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आम सहमति की लड़ाई

संजीव मुखर्जी /  June 02, 2017

पिछले महीने की शुरुआत में जीन अभियांत्रिकी मंजूरी समिति (जीईएसी) ने जीन संवर्धित (जीएम) सरसों की वाणिज्यिक बिक्री को अपनी मंजूरी दे दी थी। हमेशा की तरह गोपनीयता बरतने के लिए यह घोषणा अनौपचारिक रूप से की गई, लेकिन कुछ ही मिनटों में यह खबर सभी जगह पहुंच गई। अब तक न तो जीईएसी और न ही केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की तरफ से मंजूरी को लेकर कोई औपचारिक बयान जारी किया गया है। केवल जीएम सरसों पर बहुधा पूछे जाने वाले सवालों को सार्वजनिक किया गया है, जिनमें उत्पाद, परीक्षण, सुरक्षित होने को लेकर बेबुनियाद चिंताओं आदि के बारे में बताया गया है। 

 
लेकिन फिर भी इसमें कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब नहीं दिया गया है। भारत की पहली जीएम खाद्य फसल जीएम बैगन की तरह सरसों को लेकर भी देश में तीखी राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। जीएम के समर्थक और विरोधी कार्यकर्ता इसके समर्थन और विरोध में अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। इस जीएम फसल के विरोधी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जीईएसी ने सुरक्षित होने की उचित जांच के बिना ही जीएम सरसों को मंजूरी दे दी। इससे भी अहम बात यह है कि उन्होंने मुख्य आवदेक दीपक पेंटल के उत्पादन बढ़ोतरी के दावों पर सवाल उठाया है। पेंटल दिल्ली विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स के प्रमुख हैं। 
 
ये दावे किए जा रहे हैं कि जीईएसी द्वारा मंजूूर की गई धारा मस्टर्ड हाइब्रिड (डीएमएच)-11 की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता वर्तमान किस्मों की तुलना में 20 से 30 फीसदी अधिक है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यह बढ़ोतरी पुरानी किस्मों की तुलना में है, न कि उन्नत हाइब्रिड किस्मों की तुलना में। जाने-माने खाद्य नीति विश्लेषक देवेंद्र शर्मा ने बिज़नेस-स्टैंडर्ड डॉट कॉम में प्रकाशित एक आलेख में कहा कि यह निष्कर्ष रूप में दिखाया जा चुका है कि देश में पहले से ही उच्च उत्पादकता वाली चार किस्में मौजूद हैं। 
पायोनियर और एडवांटा द्वारा उत्पादित दो अन्य किस्में भी इस किस्मों से ज्यादा या बराबर उत्पादकता देती हैं। शर्मा ने कहा, 'इसलिए मुझे यह समझ नहीं आता कि भारत ने किस तरह कम उत्पादकता वाली जीएम सरसों की खेती कर खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने की योजना बनाई है?'
 
पेंटल ने मिंट को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि डीएमएच-11 को वर्तमान किस्मों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने की वजह यह थी कि वर्तमान किस्मों के इस्तेमाल से बड़ी मात्रा में शुद्ध हाइब्रिड का उत्पादन संभव नहीं होगा। वह कहते हैं कि डीएमएच-11 में ऐसे गुण हैं, जिससे तेजी से मल्टीप्लीकेशन में मदद मिलती है। पेंटल ने दावा किया है कि डीएमएच-11 बीजों की दूसरी और तीसरी पीढिय़ां ऐसी किस्में विकसित करेंगी, जिनकी पहली पीढ़ी के बीजों की तुलना में ज्यादा उत्पादकता होगी। 
 
गोपनीयता और अपर्याप्त सुरक्षा परीक्षण के दूसरे तर्क की भी अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि जीएम सरसों के सुरक्षित होने और स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं के मूल्यांकन के लिए पारदर्शी तरीके से पर्याप्त परीक्षण नहीं किए गए हैं। सरकार ने संशोधित बहुधा पूछे जाने वाले सवालों में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा जारी दिशानिर्देशों के मुताबिक किए गए सुरक्षा परीक्षणों का व्यापक ब्योरा सामने रखा है। सरकार ने यह स्वीकार किया है कि सरकारी संस्थानों द्वारा किए गए परीक्षण निजी संस्थानों की तुलना में ज्यादा विश्वसनीय हैं। 
 
कृषि एक संवेदनशील राजनीतिक मसला है। यह देखना बेहद रोचक होगा कि भाजपा की अगुआई वाली सरकार जीएम सरसों की वाणिज्यिक बिक्री शुरू करने का साहस दिखाती है या नहीं। भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी जीएम फसल के खिलाफ है। आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच ने जीएम सरसों की वाणिज्यिक बिक्री के विरोध के लिए अन्य नागरिक संगठनों के साथ हाथ मिलाया है। यह बार-बार सरकार को चेतावनी दे चुका है कि वह मंजूरी को लेकर आगे कदम न बढ़ाए। जीएम सरसों के समर्थक समूहों का तर्क है कि जीईएसी द्वारा स्वीकृत किस्म स्वदेशी है और इसे भारत के खाद्य बाजार पर एकाधिकार के 'बहुराष्ट्रीय षडयंत्र' के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 
 
नीति आयोग के वाइस-चेयरमैन अरविंद पानगडिय़ा ने हाल में कहा था कि जब डीएमएच-11 को इंडियन पेटेंट्स ऑफिस ने मंजूरी दे दी है तो इसके बीज को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। हालांकि स्वदेशी जागरण मंच और अन्य पर्यावरणविदों ने दावा किया है कि डीएमएच-11 में इस्तेमाल जीन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी बेयर के नाम से पेटेंट है। इन सब बहसों के बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे के असमय निधन के कारण इस बहस में नया मोड़ आ गया है। जीईएएसी की मंजूरी के बाद जीएम सरसों को अंतिम मंजूरी दवे को ही देनी थी। गौरतलब है कि दवे को पर्यावरण से संबंधित कई कदम उठाने के लिए जाना जाता है। 
 
कार्यकर्ता वंदना शिवा का कहना है कि यह गलत दिशा में कदम है, इसके अध्ययन के लिए दवे ने इस मसले पर पर्याप्त अध्ययन किया था। शिवा ने दावा किया, 'वह साफ तौर पर इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं थे।' दवे की जगह विज्ञान एवं तकनीक मंत्री हर्षवर्धन ने ली है, जिनकी निगरानी में जैव तकनीक विभाग (डीबीटी)ने काम किया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित बहुधा पूछे जाने वाले सवालों के मुताबिक पेंटल की जीएम सरसों परियोजना का प्रमुख वित्त पोषक डीबीटी रहा है। इससे हितों के टकराव के सवाल खड़े हो गए हैं। बहुत से लोगों ने कहा है कि जीएम सरसों की मंजूरी देने वाला व्यक्ति उस संस्था का प्रमुख नहीं होना चाहिए, जिसने इस परियोजना का वित्त पोषण किया है।  
 
हर्षवर्धन ने हाल में मीडिया के साथ संवाद में अपने पत्ते नहीं खोले। मंत्री ने कहा कि उन्होंने इस मसले से संबंधित फाइलें नहीं देखी हैं क्योंकि उन्होंने इसी सोमवार को पदभार संभाला है। सरकार में भी जीएम सरसों को पूरा समर्थन नहीं मिला है। खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस मंजूरी का विरोध किया था, जबकि कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह का कहना है कि उनका काम उस फसल को प्रोत्साहित करना है, जिसे पर्यावरण मंत्रालय ने अधिसूचित किया है। 
 
भाजपा शासित मध्य प्रदेश और राजस्थान ने अपने यहां जीएम सरसों के परीक्षण की कोशिश को सिरे से खारिज कर दिया है। देश में ये दोनों राज्य सरसों के मुख्य उत्पादक हैं। जीएम सरसों के मामले में अब तक का घटनाक्रम यह रहा है कि सरकार मंजूरी और अपनाई गई प्रक्रिया को गोपनीय बनाए हुए है। वहीं जीएम सरसों को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए हैं और इस विवाद का समाधान नजर नहीं आ रहा है। 
Keyword: GM, जीन अभियांत्रिकी मंजूरी समिति (जीईएसी),
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