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सरकार ने बड़े कारोबारी घरानों को लाभ पहुंचाने में छोड़ी हिचक

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 31, 2017

नरेंद्र मोदी सरकार ने बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को फायदा पहुंचाने वाली नीतियां बनाने और उन्हें सहूलियतें देने के मामले में अपनी सारी झिझक और शर्मीलेपन को क्या आखिरकार तिलांजलि दे दी है? प्रधानमंत्री मोदी और उनके वित्त एवं रक्षा मंत्री अरुण जेटली के कुछ हालिया फैसलों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। वास्तव में सरकार ने पिछले दो वर्षों से जारी अपनी राजनीतिक हिचक को अब त्याग ही दिया है। इसी हिचक के चलते सरकार बड़े कारोबारी घरानों समेत समूचे औद्योगिक जगत के प्रति दोस्ताना रवैया रखने को लेकर खासी संवेदनशील हो गई थी। इसका यह मतलब नहीं है कि मोदी सरकार का बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों के साथ कोई संबंध ही नहीं था। इसका केवल यह मतलब था कि सरकार इस तरह के संबंधों को खुलकर प्रोत्साहित करना तो दूर, यह भी नहीं चाहती थी कि वह इसका हिस्सा बनते हुए दिखे या फिर उसके बारे में कोई चर्चा हो। 

 
मोदी सरकार में कारोबारी घरानों को लेकर इस तरह की झिझक शुरुआती दौर में नहीं देखी गई थी। मई 2014 में सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार के भीतर इस तरह के कारोबार-अनुकूल सुधारों को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा था। उस दौर में सरकार ने भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास कानून को अध्यादेश जारी कर संशोधित कर दिया था। यह अध्यादेश लाते समय सरकार ने यह उम्मीद लगाई थी कि वह इन सुधारों पर संसद की मंजूरी हासिल करने में सफल रहेगी। लेकिन उस अध्यादेश के प्रति विपक्ष का विरोध तीव्र होने के साथ कानून में बदलाव का विचार त्याग दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि छह महीने की मियाद पूरी होने के साथ ही उस अध्यादेश का स्वत: समापन हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के स्वागत के समय प्रधानमंत्री मोदी ने जो महंगा सूट पहना था उसने भी सरकार की छवि पर चोट पहुंचाई थी।
 
सरकार की छवि को लेकर सबसे तगड़ी चोट तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे 'सूट-बूट की सरकार' कहकर पहुंचाई। हो सकता है कि यह अकेली वजह न हो लेकिन उसके बाद से ही सरकार लगातार इस बात को लेकर सजग रही है कि लोग उसे ग्रामीण इलाकों के गरीबों, किसानों और वंचित समूहों की स्थिति सुधारने के लिए संकल्पबद्ध सरकार के तौर पर ही देखें। यहां तक कि नवंबर 2016 में किए गए नोटबंदी के फैसले को भी काला धन जमा करने वाले धनी लोगों पर हमले के तौर पर ही पेश किया गया। बजट में भी ध्यान ग्रामीण भारत और ग्रामीण आधारभूत ढांचे पर केंद्रित हो गया। अगर मोदी सरकार के पहले बजट में रियायतों को चरणबद्ध तरीके से खत्म कर कंपनियों के लिए निगम कर दरों में कटौती का वादा किया गया था तो एक साल बाद उस पर अमल काफी हद तक अलग था। कुछ रियायतें तो खत्म कर दी गईं लेकिन निगम कर दरों में कटौती केवल छोटी कंपनियों के लिए ही की गई और बड़े कारोबारी घराने इसके दायरे से बाहर ही रह गए। 
 
लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है। सरकार ने बैंकों की मुश्किल में फंसी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के त्वरित एवं निर्णायक समाधान के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के साथ खुद को भी अधिक ताकत देने के लिए एक अध्यादेश जारी किया है। कर्ज में डूबी परिसंपत्तियों के निपटान का यह मायने भी होगा कि कुछ बैंकों के कर्ज खाते पर असर पडऩे के साथ ही संकटग्रस्त कंपनियों में हिस्सेदारी रखने वाली कुछ कंपनियों को नुकसान भी उठाना पड़ेगा। 
 
निस्संदेह इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर कायम दोहरे बहीखाते की समस्या दूर करने और कर्ज आवंटन एवं निवेश की स्थिति सुधारने में भी मदद मिलेगी। इससे आखिरकार आर्थिक प्रगति को बढ़ावा मिलेगा और इसकी भी प्रबल संभावना है कि इसे भारतीय कॉर्पोरेट जगत के लिए एक बेलआउट की तरह देखा जाए। बैंकों की मुश्किल में फंसी परिसंपत्तियों को संकट से उबारने के लिए निर्णायक फैसला लेने में मोदी सरकार को तीन साल का समय लग गया। दरअसल सरकार अतीत के अपने अनुभवों के चलते इस तरह के कदम उठाने में हिचकती रही है ताकि कारोबार-समर्थक सरकार होने के विपक्ष के राजनीतिक आरोपों को अधिक बल न मिले। ऐसा लगता है कि हाल के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद यह सरकार राजनीतिक रूप से खुद को अधिक आश्वस्त महसूस कर रही है। 
 
पिछले सप्ताह लिए गए दो अन्य फैसलों से भी सरकार की तवज्जो में आए बदलाव की पुष्टि होती है। अब चार अहम क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर रक्षा उत्पाद बनाने के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों को रणनीतिक भागीदारी करने की इजाजत दे दी गई है। इस रणनीतिक भागीदारी के स्वरूप से संबंधित विवरण तो अभी सार्वजनिक नहीं हो पाए हैं लेकिन इस फैसले से बड़ी भारतीय कंपनियों के लिए रक्षा उत्पादन में कदम रखने का रास्ता साफ होगा। अभी तक रक्षा क्षेत्र की जरूरत या तो आयात से या फिर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से पूरी होती रही है। 
 
सरकार का एक और फैसला काफी अहमियत रखता है। सरकार ने 5 लाख से लेकर 50 लाख रुपये मूल्य तक की सरकारी खरीद के ठेके घरेलू कंपनियों के लिए ही आरक्षित कर दिए हैं। इससे बड़ी भारतीय कंपनियों के लिए हरेक साल 2 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक कारोबार का एक नया अवसर पैदा होगा। मोदी सरकार जब अपने कार्यकाल के चौथे वर्ष में प्रवेश कर रही है तो यह निष्कर्ष निकालना कोई अतिशयोक्ति नहीं कहा जाएगा कि यह बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को रियायतें देने या नए मौके मुहैया कराने के मामले में पहले की अपनी हिचक छोड़ रही है और अब अधिक आश्वस्त नजर आ रही है। इसके साथ ही यह सरकार के सामने शायद ही कोई चुनौती पेश करने वाले विपक्ष की दुर्बलता को भी परिलक्षित करता है।
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