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नाकाम उड़ान!

साप्ताहिक मंथन / टी. एन. नाइनन June 02, 2017

बड़ा घोटाला कौन सा है एयर इंडिया या किंगफिशर? एकदम वित्तीय संदर्भ में देखा जाए तो यह कोई सवाल ही नहीं है। एयर इंडिया ने कहीं ज्यादा पैसा डुबाया है और किंगफिशर की तुलना में वह ऋणदाताओं की जेब पर कहीं अधिक भारी बोझ डालेगी। एयर इंडिया की तीन साल पुरानी बैलेंस शीट (सबसे ताजा उपलब्ध बैलेंस शीट वही है) के मुताबिक सरकार ने शेयर पूंजी के रूप में वहां 14,345 करोड़ रुपये का निवेश किया। जबकि विमानन कंपनी ने 49,869 करोड़ रुपये की राशि उधार ली। कुल 64,214 करोड़ रुपये का फंड एक ऐसे कारोबार में डाला गया जिसका कुल राजस्व उस वक्त 19,000 करोड़ रुपये था। तब से आंकड़े बदल गए हैं लेकिन बहुत ज्यादा अंतर नहीं आया है। आधे से अधिक कर्ज कार्यशील पूंजी के खाते में है। लेकिन यह कैसा कारोबार है जिसे उसके सालाना टर्नओवर से अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता है। कंपनी की अचल संपत्ति का मूल्यांकन काफी कम है।

 
इसलिए उक्त कर्ज की वसूली संभव नहीं। समेकित ऋण 30,000 करोड़ रुपये मूल्य से अधिक का है। बैंकों को यह सुझाव दिया गया था कि वे अपने कुछ ऋण को इक्विटी में बदल लें। चूंकि वे किंगफिशर के साथ एक विवादास्पद सौदे में अपने हाथ पहले ही जला चुके थे इसलिए उन्होंने समझदारीपूर्वक इस विचार को खारिज कर दिया। उसके बाद सरकार ने समय-समय पर दिए जाने वाले राहत पैकेज की शुरुआत की और 30,000 करोड़ रुपये दिए। इंडिगो, जेट और स्पाइसजेट (ये तीनों कंपनियां मिलकर एयर इंडिया की तुलना में पांच गुना घरेलू यात्रियों को यात्रा कराती हैं) का संयुक्त कर्ज एयर इंडिया की तुलना में बमुश्किल आधा है। अगर इंडिगो जैसी समृद्घ कंपनी को अलग भी कर दिया जाए तो भी जेट और स्पाइसजेट का इक्विटी और ऋण मिलकर करीब 30,000 करोड़ रुपये है। तो सरकार ने जब एयर इंडिया के लिए 30,000 करोड़ रुपये की नई मदद को मंजूरी दी तो उसके दिमाग में क्या चल रहा था? क्या उसे वाकई उम्मीद थी कि यह राशि लौट आएगी या फिर यह समाजवादी राज्य होने के नाते जनता के पैसे के साथ खिलवाड़ था? बचाव की तीन साल की कोशिशों के बाद उस प्रश्न का जवाब अब सरकार के सामने भी एकदम स्पष्टï हो चुका है। अब फंसे हुए पैसे की खातिर और निवेश करना बेतुका नजर आ रहा है। 
 
निजीकरण अचानक स्वीकार्य नजर आने लगा है। परंतु एक दिवालिया और परिचालन के मामले में अव्यावहारिक हो चुकी विमानन कंपनी को कौन खरीदेगा? सरकार को किसी न किसी को भुगतान करना होगा ताकि वह इसका जिम्मा उठाए। उसे खरीदार को करीब 20,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है। चूंकि यह ठीक नहीं लगता इसलिए इसी बात को थोड़ा घुमाफिराकर पेश किया जा रहा है। मसलन निजीकरण के पहले कर्ज को बट्टे खाते में डालना। बैंक, अन्य कर्जदाता तथा सरकार को करीब 20,000 करोड़ रुपये का बोझ उठाना पड़ेगा। लेकिन वामपंथियों और श्रम संगठनों की बात सुनें तो अगर आप 20,000 करोड़ रुपये की राशि बट्टे खाते में डालने को तैयार हैं तो उसे माफ करके एयर इंडिया को सरकारी क्यों नहीं बनाए रख सकते? कम कर्ज के साथ यह विमानन कंपनी एक बार फिर बेहतर प्रदर्शन कर सकती है! परंतु कर्ज इस विमानन कंपनी की इकलौती समस्या नहीं है। निजी विमानन कंपनियों की कर्मचारियों की लागत राजस्व का करीब 10 फीसदी है। एयर इंडिया में यह 15 फीसदी है। विमानन कारोबार बहुत कम मार्जिन का कारोबार है। ऐसे में लागत का अंतर बहुत मारक होता है। इस कंपनी को खरीदने वाला कोई भी व्यक्ति लागत में कटौती की राह तलाश करेगा। कर्मचारियों के प्रतिरोध की आशंका को देखते हुए कह सकते हैं कि यह आसान नहीं होगा। ऐसे में नागरिक उड्डयन मंत्री का यह मानना उचित ही है कि आखिर में हो सकता है कोई खरीदार न मिले। हो सकता है निजीकरण के लिए काफी देर हो चुकी हो। अगर आप एयर इंडिया को बतौर सरकारी विमानन कंपनी नहीं चलाना चाहते और उसका निजीकरण भी नहीं करना चाहते तो इकलौता विकल्प है इसे बंद करना। 
 
वित्तीय तौर पर यह सबसे समझदारी की बात है क्योंकि कंपनी अपने लैंडिंग और पार्किंग राइट और अंतरराष्ट्रीय उड़ान मार्ग अधिकारों का लाभ ले सकती है। उभरते विमानन बाजार में ये सभी महत्त्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद शुद्घ घाटा ही होगा लेकिन कम होगा। बहरहाल मुझे नहीं लगता कि मोदी सरकार एयर इंडिया को बंद करेगी। इसलिए आखिरकार, माल्या सरकार की तुलना में भाग्यशाली साबित हो सकते हैं। कम से कम उनकी कंपनी का वित्तीय नुकसान बढ़ तो नहीं रहा है।
Keyword: aviation, विमानन air india,,
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