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निजी निवेश के लिए कैसे बने परिवेश

अजय शाह /  May 30, 2017

देश की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह है कि निजी निवेश नजर नहीं आ रहा है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह 

 
देश की वृहद आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। हमें एक के बाद एक संकटों का सामना करना पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था पर इसका असर पडऩा लाजिमी है। निवेश से लेकर कॉर्पोरेट फाइनैंस और योजना निर्माण तक इसके कई रूप हैं। वित्त मंत्रालय के समक्ष सबसे अहम काम है राजकोषीय, वित्तीय और मौद्रिक संस्थानों पर काम करना ताकि वृहद आर्थिक स्थिरता कायम हो सके। हमें वित मंत्रालय में यह उद्देश्य नए सिरे से पैदा करना होगा और उसके इस प्रमुख काम के लिए क्षमता निर्माण करना होगा। 
 
किसी भी देश के विकास के मूल में निजी निवेश होता है। हमारी अर्थव्यवस्था की सबसे महत्त्वपूर्ण दिक्कत यह है कि निजी निवेश में कमी आ रही है। सीएमआईई कैपेक्स के डाटाबेस के आकलन के मुताबिक क्रियान्वयन योग्य निजी परियोजनाओं की लागत वर्ष 2011 में 53 लाख करोड़ रुपये थी जो वर्ष 2017 तक घटकर 42 लाख करोड़ रुपये हो गई। इस अवधि में जिस निजी निवेश की घोषणा की गई उसकी रािश में 43 लाख करोड़ रुपये से घटकर 26 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह मूल्यांकन सांकेतिक है। 21 फीसदी और 40 फीसदी की इस गिरावट में अगर मुद्रास्फीति को शामिल कर लिया जाए तो यह 25 फीसदी तक और बिगड़ जाएगी। 
 
निजी व्यक्ति को स्पष्टï तौर पर परियोजनाओं में निवेश के जरिये लंबे समय तक काम करना होता है। इस दौरान अल्पावधि की कुर्बानी देना बहुत अहम प्रक्रिया है। इसके आधार पर ही संगठनात्मक पूंजी तैयार होती है। हर कंपनी को मुनाफा कमाने और संगठनात्मक क्षमता निर्माण के द्वंद्व का सामना करना होता है। संगठनात्मक क्षमता में निवेश करने से समान पूंजी और श्रम की मदद से काफी अच्छा उत्पादन हो सकता है। संभव है कि ऐसी सोच के चलते ही हाल के वर्षों में अल्पावधि को लेकर चाहत बढ़ी है। इसका असर उत्पादन वृद्घि पर लाजिमी तौर पर पड़ता है। 
 
ऐसे में चूक कहां हुई? एक अहम तत्त्व जो गलत हुआ वह है वृहद अर्थव्यवस्था को लेकर ढेर सारी बात। बात करते हैं वर्ष 2000 और उसके बाद की। हमारी शुरुआत सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की तेजी ध्वस्त होने के साथ हुई और उसके बाद केतन पारेख घोटाला सामने आ गया। इस बीच यूटीआई और आईएफएसआई जैसी फर्म ढह गईं। इसके बाद अमेरिका में आतंकी हमला हुआ और वैश्विक अनिश्चितता का दौर शुरू हो गया। इसके बाद वर्ष 2002 से 2008 के बीच तेजी का दौर रहा। भारतीय इतिहास में यह सबसे बड़ा कारोबारी विस्तार का दौर था। लेकिन इस बीच 17 मई 2004 को जब संप्रग की चुनावी जीत हुई तो हमें शेयर बाजार पर बहुत बुरा असर हुआ। उसके बाद लीमन संकट ने भारत को बुरी तरह प्रभावित किया। सन 2013 में वित्त मंत्रालय और आरबीआई ने रुपये का बचाव करने के लिए दरों में 400 आधार अंक का इजाफा किया। इसके चलते भाजपा को 2014 में आम चुनाव जीतने में मदद मिली। इसके बाद नोटबंदी के रूप में वृहद आर्थिक झटका लगा। वर्ष 2009 के बाद से हम लगातार एक बड़े बैंकिंग संकट को छिपाते आ रहे हैं। इस बीच एनएसईएल, सत्यम, और आंध्र प्रदेश में सूक्ष्म वित्त पर प्रतिबंध जैसे छोटे झटके लगते रहे। 
 
बीते 17 साल में मैंने 10 वृहद आर्थिक घटनाएं और तीन छोटी घटनाएं दर्ज कीं। यानी हर दो-ढाई साल में ऐसी एक घटना होती है। यह ठीक नहीं है। निजी निवेश करने वाले अल्पावधि और दीर्घावधि के बीच झूलते रहते हैं। यहां जोखिम दो रूप में सामने आता है। एक ओर यह सूक्ष्म आर्थिक जोखिम है यानी एक फर्म और एक उद्योग से जुड़ा जोखिम। वहीं दूसरा हिस्सा वृहद आर्थिक जोखिम का है: यहां जोखिम पूरी अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। इस बीच हमारी आर्थिक हालत देख कर लोग और सजग हो जाते हैं। 
 
कॉर्पोरेट फाइनैंंस को इस बात को ध्यान में रखकर तैयारी करनी होगी। संकट के बार-बार दोहराव के बीच इक्विटी पूंजी ही सुरक्षित है लेकिन इससे पूंजी की लागत बढ़ती है। और कुछ परियोजनाएं अव्यवहार्य हो जाती हैं। वृहद आर्थिक स्थिरता ही आम घरों की बचत, परिसंपत्ति चयन, और योजनाएं तय करने में मदद करती है। ब्रिटेन में एक परिवार यह मान सकता है कि अगले 100 साल तक खुदरा महंगाई औसतन दो फीसदी रहेगी। एक भारतीय ऐसा नहीं मान सकता। 
 
आखिर हमें वृहद अस्थिरता से क्यों जूझते हैं? यह समस्या हमारी संस्थागत व्यवस्था में है जेा राजकोषीय, वित्तीय और मौद्रिक नीति से जुड़े हैं। हमारा मौजूदा सांस्थानिक ढांचा उस वक्त में बना था जब हमारी जीडीपी 200 अरब डॉलर की थी और अर्थव्यवस्था बंद थी। अब देश बदल चुका है। अर्थव्यवस्था में खुलापन आया है और जीडीपी 10 गुना बढ़ चुका है। लेकिन सांस्थानिक ढांचा अब तक वही है। हमारी स्थिति एक ऐसे व्यक्ति की है जिसका शारीरिक विकास हो गया है लेकिन मानसिक नहीं। कुछ झटके बाहरी भी होते हैं। अगर हमारे पास बढिय़ा संस्थान हों तो हम उनसे निपट सकते हैं। 
 
राजकोषीय नीति में समझदारी बहुत अहम है। खासकर घाटे और ऋण को लेकर। ऋण के लिए भी बेहतर तरीके अपनाना आवश्यक है। वित्तीय नीति में वित्तीय कंपनियों के सूक्ष्म नियमन की आवश्यकता होती है। कमजोर वित्तीय कंपनियों को बंद करने के लिए रिजॉल्युशन कॉर्पोरेशन, जोखिम के नियमन और पूंजी पर बेहतर नियंत्रण की आवश्यकता होती है। मौद्रिक नीति में आरबीआई की आवश्यकता है जिसका लक्ष्य है खुदरा महंगाई को 4 फीसदी के स्तर पर स्थिर करना। हमारा मौजूदा सांस्थानिक ढांचा इन मोर्चों पर विफल है। इन सुधारों के लिए बेहतर काम करने वाली वित्तीय एजेंसियों के समूह की आवश्यकता है। मसलन आरबीआई, सेबी या पीडीएमए (सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी) आदि। इनको वित्तीय मंत्रालय की मदद से नई क्षमताओं से लैस करना होगा। 
 
वित्त मंत्रालय को इस पूरी प्रक्रिया पर करीबी नजर रखनी होगी और दिन प्रतिदिन के हिसाब से रणनीतिक कदम उठाने होंगे तो इस काम को पूरा किया जा सके। वृहद स्थिरता के लिए संस्थान निर्माण आवश्यक है। यह वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी है। उसे पूरा सांस्थानिक परिदृश्य तैयार करना होगा और जरूरी बदलाव लाने होंगे। एक बार बदलाव पूरा होने के बाद वह इसे सुव्यवस्थित कर सकता है। आज वित्त मंत्रालय का मूल काम है राजकोषीय, वित्तीय और मौद्रिक नीति के लिए संस्थान तैयार करना। इसका क्रियान्वयन करने में राजनीतिक संघर्ष से लेकर मजबूत तकनीकी टीम तक कई बातें शामिल होंगी। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: india, economy, NPA, bank,,
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