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मौद्रिक नीति समीक्षा को सुझाव का ढांचा तैयार कर रही सरकार

अरूप रॉयचौधरी और निवेदिता मुखर्जी /  05 28, 2017

बीएस बातचीत

केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन कहते हैं कि सरकार को एक सरल राजकोषीय नीति की जरूरत है। वह राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) समिति को भेजे गए असहमति पत्र में दिए गए सुझावों को अधिक सरल और वास्तविक मानते हैं। अरूप रॉयचौधरी और निवेदिता मुखर्जी के साथ विस्तृत चर्चा में सुब्रमण्यन ने यह भी माना कि जीएसटी की दरों को आने वाले समय में अधिक सहज बनाने की जरूरत पड़ेगी। हालांकि वह अन्य देशों की तरह भारत में भी घरेलू उद्योगों के लिए संरक्षणवादी रवैया अपनाने के पक्ष में नहीं हैं। बातचीत के संपादित अंश :

आपको मोदी सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर काम करते हुए तीन साल होने वाले हैं। आपकी नजर में इस सरकार की आर्थिक मोर्चे पर बड़ी कामयाबियां क्या रही हैं?
इस सरकार ने आर्थिक नजरिये से कुछ बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। पहली बड़ी सफलता तो व्यापक तौर पर आर्थिक स्थिरता प्रदान करने की है। हमारी स्थूल आर्थिक स्थिति काफी सशक्त है और महंगाई को तीन फीसदी से नीचे लाने के लिए मजबूर आधार मुहैया कराया है। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा लगातार ढलान पर है। चालू खाते की स्थिति भी सुविधाजनक है और विदेशी मुद्रा भंडार ऊंचाई पर बना हुआ है। दूसरा, निवेश अवसरों के लिहाज से भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती विशाल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। सरकार की तरफ से कुछ नीतिगत पहल भी हुई हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक रूपांतरकारी नीति है, जन धन और आधार मोबाइल को खूब बढ़ावा दिया जा रहा है, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियमों को उदार बनाया गया है। इसके अलावा दिवालिया कानून और मौद्रिक नीति समीक्षा समिति जैसे कई विधायी सुधार भी हुए हैं। हमें सरकार के कामकाज के साफ-सुथरे होने को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सार्वजनिक संसाधनों की नीलामी पूरी तरह पारदर्शी तरीके से अंजाम दी जा रही है। ये बातें निवेशकों को आकर्षित करती हैं। हालांकि गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों और दोहरा-बहीखाता की समस्या हमारे सामने चुनौती पेश कर रही हैं। नई नौकरियां पैदा करना और रोजगार भी एक बड़ी समस्या है। वैसे समस्या की पहचान करना उसका निदान तलाशने की तुलना में अधिक आसान होता है।

सरकार नई नौकरियों के सृजन के लिए क्या कदम उठा सकती है?
इसके लिए आपको दो अंकों वाली विकास दर हासिल करने और अधिक मात्रा में निवेश आकर्षित करने पर ध्यान देना होगा। उससे नई नौकरियां पैदा करने में मदद मिलेगी। मेरा मानना है कि सरकार को नौकरियां पैदा करने की जरूरत का बखूबी अहसास है। इसका एक और तरीका कपड़ा, वस्त्र और जूते-चप्पल जैसे कुछ क्षेत्रों की मदद करना हो सकता है। आपको याद होगा कि आर्थिक तेजी के दौर में निर्माण, कृषि और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों का प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था। इन क्षेत्रों पर एक बार फिर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।

एफआरबीएम समिति के सुझावों और उसके एक सदस्य के तौर पर दिए गए आपके अपने सुझावों में क्या फर्क हैं? आपने असहमति के किन बिंदुओं को उठाया है?
मैंने अपने असहमति पत्र में कुछ बुनियादी मुद्दों को लेकर समिति के सुझावों से असहमति जताई है। समिति का मकसद केंद्र और राज्यों के साझा कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात को घटाकर 60 फीसदी के स्तर पर लाना है। इस पर मेरा मानना है कि इस अनुपात की न्यूनतम सीमा नहीं तय की जानी चाहिए। परिचालन लक्ष्यों के संदर्भ में समिति ने राजकोषीय घाटे और राजस्व घाटे पर सुझाव दिया है। उसके स्थान पर मैं केवल प्राथमिक घाटे की बात करता हूं। समिति उन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सर्पिल पथ का सुझाव देती है जबकि मैं क्रमिक कटौती के पक्ष में हूं और मैं कोई राजस्व घाटा भी नहीं चाहता। समिति कहती है कि विकास के तीन फीसदी अधिक या कम होने पर ही सुरक्षात्मक उपायों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मैं कहता हूं कि यह काफी अतिवादी है। इसके स्थान पर मैंने 1.5 फीसदी बदलाव पर ही सुरक्षात्मक उपाय अपनाने की बात कही है।

आपको ऐसा क्यों लगता है कि आपके सुझाव एफआरबीएम समिति की तुलना में अधिक यथार्थवादी हैं?
आपको अपने अनुभवों से सीखना होता है। एफआरबीएम समिति के सुझावों में अतीत की आर्थिक शिथिलता से मिले सबक नहीं नजर आते हैं। कर्ज और जीडीपी का अनुपात 60 फीसदी रखने के लक्ष्य का कोई आधार नहीं है। हम कहते हैं कि हमें यह करना होगा क्योंकि रेटिंग एजेंसियां ऐसा करने के लिए कह रही हैं। याद रखिए कि राजकोषीय स्थिरता अपने दायित्वों को पूरा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति से जुड़ी है। इसलिए हमें जल्दी यह अहसास होना चाहिए कि 60 फीसदी जैसा आंकड़ा केवल विवेकाधीन ही है। मौजूदा एफआरबीएम अधिनियम में राजकोषीय घाटे का तीन फीसदी लक्ष्य अपनी इच्छा से नहीं तय किया गया था। यह लगातार 60 फीसदी कर्ज-जीडीपी अनुपात पर रहा। लेकिन समिति का 2.5 फीसदी का लक्ष्य उसके साथ स्थायी नहीं है। यह 60 फीसदी लक्ष्य के अनुरूप नहीं है। हमें इसकी जगह पर अधिक सरल ढांचे की जरूरत है। एक साथ कई लक्ष्य रखने से बात नहीं बनेगी। समिति ने राजस्व घाटे को भी लक्ष्य के रूप में रखा है लेकिन उससे कुछ हासिल नहीं होता है।

इसके बावजूद राजकोषीय घाटे और कर्ज-जीडीपी अनुपात जैसे संकेतकों पर रेटिंग एजेंसियां काफी तवज्जो देती हैं...
रेटिंग एजेंसियों की तवज्जो वाले बिंदुओं को लेकर नीति-निर्माताओं के बीच एक तरह का दबाव देखा जाता है। एफआरबीएम समिति हमारे लिए रेटिंग एजेंसियों की बात को ज्यों का त्यों मानने के बजाय एक नई सोच लेकर आने का एक अवसर था। आप इसी तरह विश्वसनीयता हासिल करते हैं। सामान्य चर्चा में संभव है कि लोग प्राथमिक घाटे से परिचित न हों लेकिन रेटिंग एजेंसियों को मालूम है। अगर कर्ज को काबू में करना आपका लक्ष्य है तो आपका मुख्य मकसद प्राथमिक घाटा ही होना चाहिए।

सरकार जो नया वित्तीय जवाबदेही विधेयक लेकर आ रही है तो उसमें क्या आपके सुझावों को भी जगह मिलेगी?
मेरे सुझावों का एक हिस्सा तो पहले ही स्वीकार किया जा चुका है। एफआरबीएम समिति ने वर्ष 2017-18 के लिए 3 फीसदी राजकोषीय घाटे की बात कही थी जबकि मैंने 3.2 फीसदी रखे जाने के पक्ष में तर्क दिए थे। इस वित्त वर्ष के बजट में वह परिलक्षित भी हुआ है।

हाल ही में आपने रेटिंग एजेंसियों की आलोचना करते हुए कहा है कि वे भारत और चीन के प्रति अलग मापदंड अपनाए हुए नजर आती हैं। इस तरह की स्थिति में आखिर क्या किया जा सकता है?
जब हम हरेक चीज की समीक्षा करते हैं तो हमें रेटिंग एजेंसियों का भी मूल्यांकन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उनका कामकाज कैसा रहा है। किसी को रेटिंग एजेंसियों को भी रेट करने की जरूरत है। सरकार भी इन एजेंसियों की रेटिंग कर सकती है। इसके अलावा इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पद्र्धा बढऩी चाहिए। विदेशी एजेंसियों के साथ घरेलू एजेंसियों की भी संख्या बढऩी चाहिए। खैर आज मेरी बात एकदम सही निकली। मूडीज ने चीन की रेटिंग भी घटा दी है। मुझे लगता है कि भारत और चीन को लेकर हमने जो हंगामा किया उसे कहीं दर्ज किया गया।

वित्त मंत्रालय के भीतर आप, आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास और प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल का एक समूह है जो ब्याज दरों में कटौती के मसले पर मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के सदस्यों के सामने अपनी राय रखेगा। क्या यह एमपीसी के कामकाज में दखल नहीं कहा जाएगा?
अधिनियम में यह एकदम साफ जिक्र है कि सरकार को मौद्रिक नीति समिति के सामने अपनी राय रखने की इजाजत दी जानी चाहिए। यह समूह भी उसी विचार का समर्थन करता है। पिछले गवर्नर के समय एमपीसी का वजूद नहीं था। यहां पर हम एमपीसी को सरकार की तरफ से दिए जाने वाले सुझावों का ढांचा तैयार कर रहे हैं। यहां पर यह ध्यान में रखिए कि हम महज सूचनाओं और आंकड़ों को पेश करने वाले हैं, हम उन पर दबाव नहीं डालते हैं। एमपीसी हमारे विचारों को ध्यान में रखने या न रखने के लिए स्वतंत्र है। मौद्रिक नीति से संबंधित बैठकें शुरू होने के पहले हम उनसे मिलकर अपना पक्ष रखेंगे।

आपके हिसाब से जीएसटी का महंगाई पर किस तरह असर पड़ेगा? क्या मौजूदा कर ढांचा आपको अधिक जटिल लग रहा है?
मुझे इससे बड़ी खुशी है कि जीएसटी का असर कम होने जा रहा है। असल में, महंगाई को लेकर कोई चिंता होनी ही नहीं चाहिए। अगर कुछ होता भी है तो वह मुख्य मुद्रास्फीति में थोड़ी गिरावट ही आनी चाहिए। जीएसटी मौजूदा कर प्रणाली से कहीं कम जटिल है। हालांकि इस पर कोई संदेह नहीं है कि यह अब भी काफी जटिल है। मुझे लगता है कि क्रमिक रूप से हमें इसकी जटिलता को दूर करते रहना होगा। अगर यह इसी तरह जटिल बना रहा तो फिर समस्या ही होगी। स्वास्थ्य, शिक्षा और पेट्रोलियम को भी जीएसटी के दायरे में लाने के लिए हमें लगातार इसकी समीक्षा करनी होगी।

दुनिया भर में घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने की बढ़ती प्रवृत्ति के बारे में भारत की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?
हमें इन मुद्दों पर असर डालने की स्थिति में पहुंचने के लिए 10 फीसदी की विकास दर हासिल करनी होगी। ऐसी सूरत में अगर कोई देश हमारे खिलाफ कदम उठाता है तो हम उसे ऐसा करने से रोक पाएंगे। दूसरा, हमें यह भी देखना चाहिए कि हमारे लिए क्या अच्छा है? जैसे, अगर एच1बी वीजा को लेकर और अधिक पाबंदियां लगती हैं तो हमें उसके मुताबिक खुद को ढाल लेना चाहिए। केवल दूसरों को संरक्षणवादी कदम उठाते हुए देखकर हमें भी संरक्षणवादी नहीं हो जाना चाहिए। हमारा कदम अपनी बेहतरी पर आधारित होना चाहिए। हमें अन्य देशों में लागू संरक्षणवाद को कम करने के लिए अपने बढ़ते बाजारों का इस्तेमाल करना चाहिए।

Keyword: अरविंद सुब्रमण्यन, arvind subramanian,Chief economic advisior,
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