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गिरावट का रुझान, खरीद सकते हैं अपना मकान

संजय कुमार सिंह /  June 04, 2017

रियल एस्टेट के बाजार पर नोटबंदी का असर काफी हद तक खत्म हो गया लगता है और यह भी लगता है कि बाजार एक बार फिर नवंबर से पहले के स्तर पर पहुंच गया है। सरकार ने नोटबंदी के जरिये काले धन पर जब चोट की थी तब कई खरीदारों को कीमतों में 30 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट की उम्मीद लगने लगी थी। इसी वजह से उन्होंने मकान खरीदने का इरादा भी टाल दिया था। लेकिन इतनी अधिक गिरावट नहीं आई।
यह बात अलग है कि रियल्टी के बाजार में खरीदारों के लिए इस समय जबरदस्त गुंजाइश है। इसकी वजह यह है कि कीमतें या तो स्थिर हैं या बहुत धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। इसके अलावा कुछ राज्यों द्वारा रियल एस्टेट विनियमन एवं विकास अधिनियम (रेरा) लागू किए जाने से रियल एस्टेट बाजार में पारदर्शिता लाने में मदद मिलेगी।
एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख ने हाल में बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया था, 'रेरा से खरीदारों में आत्मविश्वास आएगा। इससे इस उद्योग का काम करने का तरीका बदलेगा और बड़े स्तर पर पारदर्शिता आएगी। पारदर्शिता होगी तो मकान खरीदने वाले सोच-समझकर बेहतर फैसले ले सकेंगे।'
विशेषज्ञों का कहना है कि आम तौर पर भारतीय खरीदार मई से सितंबर के बीच प्रॉपर्टी की खरीदारी नहीं करते क्योंकि इस दौरान छुट्टिïयां होती हैं, बारिश का मौसम होता है और कुछ धार्मिक कारण भी होते हैं। फिर भी जिन्हें अच्छे सौदों की तलाश है, उनके लिए यह वक्त अच्छा है।

दिल्ली-एनसीआर
इस इलाके में पिछले तीन साल से चली आ रही मंदी अब भी जारी है। इतनी लंबी मंदी के लिए एक नहीं, कई कारक जिम्मेदार हैं। कुशमैन ऐंड वेकफील्ड (भारत) के प्रबंध निदेशक अंशुल जैन कहते हैं, '2010 से 2012 के बीच यानी केवल दो साल में ही संपत्तियों के दाम दोगुने हो गए थे, जिससे इन्हें खरीदना आम खरीदारों की हैसियत से बाहर हो गया था। उस दौरान निवेश के लिहाज से मकान और संपत्ति खरीदने वाले तो बहुत सक्रिय थे। लेकिन अंत में जब कीमतों में उफान रुका तो निवेश करने वालों का पैसा अटक गया। इसीलिए अब वे प्राथमिक बाजार से दूर ही हैं। दूसरी ओर जिन्हें अपने रहने के लिए मकान या संपत्ति खरीदनी थीं, वे इसलिए दूर हैं क्योंकि उन्हें बिल्डरों पर भरोसा नहीं रहा। कई डेवलपर समय पर परियोजनाएं पूरी करने में नाकाम रहे हैं। कुछ छोटे बाजारों में जरूरत से बहुत ज्यादा मकान तैयार हो गए हैं और द्वारका एक्सप्रेसवे जैसी प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के निर्माण में देर हो रही है। इनके कारण भी मंदी कुछ लंबी चल गई।'

मुंबई
नोटबंदी की वजह से अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई थी, लेकिन जनवरी-मार्च तिमाही के दौरान हालात सुधर गए और बिक्री एक बार फिर जनवरी-मार्च, 2016 के स्तर तक पहुंच गई है। प्रॉप टाइगर डेटा लैब्स के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी से मार्च तिमाही के दौरान देश के शीर्ष 9 शहरों में हुई कुल बिक्री में मुंबई की हिस्सेदारी 23 फीसदी रही है। इसी तरह नई परियोजनाओं की शुरुआत के मामले में मुंबई ने 26 फीसदी योगदान किया है। मुंबई में जो मकान बिके हैं, उनमें लगभग आधे 50 लाख रुपये से कम कीमत के थे और 26 फीसदी 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक के।
शीर्ष 9 शहरों में 25 लाख रुपये से कम कीमत वाले जितने भी मकान बनने शुरू हुए, उनमें मुंबई की हिस्सेदारी 35 फीसदी रही। प्रॉपटाइगर डॉट कॉम के मुख्य रणनीतिक अधिकारी सुनील मिश्रा ने कहा, 'वित्त वर्ष 2017 की चौथी तिमाही में नोटबंदी की वजह से औसत कीमत 2 फीसदी नीचे आईं, लेकिन इससे पहले के तीन साल की तुलना में कीमतें 2 फीसदी अधिक हैं।'
हैदराबाद
पिछले कुछ सालों में आईटी उद्योग ने भारी मात्रा में वाणिज्यिक क्षेत्र खरीदा या किराये पर लिया है। वाणिज्यिक क्षेत्र में मांग ज्यादा रहने का असर आवासीय क्षेत्र में भी आया है। यह बात अलग है कि वाणिज्यिक मांग बढऩे के करीब छह महीने बाद आवासीय संपत्तियों की मांग बढ़ी। सीबीआरई साउथ एशिया के प्रमुख (आवासीय सेवाएं) ए एस शिवरामकृष्णन कहते हैं, 'देश के अन्य अग्रणी शहरों की तुलना में यहां संपत्तियों के दाम शायद सबसे अधिक किफायती हैं। यही वजह है कि यहां दाम बढऩे की संभावना भी उन शहरों के मुकाबले अधिक है, जहां दाम पहले ही बहुत अधिक हो चुके हैं।' हैदराबाद में बुनियादी ढांचा भी बहुत अच्छा है, जिसका रियल्टी की मांग बढऩे में अच्छा खासा योगदान रहा है।

बेंगलूरु
नोटबंदी के बाद बहुत से खरीदारों ने कीमतों में भारी गिरावट की उम्मीद में खरीद के अपने फैसले टाल दिए थे। अब वे बाजार में लौट रहे हैं। बेंगलूरु में मकानों और संपत्तियों की पूछताछ बढ़ रही है और सौदे भी बढ़ रहे हैं। बेंगलूरु की एक रियल एस्टेट ब्रोकिंग कंपनी सिल्वरलाइन रियल्टी के प्रबंधक साजिद कहते हैं, 'इस बाजार का रुख उसी से तय होता है, जिसे संपत्ति का इस्तेमाल करना है। इसके अलावा लोगों के भीतर रियल एस्टेट में अपना निवेश फंसाए रखने की क्षमता बहुत अधिक है। जिन लोगों ने रियल्टी में निवेश किया है, उनमें से अधिकतर ने अपना अतिरिक्त धन उसमें लगाया है और हाल-फिलहाल उन्हें उसकी जरूरत नहीं पडऩे वाली। यही वजह है कि नोटबंदी के बाद भी यहां कीमतों में बहुत अधिक गिरावट नहीं आई है।'

चेन्नई
2009 से 2013 तक चेन्नई के कुछ छोटे बाजारों में रियल्टी की कीमतें 25 से 30 फीसदी तक चढ़ गई थीं। उस समय लोगों के लिए मकान खरीदना दूभर हो गया था। लेकिन 12 से 18 महीने तक मंदी रहने के बाद अब चौथी तिमाही में बिक्री ने एक बार फिर जोर पकड़ा है। ओल्ड महाबलिपुरम रोड जैसे इलाकों में सौदे खास तौर पर तेज हो रहे हैं। शिवरामकृष्णन कहते हैं, 'जो प्रॉपर्टी तैयार हैं या जिनका कब्जा मिलने वाला है, उन्हें खरीदार हाथोहाथ ले रहे हैं। यह बाजार फिर से बढऩे लगा है और 3,000 से 3,500 रुपये प्रति वर्ग फुट की कीमत वाली संपत्तियां खास तौर पर मांग में हैं।'

अहमदाबाद
इस शहर में बिक्री ने अच्छा खासा जोर पकड़ा है। वित्त वर्ष 2017 की चौथी तिमाही में बिक्री उससे साल भर पहले की तिमाही के मुकाबले करीब 30 फीसदी बढ़ गई। इसमें भी दो-तिहाई बिक्री 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले मकानों की रही। मिश्रा कहते हैं, 'कीमतें लगभग स्थिर ही रही हैं। पिछले तीन साल के दौरान कीमतों में महज 6 फीसदी इजाफा हुआ है।'



बिना बिके मकान बने आफत-ए-जान
जितनी मांग है, उसके मुकाबले ज्यादा मकान बन जाने और कीमतों में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं होने के कारण बाजार इस वक्त ग्राहकों के ज्यादा अनुकूल है और उनके हिसाब से ही चल रहा है।
जैन कहते हैं, 'एनसीआर में कीमतें 2013 की तुलना में 10 से 20 फीसदी कम हैं। अगर आप यह हिसाब भी जोड़ लें कि इस दौरान रुपये की कीमत में कितनी कमी आई है तो आपको पता चलेगा कि कीमतें रिकॉर्ड निचले स्तर पर हैं।'
साजिद ने कहा कि इतनी भारी तादाद में मकान मौजूद होने के कारण खरीदारों के पास विकल्पों की भरमार है। उन्होंने कहा, 'इस समय बिल्डर कीमतों के मामले में मोलभाव करने के लिए तैयार हैं।' आवासीय ऋण पर ब्याज की दरें भी घटकर 8.35 फीसदी से 8.50 फीसदी के बीच चल रही हैं। इससे लोगों की खरीद क्षमता काफी बढ़ गई है।
हालांकि एक बात का ध्यान रखना होगा। बिल्डरों विशेष रूप से छोटे बिल्डरों की माली हालत अच्छी नहीं है। इसीलिए खरीदारों को यह देखना होगा कि मकान वक्त पर मिलेगा या नहीं। इस मामले में जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना होगा। जैन कहते हैं, 'जो परियोजना पूरी हो चुकी है या पूरी होने ही वाली है, उसी में मकान खरीदने की कोशिश करें। वही परियोजना चुनें, जिसमें कब्जा जल्द से जल्द मिलना तय हो। इस बात की संभावना बहुत कम है कि निर्माणाधीन संपत्तियों को रेरा के दायरे में लाया जाएगा। इसीलिए अगर आप निर्माणाधीन संपत्ति खरीदते हैं तो किसी ऐसे प्रतिष्ठित डेवलपर को ही चुनें, जिसने पहले अपनी परियोजनाएं समय पर तैयार की हों।'
मिश्रा चेतावनी देते हुए कहते हैं कि जो लोग अभी तक फैसला नहीं कर पाए हैं, उन्हें जल्द से जल्द फैसला कर लेना चाहिए। वह कहते हैं, 'अगर लोगों को लगता है कि नोटबंदी और रेरा इस क्षेत्र का कायाकल्प कर देंगे तो याद रखिए कि यहां मांग जल्द ही बढऩे लगेगी।
प्राइवेट इक्विटी निवेशक ऐसा ही मानते दिख रहे हैं और इसी कारण वे भारी निवेश भी कर रहे हैं। अभी कुछ और तिमाहियों तक दाम ठहरे रह सकते हैं क्योंकि पहले से मौजूद मकान बिकने में वक्त लगेगा। लेकिन उसके बाद कीमतें बहुत तेजी से बढ़ेंगी।' इसीलिए चतुर खरीदारों को इसी वक्त मकान खरीद लेने चाहिए।

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