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बड़ा जोखिम

संपादकीय /  May 29, 2017

बीते तीन वर्ष के दौरान देश की अर्थव्यवस्था के समक्ष सबसे बड़ी चिंता रही है बैंकों के फंसे हुए कर्ज (एनपीए) में हो रहा इजाफा। सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है जो बैंकिंग क्षेत्र के एनपीए के 70 फीसदी के लिए जिम्मेदार हैं। व्यापक पैमाने पर बात की जाए तो बैंकों ने अपने मुनाफे की कीमत पर भी ऐसे कर्ज बांटे। इस बीच मानो सरकारी बैंकों के एनपीए की समस्या ही काफी नहीं थी कि अब तीन प्रमुख निजी बैंकों द्वारा एनपीए की जानकारी को कमतर बताने की खबर आई है। 

 
आरबीआई को इस मुद्दे से निपटने के लिए तत्काल तेज कदम उठाने चाहिए। तभी उसके नियमन और संबंधित बैंकों की विश्वसनीयता बरकरार रह सकेगी। इसकी शुरुआत 18 अप्रैल को हुई जब आरबीआई ने अधिसूचना जारी कर कहा कि कुछ बैंकों के ऋण के वर्गीकरण और केंद्रीय बैंक के मानकों में काफी अंतर है। बैंकिंग नियामक चाहता था कि बैंक उसके नए मानकों के अधीन उचित प्रदर्शन करें और अपनी बैलेंस शीट का अंतर सामने रखें। यानी उनके फंसे हुए कर्ज की राशि और आरबीआई द्वारा देनदारी में चूक मानी जाने वाली राशि। 
 
आमतौर पर बैंक केवल आरबीआई द्वारा चिह्निïत ऋण की जानकारी देते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि निवेशक अब आरबीआई के अंकेक्षण के नतीजों का इंतजार करेंगे। तभी उनको इस बात का सही पता लग सकेगा केंद्रीय बैंक की नजर में एनपीए कितना है और बैंकों ने क्या घोषणा की है। आरबीआई की अधिसूचना के बाद निजी क्षेत्र के तीन बैंकों ने यह घोषणा की है कि वित्त वर्ष 2015-16 में सालाना रिपोर्ट में घोषित एनपीए के स्तर और आरबीआई के मानक स्तर के बीच बहुत अधिक अंतर है। इस खुलासे ने कुछ चेतावनी भरे सवाल खड़े कर दिए हैं। 
 
मिसाल के तौर पर एक सवाल यह है कि क्या यह बात केवल एक वित्त वर्ष के लिए सही है या एक से ज्यादा? दूसरी बात, ऐसा हुआ ही कैसे? आखिरकार एनपीए की स्पष्टï परिभाषा पहले से मौजूद है। हर वह ऋण एनपीए है जिसे तीन महीने से चुकाया नहीं जा रहा हो। इसकी कितनी व्याख्या की जा सकती है? या फिर ये बैंक जानबूझकर बेहतर तस्वीर पेश कर रहे थे और ऐसी कंपनियों को नया ऋण दे रहे थे जो पुराना ऋण चुकाने में ही संघर्ष कर रही थीं। 
 
इन तीन बैंकों में आखिर यह हुआ कैसे यह सवाल तो बाद का है। उससे कहीं बड़ा सवाल नियामक के सामने मुंह बाये खड़ा है। और किन बैंकों में ऐसे ही हालात हो सकते हैं? जाहिर सी बात है इन सवालों के जवाब कतई आसान नहीं हैं और यह आरबीआई पर निर्भर करता है कि वह अन्य निजी बैंकों की वित्तीय स्थिति की असली तस्वीर हमारे सामने रखे। यह बैंक के स्तर पर प्रशासनिक विफलता का मामला है। सरकारी बैंक तो इस मामले में सिद्घहस्त हो ही चुके हैं। अब सरकारी बैंकों और खुद आरबीआई से सामने आ रहे आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिह्नï लग गया है। आखिरी बड़ी चिंता अंकेक्षण और लेखा फर्मों की विश्वसनीयता से जुड़ी हुई है। साथ ही उन पेशेवरों से भी जो इस काम में लगे हुए हैं। भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान के बारे में कहा जा रहा है कि उसने आरबीआई से संपर्क करके कहा है कि वह फंसे हुए कर्ज के अनुमान में आ रहे अंतर को लेकर जानकारी जुटाए। ऐसे में यह सवाल भी अवश्य उठना चाहिए कि कैसे स्थापित अंकेक्षण फर्म खुशी-खुशी इस धोखाधड़ी पर अपनी मुहर लगाती रहीं। 
 
Keyword: india, economy, NPA, bank,,
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