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वित्त मंत्री जेटली के अगले बजट से जुड़ीं संभावनाएं

दिल्ली डायरी
ए के भट्टचार्य /  05 28, 2017

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2017-18 का आम बजट 1 फरवरी को पेश किया था। इसमें तीन नई बातें थीं। पहली, बजट पेश करने की तारीख एक महीने पहले कर दी गई। दूसरी, योजनागत और गैर योजनागत व्यय का भेद समाप्त कर दिया गया और तीसरी रेलवे बजट को आम बजट में समाहित कर दिया गया।
हाल के वर्षों में किसी एक साल में इतनी नई बातें शामिल नहीं की गईं। जेटली ने यह किया जरूर लेकिन इन पहलों का हासिल क्या निकला? चालू वित्त वर्ष में व्यय के ताजातरीन आंकड़े बताते हैं कि पहली पहल का असर हुआ है। अप्रैल 2017 के आखिर तक सरकार ने 2.4 लाख करोड़ रुपये व्यय किए जबकि वर्ष 2016 में समान अवधि में 1.6 लाख रुपये व्यय किए गए थे। यह उस दौर की बात थी जब बजट प्रस्तुति का चक्र बदला नहीं गया था। यह बढ़ा हुआ व्यय सरकार के चालू वर्ष के 21.47 लाख करोड़ रुपये के आवंटन का 11 फीसदी था। गत वित्त वर्ष में 20.14 लाख करोड़ रुपये के कुल व्यय का केवल 8 फीसदी ही अप्रैल के अंत तक व्यय हो सका था। ऐसे में यह बात सराहनीय है कि अप्रैल माह तक व्यय होने वाली राशि में इजाफा हुआ है।
वित्त मंत्रालय के अधिकारियों को पता है कि वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बढ़ा हुआ व्यय बजट प्रस्तुति से जुड़े सुधार का परिणाम है। चूंकि इससे पहले बजट मई के मध्य तक ही पारित हो पाता था इसलिए सरकार की व्यय संबंधी पहल उसके बाद ही गति पकड़ती थी। इससे देरी भी होती और साल के बाद वाली छमाही में व्यय जोर पकड़ लेता। अब यह सब बदल गया है और जैसा कि अप्रैल के आंकड़े बताते हैं व्यय की गति में वित्त वर्ष के पहले महीने से तेजी आई।
योजनागत और गैरयोजनागत व्यय में भेद खत्म करने का असर कम अहम रहा है। परंतु इसके बावजूद वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सरकारी योजनाएं कहीं तेज गति से पेश की जा रही हैं। योजनागत कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कठिन था क्योंकि राज्य और केंद्र स्तर की कई एजेंसियां इसमें शामिल रहती थीं। इससे देरी होती। लेकिन अब केवल राजस्व और पूंजी का अंतर रह जाने के बाद योजनाओं पर निर्णय तेजी से लिए जा रहे हैं। रेल बजट पेश करने की पुरानी परंपरा का खात्मा करने का एक अर्थ यह भी था कि रेलवे व्यय की तगड़ी जांच परख की जा सके। अब इसकी निगरानी भी वित्त मंत्रालय के पास है। रेल मंत्रालय को यह संदेश साफ है कि अब देश में वस्तुओं और जनता के सबसे बड़े परिवहन साधन के रूप में उसे अधिक किफायती रूप से चलाया जाए। जबकि वित्त मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आवंटित राशि किफायती ढंग से खर्च हो। संभव है रेल मंत्रालय को यह रास न आए लेकिन वित्तीय प्रशासन की दृष्टिï से इसके फायदे स्पष्टï हैं।
ऐसे में अगला बजट कैसा होना चाहिए? और क्या इसमें और नवाचार शामिल हो सकते हैं? एक संभावना यह है कि बजट की प्रस्तुति को और पहले कर दिया जाए। शायद जनवरी के पहले सप्ताह में। ऐसा करने से वर्ष 2019 से जनवरी-दिसंबर वित्त वर्ष अपनाने में मदद मिलेगी। हालांकि अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है लेकिन वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि अगर इस वर्ष बजट एक माह पहले प्रस्तुत किया जा सकता है तो अगले वर्ष भी यह हो ही सकता है।
इन बातों के अलावा चार नई पहल हैं जो अगले बजट से की जा सकती हैं। पहली बात, वित्त मंत्रालय में मौजूदा योजनाओं की समीक्षा का काम पहले ही शुरू हो चुका है। केंद्र सरकार की 225 ऐसी योजनाओं और 28 केंद्र प्रायोजित योजनाओं की समीक्षा चल रही है। इसके बाद ही उनका भविष्य तय होगा। कोशिश है कि इनमें से हर योजना का आकलन कर तय किया जाए कि क्या ये जारी रहेंगी? अगर हां तो इन्हें उतने ही संसाधन देने हैं या किसी तरह का बदलाव करना है। वित्त मंत्रालय लागत आधारित आकलन कर रहा है जिसके आधार पर संसाधनों का किफायती आवंटन सुनिश्चित हो सकेगा। केवल उन्हीं योजनाओं को संसाधन दिए जाएंगे जो बढिय़ा प्रतिफल दे रही हों। जबकि जो योजनाएं नाकाम हैं उनको या तो बंद कर दिया जाएगा या चरणबद्घ तरीके से अप्रचलित किया जाएगा।
दूसरी बात, वित्त मंत्रालय के समक्ष अब राजकोषीय जवाबदेही पर एनके सिंह समिति की अनुशंसाएं भी हैं। एक राजकोषीय परिषद निर्मित करने के विचार को व्यापक स्वीकृति मिली है और ऐसा लगता है कि अगला बजट पेश होने तक एक नई सलाहकार संस्था सामने आ जाएगी। राजकोषीय घाटे के नए लक्ष्य और नए ऋण मानकों को भी समिति की अनुशंसाओं के अनुरूप किया जाएगा। इससे नए बजट में तमाम नए राजकोषीय मानक सामने लाने में मदद मिलेगी।
तीसरी बात, वस्तु एवं सेवा कर को इस वर्ष के शेष कुछ माह में लागू करने से वित्त मंत्रालय के पास अवसर होगा कि वह यह तय कर सके इस नई कर व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आगे क्या करना है। आखिर में वित्त मंत्रालय से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह व्यय प्रबंधन आयोग की शेष सिफारिशों के लिए खाका तैयार करेगा। इस आयोग की अध्यक्षता आरबीआई गवर्नर विमल जालान ने की थी और इसकी रिपोर्ट अभी सार्वजनिक की जानी है।
मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक आयोग की अनुशंसाओं में से 79 फीसदी का क्रियान्वयन हो चुका है और शेष को लागू करने के लिए दो वर्ष की अवधि चाहिए। अगले बजट में यह संकेत निहित होगा कि आगामी दो साल में क्रियान्वयन किस प्रकार होगा।
यदि संक्षेप में कहें तो अगला बजट मौजूदा सरकार के कार्यकाल में अरुण जेटली का आखिरी पूर्ण बजट होगा। इसे केवल चुनावी कवायद नहीं होना चाहिए। इसके बजाय इसमें अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों के लिए भी काफी कुछ होना चाहिए।

Keyword: budget, finance minister, arun jaitley,
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