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क्या होगा एयर इंडिया की दिशाहीन उडाऩ का अंजाम?

श्यामल मजूमदार /  May 29, 2017

इसका निजीकरण पहले कर दिया जाना चाहिए था जब इसके लिए सही समय था। इसमें देरी के लिए पिछली संप्रग सरकार ही नहीं बल्कि पिछली राजग सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। बता रहे हैं श्यामल मजूमदार 

 
एयर इंडिया को लेकर सरकार की कार्य योजना के संबंध में कई चर्चाएं चल रही हैं। नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने इस सूची में एक और बात जोड़ दी है। समाचार पत्र द हिंदू के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार एयर इंडिया को लेकर एक मजबूत बहुआयामी बदलाव योजना पर काम कर रही है ताकि उसे एक प्रमुख वैश्विक विमानन कंपनी बनाया जा सके। इस समाचार पत्र के साथ बातचीत में भी मंत्री ने कमोबेश यही बात दोहराई। उनकी प्रतिक्रिया में समान बात यह थी कि सरकार एयर इंडिया के पिछली सरकार की बदौलत बढ़े भारी भरकम ऋण बोझ से निपटने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रही है। ऐसे वक्तव्यों में एक दिक्कत रहती है: हम ये सब पहले कई बार सुन चुके हैं। 
 
बहरहाल ऋण के बोझ की बात से कोई असहमत नहीं होगा। वर्ष 2015-16 के अंत तक एयर इंडिया पर करीब 46,000 करोड़ रुपये का कर्ज था और इससे निपटने के चक्कर में वह कोई नया निवेश नहीं जुटा पा रही थी। इतना ही नहीं। एयर इंडिया ने तमाम राशि बट्टे खाते में डाली और निहायत खराब ढंग से एक विलय को अंजाम दिया गया। संप्रग सरकार ने इस कंपनी को बचाने के लिए 30,000 करोड़ रुपये की राशि का निवेश किया लेकिन सब बेकार। 
 
इस वर्ष जनवरी में विमानन क्षेत्र पर नजर रखने वाली कंपनी फ्लाइटस्टैट्स ने एयर इंडिया को दुनिया की तीसरी सबसे खराब विमानन सेवा करार दिया। यह सूची विभिन्न अंतरराष्टï्रीय विमानन सेवाओं की समयबद्घता का परीक्षण करके तैयार की गई थी। भारतीय विमानन क्षेत्र में इस कंपनी की हिस्सेदारी एक दशक पहले के 35 फीसदी से कम होकर 14 फीसदी रह गई है। राष्टï्रीय स्तर पर भी यह तीसरे स्थान पर फिसल गई है। वर्ष 2015-16 के दौरान केंद्र सरकार के उपक्रमों के प्रदर्शन पर आधारित सर्वेक्षण के मुताबिक घाटे में रहने वाली तीन प्रमुख कंपनियां थीं सेल, बीएसएनएल और एयर इंडिया। शीर्ष 20 घाटे में चलने वाली सरकारी कंपनियों के कुल घाटे में 51.65 फीसदी हिस्सेदारी उपरोक्त कंपनियों की रही। 
 
क्या मौजूदा सरकार एयर इंडिया के लिए उसी पुराने बहुआयामी बदलाव के बयान से परे जाकर कुछ करेगी? जयंत सिन्हा के साथ समस्या शायद यह है कि उनको पता ही नहीं है कि कर्ज से कैसे निपटा जाए? यह कमोबेश तय है कि कर्ज देने वाले एयर इंडिया में हिस्सेदारी शायद ही पसंद करें। कंपनी ने शायद शेयरधारकों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि वह कर्ज के एक हिस्से को शेयरों में बदलकर उन्हें शेयर देना चाहती है लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया।
 
सरकार की कोशिश बैंकों को इस विमानन कंपनी में रणनीतिक निवेशक के रूप में शामिल करने की भी है ताकि वह कंपनी के कार्यशील पूंजी ऋण को बदल सके। लेकिन बैंकों की इच्छा है कि उनको एक स्थायित्व भरी योजना दी जाए और इस बात का खाका पेश किया जाए कि वे मूल्य हासिल करेंगे। लेकिन ऐसा केवल तभी हो सकता है जब सरकार ऋणदाताओं को 100 फीसदी नियंत्रण की इजाजत दे।  अगर ऐसा हुआ तो वे जरूरत के मुताबिक कंपनी की हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को बेच सकेंगे। 
 
यह एक तरह से निजीकरण होगा। इसके राजनीतिक परिणाम को तो भूल जाएं। तथ्य यह है कि इस स्थिति में किसी का भी एयर इंडिया को खरीदना बहुत दूर की कौड़ी लगता है। बुरी बात यह है कि एयर इंडिया के वर्ष 2016 में 105 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ कमाने का दावा किया गया लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने इस पर सवाल खड़ा कर दिया। उसने कहा कि कंपनी को दरअसल 321 करोड़ रुपये का परिचालन घाटा हुआ है। संस्थान ने कहा कि मानक लेखा प्रक्रिया नहीं अपनाई गई जिसकी वजह से वह घाटे को छिपाने में कामयाब रही। सीएजी ने कहा कि विमानन कंपनी ने भुगतान के लिए अपर्याप्त व्यवस्था की। ऐसा करने से ऋणदाताओं को बदलाव की कोशिश में भला क्या राहत मिलेगी? 
 
निजीकरण तो बहुत पहले कर दिया जाना चाहिए था जब इसके लिए सही समय था। इसमें देरी के लिए संप्रग की पिछली सरकार तो जिम्मेदार है ही, राजग की पिछली सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। टाटा और सिंगापुर एयरलाइंस ने वर्ष 2000 में समझौता किया जब अटल बिहारी वाजपेयी की तत्कालीन सरकार ने एयर इंडिया में 40 फीसदी विनिवेश की तैयारी की। लेकिन एक साल बाद सिंगापुर एयरलांइस समझौते से निकल गई क्योंकि सरकारी कंपनियों के निजीकरण का जोरदार विरोध हो रहा था। उस वक्त एयर इंडिया लाभ में थी और एमिरेट्स और ब्रिटिश एयरवेज भी सौदे को लेकर आकर्षित थीं। 
 
टाटा ने पहले ही एयर इंडिया में कोई रुचि दिखानी बंद कर दी है। क्या अब कोई और कंपनी मौजूदा हालात में उसमें रुचि लेगी? ध्यान रहे कि कंपनी का कर्ज उसके परिचालन लाभ को नुकसान पहुंचा रहा है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन एक से अधिक मौकों पर एयर इंडिया के अस्तित्व की प्रासंगिकता पर सवाल उठा चुके हैं। वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में अप्रत्यक्ष रूप से एयर इंडिया का जिक्र किया गया है। समीक्षा के मुताबिक निजी क्षेत्र को लेकर दुविधा का भाव कई तरह से नजर आया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उन सरकारी उद्यमों का निजीकरण है जिनके बारे में विशेषज्ञ तक राय दे चुके हैं कि उनको निजी क्षेत्र को सौंप देना चाहिए। 
 
समीक्षा में कहा गया है, 'जरा नागरिक उड्डयन के क्षेत्र पर गौर कीजिए। इतिहास को नकारते हुए अभी भी यह कहा जा रहा है कि पूरी तरह घाटे में जा चुकी इस सरकारी विमानन कंपनी को विश्वस्तरीय बनाया जाएगा।' जाहिर है सिन्हा ने एयर इंडिया को एक बार फिर दुनिया की बेहतरीन विमानन कंपनियों में से एक बनाने का दम भर कर मुख्य आर्थिक सलाहकार को सही साबित किया है। 
Keyword: aviation, विमानन air india,,
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