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बीते तीन सालों की क्या रही कहानी?

देवाशिष बसु /  May 31, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह में वह ऊर्जा और साहस है जो हमें इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला था। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
इस आलेख के शीर्षक से एकदम इतर इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के तीन साल के कार्यकाल का ब्योरा नहीं समेटा गया है। बल्कि यह हमारे बारे में है, सरकार का आकलन करने की हमारी क्षमता के बारे में। वह भी एक ऐसी सरकार जो हमारी अब तक की देखी गई सरकारों से एकदम अलग है। यह बात तीन साल के आकलन को खतरनाक बनाती है। हमारी प्रवृत्ति ऐसी है कि हम आकलन की अपनी चूक (उत्तर प्रदेश चुनाव) को भूल जाते हैं। अपने अनुमानों की गलती (नोटबंदी) का अहसास नहीं रख पाते और एक प्रतिबद्घ और ऊर्जावान सरकार के कदमों के बारे में बेपटरी टिप्पणियां करते हैं जबकि उसके कदमों की थाह दूर से नहीं लग पाती। मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर आकलन का जो दौर चल रहा है वह भी शायद यही गलती दोहरा रहा हो। 
 
वॉरेन बफेट के प्रसिद्घ साझेदार चार्ली मुंगर ने हॉर्वर्ड लॉ स्कूल में आज से 22 वर्ष पूर्व एक अहम भाषण दिया था जिसका शीर्षक था, 'द साइकॉलजी ऑफ ह्यïूमन मिसजजमेंट'। इस भाषण में गंभीर निवेशकों के लिए एक अहम बात शामिल थी। लेकिन इसमें हमारी रोजमर्रा की बातों को लेकर भी एक अहम खाका था। इनमें एक अहम बात यह है कि हममें उन बातों को लेकर पूर्वानुमान जताने की भी तत्परता होती है जिनके बारे में हमें कोई खास जानकारी नहीं होती। 
 
मुंगर ने ऐसी 25 प्रवृत्तियों को सूचीबद्घ किया है जो हमें गलती करने की ओर ले जाती हैं। इसमें खुद के लिए बहुत ज्यादा सम्मान, अतिरंजित आशावाद, सामाजिक मान्यता, केवल जुड़ाव का प्रभाव, दर्द से बचना, संदेह से बचना, नतीजों पर पहुंच जाना आदि शामिल हैं। हम सभी इनके बारे में जानते हैं। लेकिन मुंगर ने एक अन्य रोचक प्रवृत्ति के बारे में भी बात कही है जो अपेक्षाकृत कम चर्चित है। यह प्रवृत्ति है आगे के अनुमान लगाने की। मसलन हम मोदी सरकार के भविष्य के कदमों के बारे में कयासबाजी करें तो इसे वही प्रवृत्ति माना जाएगा। 
 
मुंगर ने इसे गप्पी प्रवृत्ति करार दिया। हॉर्वर्ड में उनके भाषण के कई साल बाद उन्होंने इस बात को विस्तार देते हुए लिखा, 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसके पास भाषा रूपी हथियार है। ऐसे में उसका बोलना और गपबाजी करना लाजिमी है। हालांकि किसी गंभीर काम के वक्त ऐसा करना खासा नुकसानदेह साबित हो सकता है।' इसके बाद उन्होंने प्रसिद्घ मनोविज्ञानी बी एफ स्किनर के एक प्रयोग का जिक्र किया जो मधुमक्खियों पर किया गया था। मधुमक्खियां आमतौर पर बाहर जाती हैं, फूलों से पराग तलाश करती हैं और फिर वापस आकर नृत्य करती हैं जो अन्य मधुमक्खियों को बताता है कि पराग कहां है। अन्य मधुमक्खियां भी जाती हैं और पराग लेती हैं। 
 
स्किनर ने यह तय किया कि एक विकलांग के साथ उनका क्या व्यवहार होगा। मुंगर लिखते हैं, 'स्किनर ने मकरंद को सीधा कर दिया जबकि सामान्य तौर पर ऐसा होता नहीं है। मधुमक्खियों की जेनेटिक बुनावट ऐसी नहीं होती है कि वह इस बदली हुई स्थिति से ठीक तरह से निपट सके। आप अंदाजा लगाएंगे कि इस स्थिति में मधुमक्खी निराश होकर वापस लौट जाती है। लेकिन ऐसा होता नहीं। वह एक अलग तरह का असंगत नृत्य करती है। मैं अपनी पूरी जिंदगी इन मधुमक्खियों के समकक्षों से ही निपटता रहा।' क्या हम मोदी सरकार का आकलन करते हुए इन्हीं असंगत नृत्य वाली मधुमक्खियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं? 
 
मुंगर ने इसके आगे और भी रोचक बात कही, उन्होंने कहा कि समझदार प्रशासन के लिए यह बात अहम है कि वह गप करने वाले लोगों को गंभीर काम से दूर रखे। कैलटेक इंजीनियरिंग के एक प्रोफेसर ने इस विषय में अपनी राय कुछ यूं प्रकट की थी: एक अकादमिक प्रशासन का प्रमुख काम है बेकार लोगों को कामकाजी लोगों के काम में हस्तक्षेप करने से रोकना। 
 
मुझे नहीं पता कि मोदी सरकार इस बारे में कुछ जानती है या नहीं लेकिन यह तय है कि हम इससे जूझ रहे हैं। लेकिन कैलटेक प्रोफेसर के उलट मोदी सरकार समझदारी से काम ले रही है। वह खुलकर कुछ नहीं कहती है लेकिन उसका ध्यान इन तमाम बातों पर रहता है। वह देश को एक नया स्वरूप देने के काम में लगातार लगी हुई है। मोदी, उनके मंत्री और पार्टी के नेता वैसा ही कर रहे हैं यानी उन लोगों को हस्तक्षेप करने से दूर रखना जो काम करने वालों को प्रभावित करते हैं जबकि खुद बेमानी होते हैं। इनमें मीडिया, विपक्ष और तमाम विशेषज्ञ शामिल हैं। संवाद भी एकतरफा और चुनिंदा है। वह भी केवल जानकारी के आधार पर ही होता है। हम सुनते हैं कि केंद्रीय मंत्रियों तक को सरकार के कुछ अहम कदमों के बारे में नहीं पता होता। बैंकिंग से जुड़े कुछ फैसलों से आरबीआई तक को दूर रखा जाता है।
 
हमें यह भी याद रखना होगा कि सरकार ने आधार, मनरेगा में बढ़ोतरी, न्यूनतम सरकार जैसी बातों पर अपने रुख में एकदम बदलाव को लेकर भी कोई स्पष्टीकरण कभी नहीं दिया। वह अपनी आर्थिक विचारधारा को लेकर खामोश है और समाजवाद के एक व्यावहारिक रूप को लेकर आगे बढ़ रही है। भले ही टीकाकार सरकार को दक्षिणपंथी करार दे रहे हैं। अब जबकि यह स्पष्ट है कि सरकार ने नोटबंदी जैसी बड़ी चूक भी की हैं, तो भी उसके बचाव के लिए कुछ कारक सामने आए हैं। मोदी और अमित शाह के पास वह ऊर्जा और साहस है जो हमने पहले कभी नहीं देखा। उनमें बातों को गोपनीय रखने की जो काबिलियत है वह अद्भुत है। इन बातों के बीच सरकार ने क्या किया या क्या नहीं किया, इस बारे में बहुत अधिक लिखना सरकार के बारे में कम और हमारे बारे में ज्यादा बताता है।
Keyword: narendra modi, development,,
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