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खुशनुमा अहसास के बगैर धरे रह जाएंगे भावनात्मक मुद्दे

मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  June 01, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असर का अंदाजा लगाने के लिए पिछली घटनाओं का जायजा लेने के बजाय आगे की तरफ देखना अधिक उपयोगी हो सकता है। उनके तीन वर्षों के प्रदर्शन के आधार पर कितनी संभावना है कि वह वर्ष 2019 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटने में सफल रहेंगे? फिलहाल तो मोदी के पक्ष में सबसे अनुकूल बात यह है कि शेयर बाजार लगातार नई ऊंचाइयों पर जा रहा है। इससे वित्तीय क्षेत्र से किसी भी तरह का संबंध रखने वाले लोगों के बीच एक तरह का खुशनुमा अहसास हावी हो सकता है जिनमें आम निवेशक भी शामिल हैं।

 
लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि वर्ष 2004 में भी वाजपेयी सरकार के दौरान 'इंडिया शाइनिंग' अभियान के बीच शेयर बाजार वाजपेयी की जीत की संभावनाओं के खुमार में तेजी का रुख अपनाए हुए था। लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की अप्रत्याशित हार के बाद शेयर बाजार में खासी गिरावट आई थी। अप्रैल 2004 में 5,925 की ऊंचाई पर रहा सेंसेक्स चुनावी नतीजे आने के बाद मई में करीब 1,500 अंक लुढ़क गया था। इस लिहाज से शेयर बाजार से मिलने वाले अच्छे संकेत उपयोगी हो सकते हैं लेकिन इसे हमेशा लोकप्रिय भावना की निशानी नहीं माना जा सकता है। 
 
अर्थव्यवस्था का समग्र प्रदर्शन भी इसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए। वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद 2011 से लेकर 2014 तक विकास दर के पैमाने पर आर्थिक क्षेत्र का प्रदर्शन गिरावट पर था। लेकिन अगर 2011-12 की कीमतों को आधार मानकर 2012-13 और 2013-14 के विकास दर की गणना की जाए तो पहले से प्राप्त आंकड़ों में 2004-05 के आधार वर्ष के मुकाबले एक फीसदी या उससे भी अधिक की बढ़ोतरी दिखेगी। इससे भी अधिक अहम बात यह है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान कृषि मजदूरी 6.8 फीसदी की असाधारण दर से बढ़ी। अशोक गुलाटी के मुताबिक निर्माण क्षेत्र में उफान होने और ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम चलने से कृषि मजदूरी में यह बढ़ोतरी हुई। ऐसे में आंकड़ों को एक खुशनुमा अहसास पैदा करना चाहिए था जिसके दम पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को 2014 की चुनावी वैतरणी पार कर जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नतीजतन हमें यह नहीं पता है कि क्या पिछले तीन वर्षों में आंशिक रूप से बेहतर दिख रहा आर्थिक प्रदर्शन 2019 के चुनाव में राजग के प्रति मतदाताओं के बीच खुशनुमा अहसास पैदा कर पाने में कामयाब हो पाएगा? 
 
अगर आर्थिक आंकड़े मतदाताओं की मनोदशा के बारे में खास मदद नहीं करते हैं तो फिर राजनीति हमें क्या बता सकती है? अभी तक मतदाताओं ने मोदी सरकार को पूरी मजबूती के साथ अपना समर्थन दिया है। वर्ष 2014 की जीत के बाद राजग इस साल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी ऐतिहासिक जीत हासिल करने में सफल रहा है। नोटबंदी के फैसले के बाद इस तरह के नतीजों का आना और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। नवंबर में नोटबंदी का नाटकीय फैसला किया गया जिसका भारतीय इतिहास में कोई सानी नहीं था। लेकिन इस फैसले के चलते जिन आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने का दावा किया गया था, उनमें से कोई भी हासिल नहीं हो सका। इसके अलावा नोटबंदी से मची आपाधापी के चलते नकदी में ही लेनदेन करने वाले गरीब लोगों पर इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ी। इसके बावजूद भाजपा उसके बाद हुए चुनावों में आसानी से जीत गई। गरीब लोगों की खुद कष्ट सहने के बाद भी काला धन जमा करने वाले लोगों पर चोट करने का वादा करने वाले नेता और पार्टी को समर्थन देने की चाहत को इसका श्रेय दिया गया है। इस आकलन पर भरोसा किया जा सकता है लेकिन क्या हमें लोगों के मतदान के तरीकों को समझने के लिए अपने आसपास देखने की भी जरूरत है? लोकसभा चुनाव में भारी जीत हासिल करने वाले नेता और उसकी पार्टी को दिल्ली और बिहार में गंभीर झटके सहने पड़े थे। इस हिसाब से इस साल विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन एक बदलाव की तरफ इशारा करता है। आखिर इसकी क्या वजह रही होगी? 
 
दिल्ली और बिहार के चुनावों में शिकस्त खाने के बाद भाजपा की रणनीति में बदलाव साफ नजर आता है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान 'सबका विकास' का वादा किया था लेकिन उसकी सरकार रोजगार के मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम रही है। ऐसे में भाजपा ने चुनाव अभियानों में हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की नीति अपनाई जिसकी अगुआई गौरक्षा अभियान ने की। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल अगस्त में सीमा लांघने पर गौरक्षकों की कड़ी निंदा की थी लेकिन उसके बाद से वह इस अतिक्रमण के जारी रहने पर भी चुप्पी साधे रहे हैं।
 
फिलहाल भाजपा के लिए गौरक्षा और काले धन पर प्रहार दो प्रभावी मुद्दे हैं। आयकर विभाग जैसे-जैसे काले धन पर अपना शिकंजा कसता जा रहा है, उससे भारत में राजनीति के संचालन के तरीकों के साथ उसकी असंगति भी झलकने लगी है। नियमों में मामूली बदलावों के बावजूद काले धन को राजनीतिक दलों के खाते में खपाना अब भी काफी आसान बना हुआ है। इस तरह काला धन चुनावी राजनीति को तय करने में अहम भूमिका निभाता रहेगा। अगर नेता अघोषित रकम का इस्तेमाल करते हुए सत्ता में आते हैं तो वे काले धन के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितने संजीदा होंगे? लेकिन गौरक्षा अभियान आधे मन से नहीं चलाया जा रहा है। इस मामले में लगातार नई धार दी जाती रही है। हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने वध के लिए पशुओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का जो कानून बनाया है वह इस दिशा में उठाया गया नया कदम है। सबका विकास हो नहीं पा रहा है और सार्थक तरीके से नौकरियां भी नहीं पैदा हो रही हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह स्व-रोजगार के जरिये नौकरी मुहैया कराने की बात कर रहे हैं। धार्मिक और राष्ट्रवादी तेवर कुछ समय के लिए तो कारगर हो सकते हैं लेकिन एक खुशनुमा अहसास के बगैर ये लंबे समय तक टिक नहीं पाते हैं।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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