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भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सहयोग के बुनियादी सिद्धांत

अरुणाभ घोष /  May 26, 2017

भारत दूसरे देशों के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को किस तरह से साधे कि उसके दीर्घावधि हितों के भी अनुकूल रहे? इसके लिए पांच सिद्धांत पथप्रदर्शक हो सकते हैं। बता रहे हैं अरुणाभ घोष 

 
दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों में शामिल भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी अंतरराष्ट्रीय गतिविधियां बढ़ा दी हैं। विदेश में तेल और गैस परिसंपत्तियां हासिल करने, नाभिकीय रिएक्टरों के आयात को लेकर लगातार दूसरे देशों के संपर्क में बने रहने, ऊर्जा सक्षमता बढ़ाने के लिए लंबी चर्चाओं का हिस्सा बनने और नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान देने को लेकर भारत लगातार रुचि दिखाता रहा है। भारत दूसरे देशों के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को किस तरह से साधे कि उसके दीर्घावधि हितों के भी अनुकूल रहे? इसके लिए पांच सिद्धांत पथप्रदर्शक हो सकते हैं:
 
कीमत मायने रखती है : ऊर्जा की दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है और तमाम राष्ट्रीय एवं वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर रही है। ऊर्जा क्षेत्र में किए गए अधिकांश निवेशों की उत्पादन-पूर्व अवधि काफी लंबी होती है। नाभिकीय रिएक्टरों जैसे कुछ मामलों में तो संयंत्र बनाने में लंबा वक्त लग जाता है। कोयला-आधारित परियोजनाएं पांच दशक तक चल सकती हैं। तेल एवं गैस आयात के लिए दिए गए लंबे समय के अनुबंध होने से कीमतों में स्थिरता आती है लेकिन कीमतों में अनुकूल बदलाव होने पर भी उपभोक्ताओं को उसका फायदा उठाने से रोकती है। अगर संबंधित पक्ष अनुबंध की शर्तों को लेकर बार-बार चर्चा और बदलाव की मांग उठाते रहते हैं तो फिर ऊर्जा सहयोग कामयाब नहीं हो सकता है। इसी तरह अगर नागरिकों को यह लगने लगता है कि सरकार ने बदलती तकनीक और कारोबारी मॉडल के चलते कीमतों में होने वाले बदलाव के दौर में भी उन्हें एक खास ढांचे में बांधकर रख दिया है तो भी लोगों के बीच उसे वैधता नहीं मिल पाएगी।
 
द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और परमाणु ऊर्जा के आयात को लेकर भारत ऐसी ही दुविधा का सामना कर रहा है। मसलन, अमेरिका से मंगाई जाने वाली एलएनजी की लागत 8.5 डॉलर प्रति मिलियन बीटीयू पड़ती है। अगर पश्चिम एशिया या अफ्रीका से इसे मंगाया जाता है तो एलएनजी की लागत कम हो सकती है। गेल ने अमेरिका के दो टर्मिनलों से एलएनजी आयात करने के लिए करार किया है लेकिन घरेलू स्तर पर अभी तक इसका कोई खरीदार नहीं मिला है। करीब 16,000 मेगावाट क्षमता की गैस-आधारित परियोजनाएं मांग नहीं होने से लटकी हुई हैं। फूकुशिमा रिएक्टर हादसे के बाद से ही नाभिकीय ऊर्जा कारोबार में वैश्विक स्तर पर एक गतिरोध देखा जा रहा है। इसके चलते विदेश से आयातित परमाणु रिएक्टरों में पैदा बिजली घरेलू रिएक्टरों में उत्पादित बिजली से करीब दोगुनी महंगी हो सकती है। इस बीच सौर बिजली की दरें वर्ष 2010 के 10.95 रुपये प्रति इकाई से गिरकर इस महीने 2.44 रुपये प्रति इकाई पर लुढ़क चुकी हैं। गैस और परमाणु बिजली की कीमतें अगर कोयला या सौर बिजली के अनुपात में नहीं आती हैं तो उनके लिए लंबी अवधि के आपूर्ति करार और विदेशी निवेश जुटा पाना चुनौती का सबब होगा। हालांकि समग्र मांग बढऩे पर अधिक महंगी दर पर बिजली मंगाने की स्थिति पैदा सकती है। 
 
ऊर्जा उपलब्धता बनेगी प्राथमिक चालक : ग्रामीण विद्युतीकरण के मोर्चे पर काम में आई तेजी के बावजूद लाखों घरों तक बिजली नहीं पहुंचाई जा सकी है। इसके अलावा अधिकांश ग्रामीण घरों में खाना पकाने के लिए उन्नत ईंधन विकल्पों का भी अभाव है। ऊर्जा उपलब्धता से इन घरों में ऊर्जा के इस्तेमाल की आदतों को बदला जा सकता है जिससे वे ऊर्जा के लिए स्थायी भुगतान करने वाले ग्राहक के रूप में तब्दील हो सकें। इसके अलावा ऊर्जा कारोबार से जुड़ी कंपनियों की वित्तीय सेहत और तकनीकी क्षमताओं का आपूर्ति की जाने वाली बिजली की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। ऊर्जा उपलब्धता सुधारने के लिए द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के वास्ते सहयोगी इकाइयां अहम सहारा बन सकती हैं। 
 
भारत के औद्योगिक और शहरी विकास के लिए ऊर्जा सक्षमता अहम है: हमारी ऊर्जा मांग का रुझान अगड़ी अर्थव्यवस्थाओं के तालमेल में नजर आता है। जब इन देशों की प्रति व्यक्ति आय भारत के बराबर हुआ करती थी तब उनकी ऊर्जा मांग भारत के ही बराबर हुआ करती थी। (भारत में फिलहाल प्रति व्यक्ति 25 गीगा जूल बिजली की सालाना मांग बनी हुई है।) लेकिन भारत को ऊर्जा का अपव्यय किए बगैर विकसित देशों की आय के स्तर तक पहुंचने की जरूरत है।
 
भारत का औद्योगिक क्षेत्र करीब एक चौथाई ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने के लिए जिम्मेदार है। ऊर्जा इस्तेमाल में सटीकता की दरकार है क्योंकि उत्सर्जन का स्तर काफी बढ़ चुका है। (सीईईडब्ल्यू के शोधकर्ताओं के मुताबिक ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन 2 लाख इकाई तक जा पहुंचा है) फिलहाल तो केवल बड़ी इकाइयों के स्तर पर ऊर्जा सक्षमता की योजनाएं लागू की जा रही हैं जबकि अधिकांश छोटी इकाइयों को लेकर सुस्त रवैया अपनाया जा रहा है। इसके चलते निम्न ऊर्जा उत्पादकता और उच्च ऊर्जा लागत की स्थिति पैदा हो रही है। 
 
औद्योगिक प्रगति को स्थायी बनाए रखने के लिए छोटे एवं मझोले उपक्रमों को सहयोग दिया जाना जरूरी होगा। इसी तरह तेजी से शहरीकृत होती जा रही अर्थव्यवस्था के लिए वैकल्पिक परिवहन साधनों और ईंधन विकल्पों पर अंतरराष्ट्रीय मदद और भागीदारी लगातार अहम होती जाएगी। भारत में अगले दो दशकों में वातानुकूलन की जरूरत करीब पांच गुनी हो जाएगी जो कि चीन के शहरों से भी अधिक होगा। लिहाजा इस क्षेत्र में भी तकनीकी सहयोग, भवन निर्माण डिजाइन और ऊर्जा उपभोग की आदत के स्तर पर भी काफी कुछ करने की संभावना बनेगी। 
 
भारत की शर्तों पर ऊर्जा सुरक्षा:  भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा जरूरी संसाधनों की उपलब्धता, पहले से अंदाजा लगाई जा सकने वाली कीमतों और न्यूनतम आपूर्ति व्यवधानों के साथ ही पर्यावरणीय पहलुओं का भी ख्याल रखने पर निर्भर करती है। परंपरागत तौर पर भारत ने द्विपक्षीय तरीके से ऊर्जा संसाधनों को सुरक्षित करने की कोशिश की है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ईरान, सऊदी अरब और मोजाम्बिक जैसे देशों के साथ ऊर्जा संबंधों को भी गहरा किया जा रहा है। इसके साथ ही आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित रखने के लिए समुद्री नौवहन सुरक्षा सहयोग को भी आश्वस्त करने की जरूरत है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया ने एलएनजी खरीद के अधिक अनुकूल और लचीले सौदों के लिए मिलकर बातचीत करने के वास्ते मार्च में एक गठजोड़ किया है। भारत को भी एलएनजी की बढ़ती मांग को देखते हुए आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के गठबंधन के बारे में विचार करना चाहिए। 
 
अर्थव्यवस्था को चलाने वाले दो ईंधन:  ऊर्जा और वित्त किसी भी अर्थव्यवस्था में ईंधन का काम करते हैं। वित्त के अभाव में ऊर्जा आर्थिक प्रगति को रफ्तार नहीं दे सकती है। नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा सक्षमता को बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की जरूरत होती है। इस तरह की ढांचागत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर बिना जोखिम वाली संस्थागत पूंजी की दरकार होती है। इसके अलावा ऊर्जा से संबंधित शोध एवं विकास कार्यों में भी लगातार निवेश की जरूरत होती है। भारत में ऊर्जा क्षेत्र का रूपांतरण अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बगैर मुमकिन नहीं हो पाएगा। दरअसल भारत को पूंजी की आसान उपलब्धता के साथ ही नई तकनीक के स्तर पर भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत होगी। भारत ने दूसरे देशों के साथ मिलकर ऊर्जा के क्षेत्र में शोध एवं विकास कार्य शुरू किए हैं और छोटे स्तर के द्विपक्षीय क्रेडिट भी मिलने लगे हैं। ऊर्जा के भंडारण की तकनीकें, विभिन्न वित्तीय जोखिमों को कम करने और बॉन्ड बाजार को सशक्त करने जैसे असली गेम चेंजर तो अभी तक नदारद ही हैं। इस दिशा में अवसर मौजूद हैं जिन्हें आजमाने की जरूरत है।
 
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवॉयरनमेंट ऐंड वाटर -सीईईडब्ल्यू के मुख्य कार्याधिकारी और एनर्जाइजिंग इंडिया के सह-लेखक हैं)
Keyword: power, solar, पवन ऊर्जा,
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