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ड्रैगन के बहाने उत्तर कोरिया को नकेल

दीपक लाल /  June 01, 2017

अमेरिका कोरियाई प्रायद्वीप में गंभीर रक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक तरफ उत्तर कोरिया के आक्रामक तेवर हैं तो दूसरी तरफ चीन के वर्चस्ववादी मंसूबे। हालात का विश्लेषण कर रहे हैं दीपक लाल


पिछले दिनों मैं मॉन्ट पेरेलिन सोसाइटी (एमपीएस) की एक बैठक में शिरकत करने के लिए सोल गया था। इस क्रम में हॉन्गकॉन्ग और ताइपे में भी रुका था। ये सभी इलाके चीनी ड्रैगन की छाया में रह रहे हैं। चीन के वर्चस्ववादी मंसूबों की झलक फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिग दुतेर्ते के उस बयान में दिखी जिसमें उन्होंने माना कि चीन की तरफ से युद्ध की धमकी मिलने के बाद उन्हें दक्षिण चीन सागर में उत्खनन रोकना पड़ा था। हॉन्गकॉन्ग में हम वर्ष 2014 में छात्रों का अम्ब्रेला आंदोलन देख चुके हैं। हाल ही में हॉन्गकॉन्ग के प्रशासनिक प्रमुख झांग देच्यांग ने कहा है कि इस क्षेत्र की स्वायत्तता चीन के नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों को लागू करने की राह में अवरोधक नहीं बननी चाहिए। लेकिन चीनी ड्रैगन की सबसे लंबी छाया तो ताइवान और कोरिया पर पड़ रही है। 
 
ताइवान की अपनी यात्रा के दौरान मैंने वहां के अधिकारियों से बातचीत में यह महसूस किया कि वे अपने राष्ट्रपति सेई इंग-वेन की अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत करने और रिचर्ड निक्सन के समय से ही स्वीकृत 'एक चीन' नीति पर सवाल उठाने वाले उनके ट्वीट को लेकर खासे उत्साहित थे। लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से फ्लोरिडा में मुलाकात के बाद ट्रंप इस रुख से पीछे हट गए। ट्रंप ने ताइवान के साथ अमेरिका के रिश्तों पर चीन के एतराज को देखते हुए यह कदम उठाया। इसके साथ चीन का अपनी नौसेना का विस्तार जारी रखने और अपनी कमांडो फोर्स में पांच गुना बढ़ोतरी करने जैसे कदमों ने ताइवान को चिढ़ाने का काम किया है और वह अपने भविष्य को लेकर बेचैन नजर आ रहा है। लेकिन फाइनैंशियल टाइम्स के जमील अंदेरलिनी के मुताबिक चैंग सिएन-यी की एक किताब में इसका जिक्र है कि ताइवान का गोपनीय परमाणु हथियार कार्यक्रम 1988 में जब अमेरिकी सरकार के दबाव में रोक दिया गया था तो वह परमाणु बम बनाने से केवल एक-दो साल ही दूर रह गया था। हो सकता है कि चीन की धमकियों को देखते हुए ताइवान अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम गोपनीय ढंग से दोबारा शुरू कर दे। उस स्थिति में वह परमाणु बम बनाने से केवल एक-दो साल की ही दूरी पर होगा।
 
उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर जारी गतिविधियों से यह न केवल दक्षिणी हिस्से में तैनात अपने ही सैनिकों बल्कि अमेरिकी भूभाग पर भी परमाणु हमले का खतरा पेश कर रहा है। चीन के प्रति राष्ट्रपति ट्रंप के रुख में आए बदलाव की एक वजह यह भी हो सकती है कि वह उत्तर कोरिया पर चीन के प्रभाव डालने की उम्मीद कर रहे हों। लेकिन यह उम्मीद कितनी वास्तविक है? मैं 1970 के दशक के मध्य में घटित हो रही कोरियाई आर्थिक परिघटना के समय इस देश के दौरे पर पहली बार गया था। उस समय सोल अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई सैनिकों की मौजूदगी वाला सैन्य गढ़ हुआ करता था। उस समय रात का कफ्र्यू लगता था और हमेशा जंग का खतरा मंडराता रहता था। उसके बाद भी कई बार मुझे दक्षिण कोरिया जाने का अवसर मिला और जैसे-जैसे उसकी आर्थिक तरक्की के चलते उत्तर कोरिया के साथ आर्थिक असमानता बढ़ती गई, वह भाव भी तिरोहित होता गया। लेकिन करीब ढाई दशक बाद एक बार फिर से उत्तर कोरिया के परमाणु एवं मिसाइल कार्यक्रम की वजह से दक्षिण कोरिया में एक नई तरह की बेचैनी महसूस की जा रही है। अगर उत्तर कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम अमेरिकी भूभाग तक मार करने की क्षमता हासिल करने में सफल रहा तो अमेरिका दक्षिण कोरिया की सुरक्षा में लगी अपनी सेना को हटाने के लिए मजबूर हो सकता है। अमेरिकी रक्षा प्रणाली के ही चलते दक्षिण कोरिया अभी तक हमले से बचा हुआ है।
 
लेकिन इसी के साथ कोरियाई प्रायद्वीप के दोनों हिस्सों के एकीकरण की मांग भी शांत नहीं हुई है। जब सोल में एमपीएस की बैठक चल रही थी, उसी दौरान दक्षिण कोरिया में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे थे। उस समय हमने उदारवादी सोच वाले मून जाय-इन को महाभियोग के चलते हटाई जा चुकीं पार्क ग्वेन हे के खिलाफ मिली पुरानी शिकस्त को जीत में बदलते हुए देखा। मून के विदेश नीति सलाहकार चुंग यूई-यंग ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को लिखी चि_ïी में उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग करते हुए कहा है कि 'मून एक औपचारिक शांति प्रक्रिया का प्रस्ताव रखते हैं जो विपरमाणुकरण के साथ चलेगा। इससे अंतिम समाधान के बारे में सभी पक्षों का नजरिया साफ हो सकेगा।' 
 
लेकिन विसैन्यीकृत क्षेत्र में तैनात संयुक्त सेना के कमांडर रह चुके जनरल बरवेल बेल ने एमपीएस बैठक में कहा कि उत्तर कोरिया के किम खानदान के लिए प्राथमिक लक्ष्य अपनी सत्ता को बनाए रखना रहा है। उत्तर कोरिया यह भी चाहता है कि पूरा प्रायद्वीप उसके साम्यवादी नेतृत्व के तहत एकीकृत हो और गठबंधन सहयोगियों के साथ वार्ता के जरिये एक औपचारिक एवं स्थायी शांति संधि को अंजाम दिया जाए जिसके तहत अमेरिकी सेना को हमेशा के लिए हटना होगा। उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने और अपनी सेना को कम कर एक छोटी रक्षात्मक बल तक ही सीमित रखने का वादा कर लेगा और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को अपने परमाणु कार्यक्रम की निगरानी करने का मौका देने के लिए तैयार हो जाएगा। लेकिन अमेरिका की पिछली कई सरकारों के साथ उत्तर कोरिया के ऐसे ही वादों का नतीजा देखें तो पता चलेगा कि अपनी असली मंशा छिपाने के लिए किए गए इन बहानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। जनरल बेल का कहना था कि दक्षिण कोरिया अगर उत्तर कोरिया के साथ कोई शांति समझौता करता है तो यह उसके लिए मौत के फरमान पर दस्तखत करने की तरह होगा। उन्होंने यह भी कहा कि चीन की तरफ से गंभीर दबाव डाले बगैर उत्तर कोरिया कभी भी अपना परमाणु कार्यक्रम बंद नहीं करेगा क्योंकि किम खानदान की सत्ता का वजूद इसी पर टिका है। 
 
क्या ट्रंप की उम्मीदों के अनुरूप चीन उत्तर कोरिया पर इस तरह का दबाव डालेगा? जनरल बेल की मानें तो इसकी संभावना नगण्य है। चीन के लिए तो यथास्थिति ही आदर्श है। अमेरिका कोरियाई प्रायद्वीप में गहरे तक फंसा हुआ है जिसकी वजह से वह पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया में सैन्य दबाव डालने की स्थिति में नहीं है और चीन को दक्षिण चीन सागर में गतिविधियां बढ़ाने से रोक नहीं पा रहा है। लेकिन उत्तर कोरिया की हरकतों से चीन को क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन अस्थिर होने की भी आशंका सता रही है। दक्षिण कोरिया में अमेरिकी मिसाइल-रोधी प्रणाली थाड की तैनाती से भी चीन चिढ़ा हुआ है। उसे लगता है कि इससे एशिया में मिसाइल-रोधी प्रणाली की तैनाती का सिलसिला शुरू हो सकता है जो उसके नाभिकीय खतरा कम करने की क्षमता को कमजोर करेगा और प्रशांत क्षेत्र का शक्ति संतुलन भी बदलेगा। 
 
सवाल है कि इन आशंकाओं के चलते क्या चीन किम शासन को अगली पहल के लिए मनाने की कोशिश करेगा? इसका जवाब तो समय ही देगा। यह अलग बात है कि वह समय भी सीमित रह गया है। अगर किम जोंग उन अमेरिकी जमीन तक मार करने वाली परमाणु मिसाइलों की तैनाती में सफल रहते हैं तो अमेरिका पहले सैन्य कार्रवाई के बारे में भी सोच सकता है। लेकिन इससे दोनों पक्षों को बड़े पैमाने पर नुकसान होने की आशंका को देखते हुए क्या वाकई में इसकी संभावना बनती है? अगर नहीं तो दक्षिण कोरिया और जापान को यह पूछना होगा कि क्या अमेरिका उनके लिए लॉस एंजलिस का बलिदान करने को तैयार होगा? जाहिर है, इसकी भी संभावना नहीं है। ऐसे में अमेरिका पूर्वी एशिया में नाभिकीय निरोधक क्षमता बनाने के लिए बाध्य होगा जिससे इस इलाके में भय का नाभिकीय संतुलन कायम हो सके। इससे तो चीन का पूर्वी एशिया का रहनुमा बनने का सपना चकनाचूर हो जाएगा। जनरल बेल मानते हैं कि चीन के वर्चस्व को रोकने के लिए अमेरिका पश्चिमी प्रशांत और दक्षिण चीन सागर इलाके में सैन्य क्षमता के निर्माण पर ध्यान देगा। चीन और उत्तर कोरिया को साधने के लिए अमेरिका समान विचारधारा वाले देशों को साथ लेकर 'प्रशांत क्षेत्र सुरक्षा संधि संगठन' बना सकता है। ऐसा लगता है कि अमेरिका ड्रैगन का सामना करने के लिए आखिरकार तैयारी कर लेगा। 
Keyword: india, china, america,,
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