिलकर जलवायु परिवर्तन पर दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। 
 
ट्रंप ने ऐसे आंकड़ों पर भरोसा किया जो अविश्वसनीय तौर पर यह बताते थे कि भारत और चीन को कार्बन उत्सर्जन के मामले में अमेरिका से ज्यादा रियायत मिली हुई है। उनके वक्तव्य में तीन तथ्यों की अनदेखी कर दी गई। पहली, भारत कुल वैश्विक उत्सर्जन के बमुश्किल पांच फीसदी के लिए जिम्मेदार है और उसका प्रति व्यक्ति 2 टन उत्सर्जन अमेरिका के 20 टन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के 10वें हिस्से के बराबर है। दूसरी बात वर्ष 2030 तक जहां चीन का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 14 टन होने का अनुमान है (वर्तमान में 8 टन) वहीं भारत का अनुमान अधिकतम 7 टन तक ही पहुंचता है। तीसरी बात, मोदी सरकार वर्ष 2030 तक अपनी कुल बिजली का 40 फीसदी नवीकरणीय स्रोतों से हासिल करने के लिए काफी उत्साह के साथ काम कर रही है। इसमें वर्ष 2022 तक 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा हासिल करने का लक्ष्य शामिल है।
 
भारत इस समय चीन और जापान के बाद सबसे बड़ा सौर ऊर्जा बाजार है। ट्रंप ने कहा कि भारत स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों के लिए अमेरिका पर निर्भर है। यह सही नहीं है। ये योजनाएं पूरी तरह घरेलू फंडिंग पर आधारित हैं जो कोयला उपकर से आता है। अब इसे बढ़ाकर 50 रुपये प्रति टन की जगह 400 रुपये प्रति टन कर दिया गया है। हालांकि 54,000 करोड़ रुपये के स्वच्छ ऊर्जा फंड की काफी राशि का इस्तेमाल नहीं हुआ है। जनवरी तक सिर्फ आधी राशि स्वच्छ पर्यावरण फंड में डाली गई। इन परियोजनाओं पर केवल 9,000 करोड़ रुपये व्यय हुए। पेरिस में उत्पन्न संकट भारत के लिए अवसर है कि वह इस दिशा में प्रयास बढ़ाए।
Keyword: america, ट्रंप, नाटो समझौते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप,
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