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मध्य जून की चाय नीलामी पर छाया जीएसटी का साया

अभिषेक रक्षित और टीई नरसिम्हन /  May 28, 2017

चाय उद्योग की जून के मध्य में होने वाली नीलामी पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की मार पडऩे की आशंका है। इसकी वजह यह है कि चाय नीलामी केंद्रों में चाय विक्रय करने वाले आढ़तियों के लिए खरीद की लागत करीब 4 फीसदी बढऩे वाली है और इनपुट क्रेडिट अस्पष्टï है। हालांकि मौजूदा व्यवस्था के तहत कर की प्रभावी दर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। नीलामी में असम सरकार 0.5 फीसदी मूल्य संवर्धित कर (वैट) लगाती है और 0.25 फीसदी केंद्रीय बिक्री कर रहता है। नीलामी केंद्रों की बिक्री पर पश्चिम बंगाल सरकार 1 फीसदी की समान दर से वैट लगाती है।
अगर निजी बिक्री की बात करें तो असम की 60 करोड़ किलोग्राम की सालाना बिक्री में इसका योगदान 60 फीसदी रहता है और पश्चिम बंगाल की सालाना बिक्री में 70 फीसदी का योगदान रहता है। इन राज्यों में निजी बिक्री पर प्रभावी कर दर क्रमश: चार फीसदी और पांच फीसदी है।
नीलामीकर्ताओं को रियायती दरों का लाभ होता है। लेकिन इससे हटकर, हरी चाय की खरीद करने के बाद खरीद के हर स्तर पर खरीदार इनपुट क्रेडिट पाने के योग्य होता है। हालांकि चुंगी या स्थानीय करों जैसी अन्य दरों के पैसे को वापस नहीं किया जाता है। इस तरह, उद्योग का अनुमान है कि चाय पर लगाया गया शुद्ध कर हर जगह 8-9.5 फीसदी बैठता है जो कम होकर पांच फीसदी होने की संभावना है। फिर भी, नीलामीकर्ताओं और व्यापारियों के लिए विभिन्न नीलामी गृहों पर प्रभावी कर दर में करीब चार फीसदी का इजाफा हो रहा है। हालांकि असम में अंतर-राज्यीय बिक्री की शुद्ध प्रभावी कर दर मौजूदा नौ फीसदी से कम होकर पांच फीसदी हो जाएगी, लेकिन इसके बावजूद चाय उत्पादक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि वे इनपुट कर की वापसी के लिए किस तरह दावा करेंगे।
असम टी प्लांटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अरुण ठेकेदथ का कहना है कि सम्मिश्रकों को इस बात की चिंता है कि अगर वे जीएसटी से पूर्व के समय में प्रचलित कर दर पर नीलामियों से चाय खरीदते हैं तो जीएसटी के बाद के समय में वे पैसे की वापसी के लिए कैसे दावा करेंगे।
आमतौर पर व्यापारी जून के मध्य में कोलकाता और गुवाहाटी से बड़ा स्टॉक उठाते हैं। माना जाता है कि इस दौरान उद्योग को बेंचमार्क उपज मिलती है। यह खरीद बड़ी मात्रा में होती है और ये खरीदार आवश्यक अग्रिम कर अदा करते हैं। बाद में ये खरीदार पैसे की वापसी का दावा करते हैं क्योंकि शेष वर्ष के दौरान धीरे-धीरे उनका स्टॉक निकलता रहता है।
इसका बिक्री पर कैसा असर रहेगा, इस संबंध में स्पष्टïता नहीं होने के कारण उत्पादकों और नीलामीकर्ताओं में भावी नीलामी को लेकर अस्पष्टïता की स्थिति बनी हुई है। गुवाहाटी चाय नीलामी समिति के सचिव दिनेश बिहानी का कहना है कि कम कर दर की वजह से सम्मिश्रक और पैकटों में चाय बेचने वाले नीलामियों से खरीदारी करते हैं। मौजूदा कर दर 0.75 फीसदी से उछलकर पांच फीसदी होने की
स्थिति में वे नीलामियों में दिलचस्पी क्यों लेंगे।
इस समय देश भर में नीलामी के मौजूदा नियमों के तहत विक्रेता द्वारा बिल दिया जाता है। 99 फीसदी मामलों में यह विक्रेता कोई ब्रोकर ही होता है। लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद यह बिल सीधे बागान मालिक या उत्पादक द्वारा दिया जाएगा। अगर चाय बोर्ड ने इसे स्पष्टï नहीं किया तो बहुत उलझन होने वाली है और आगे होने वाली नीलामी को नुकसान हो सकता है।

Keyword: Tea, GST, indirect tax,
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