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मीडिया का 'एमेजॉन' बन सकता है नेटफ्लिक्स

आकाश प्रकाश /  May 25, 2017

वैश्विक ऑनलाइन जगत की इस कंपनी ने भारत पर भले ही कम असर डाला है लेकिन आगे चलकर उसका प्रभाव अवश्यंभावी है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
एमेजॉन सही मायनों में सफलता की दास्तान लिखती है। बमुश्किल 20 साल पहले यह कंपनी 43.8 करोड़ डॉलर के आरंभिक मूल्यांकन के साथ सूचीबद्घ हुई थी। आज कंपनी का बाजार मूल्यांकन करीब 460 अरब डॉलर के करीब है। एमेजॉन को वालमार्ट का बाजार मूल्यांकन पार करने में 18 वर्ष का समय लगा जबकि अगले दो साल में इसका मूल्यांकन एक बार फिर दोगुना बढ़ गया। पारंपरिक खुदरा कारोबारियों का काम बहुत हद तक एमेजॉन को स्थानांतरित हो गया। बीते दो साल में एमेजॉन का बाजार मूल्यांकन 250 अरब डॉलर बढ़ा। जबकि पारंपरिक खुदरा कारोबारियों के बाजार पूंजीकरण में 230 अरब डॉलर की कमी आई। आज एमेजॉन का बाजार पूंजीकरण सभी पारंपरिक खुदरा कारोबारियों के कुल कारोबार के 55 फीसदी के बराबर है। 
 
यह सच है कि कंपनी को शायद ही शुद्घ लाभ होता हो लेकिन उसने वर्ष 2001 के बाद से लगातार परिचालन नकदी प्रवाह दिखाया है। वर्ष 2016 में इसका स्तर बढ़कर 16 अरब डॉलर तक जा पहुंचा। अपनी तमाम सफलता के बावजूद कंपनी के पास अमेरिकी ई-कॉमर्स बिक्री का केवल 33 फीसदी है। हालांकि वैश्विक स्तर पर उसके कारोबार में लगातार सुधार हो रहा है। इसके मूल्यवद्र्घन को देखते हुए हर निवेशक एक और एमेजॉन की उम्मीद कर रहा है। कई लोगों को उसमें और नेटफ्लिक्स में समानता नजर आ रही है। दोनों के रुख में एक खास किस्म की समानता देखने को मिलती है। एमेजॉन ने कम कीमतों में बेहतर उत्पाद और इस्तेमाल की सुगमता मुहैया कराने के लिए ई-कॉमर्स के तकनीकी खलल का इस्तेमाल किया। उसने जल्दी ही बहुत बड़ा नेटवर्क बना लिया और वह बड़े पैमाने पर काम करने लगी। 
 
नेटफ्लिक्स भी तकनीकी खलल का इस्तेमाल कर रही है। वह मांग पर वीडियो की स्ट्रीमिंग करके कम कीमत पर बेहतर उत्पाद मुहैया कराने का प्रयास कर रही है जिसे इस्तेमाल करना सुगम हो। उसने भी बहुत बड़े पैमाने पर कारोबार का प्रसार किया और नेटवर्क तैयार कर लिया। दोनों ही मामलों में पुरानी कंपनियों को दुविधा का सामना करना पड़ा। उनको लगने लगा कि वे करें तो क्या करें? 
 
क्या शून्य मार्जिन पर खुद को खत्म हो जाने दें या बाकी बचे पुराने कारोबार में अपना मुनाफा हासिल करने का प्रयास करें? खुदरा कारोबार की तरह यहां भी पारंपरिक मीडिया कारोबारियों के कारोबार का बड़ा हिस्सा उसके खाते में चला गया। बीते दो वर्ष में नेटफ्लिक्स का बाजार मूल्यांकन 35 अरब डॉलर बढ़ा है। मीडिया जगत की दिग्गज कंपनियों को बाजार पूंजीकरण में 30 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। 
 
बीते नौ वर्ष में अमेरिका में नेटफ्लिक्स के पांच करोड़ उपभोक्ता बने और दुनिया भर में 10 करोड़। पे टीवी को अमेरिका में इस आंकड़े तक पहुंचने में 15 साल का समय लगा था। आश्चर्य की बात है कि पारंपरिक पे टीवी कंपनियों के ग्राहकों की तादाद इस अवधि में केवल 30 लाख कम हुई है। इससे पता चलता है कि अधिकांश उपभोक्ता दोनों सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। पारंपरिक टेलीविजन के लिए डराने वाली बात यह है कि दर्शक नेटफ्लिक्स जैसे नए माध्यमों की ओर तेजी से जा रहे हैं। 
 
अमेरिका में बीते तीन साल से पारंपरिक टेलीविजन के दर्शकों की तादाद में तेजी से कमी आ रही है। अगर आप आंकड़ों पर नजर डालें और उसे जननांकीय दृष्टिï से समायोजित करें तो मामला और भी भयावह नजर आता है। युवा दर्शक जो विज्ञापनदाताओं के लिए अधिक अहमियत रखते हैं, उनकी तादाद में सबसे अधिक कमी है। 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग टीवी ज्यादा देखते हैं। बीते चार साल में अमेरिका में औसतन प्रति व्यक्ति टीवी देखने के समय में 20 मिनट की कमी आई है। इसके बावजूद आज भी अगर कोई 251 मिनट पारंपरिक टीवी देखता है तो इसकी तुलना में वह केवल 74 मिनट ही नेटफ्लिक्स जैसे वैकल्पिक मंच पर जाता है। 
 
नेटफ्लिक्स ने सही मायने में नेटवर्क कारोबार तैयार किया है। इसके पास सबसे अधिक उपभोक्ता हैं इसलिए वह विषय वस्तु पर अधिक से अधिक खर्च कर सकती है। इससे उसे और अधिक उपभोक्ताओं को अपने साथ जोडऩे में मदद मिलेगी और यह चक्र चलता रहेगा। माना जा रहा है कि आने वाले साल में नेटफ्लिक्स विषय वस्तु जुटाने पर 8 अरब डॉलर की राशि खर्च करेगा। अगर वैश्विक स्तर पर खेल को छोड़कर इंटरनेट में विषय वस्तु पर ध्यान दिया जाए तो नेटफ्लिक्स गैर खेल क्षेत्र का सबसे बड़ा खरीदार है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में उसकी हिस्सेदारी 20 फीसदी या अधिक होगी।
 
अमेरिका में गत वर्ष जो पांच टीवी शो सबसे अधिक देखे गए वे सभी नेटफ्लिक्स के थे। जाहिर सी बात है विषय वस्तु पर जो खर्च किया जा रहा है वह दर्शकों की तादाद के रूप में सामने आ रहा है। ये तमाम बातें इसलिए अहम हैं और भारत पर इनका क्या असर होगा? दरअसल भारत में नेटफ्लिक्स जैसे कई चैनलों की कोशिश हो रही है। देश में मीडिया शेयर महंगे हैं। अभी भी हमारे यहां टीवी नेटवर्क पर दांव लगाया जा रहा है। मीडिया जगत के दिग्गजों का मानना है कि भारत का बाजार काफी अलग है। पहली बात तो यह है कि नेटफ्लिक्स अमेरिका में इसलिए सफल रहा क्योंकि पेटीवी करीब 82 डॉलर मासिक शुल्क के साथ खासा महंगा है। 
 
वहीं नेटफ्लिक्स 10 डॉलर प्रति माह के साथ बेहद किफायती है। भारत में केबल, डीटीएच आदि का मासिक शुल्क 300-350 रुपये प्रतिमाह है। भारत में अधिकांश विषय वस्तु पर प्रकाशक का अधिकार होता है, न कि स्टूडियो का। वे उसे नेटफ्लिक्स को क्यों देंगे? नेटफ्लिक्स को अपने लिए इसकी लाइब्रेरी तैयार करने में लंबा समय लगेगा। आप केवल वैश्विक सामग्री से काम नहीं चला सकते। शहरी वर्ग से इतर अपनी पहुंच बनाने के लिए स्थानीय सामग्री की आवश्यकता होगी। भारत में ब्रॉडबैंड की पहुंच मोटे तौर पर वायरलेस और मोबाइल से है। 
 
जियो की शुरुआत के बावजूद केवल वायरलेस ब्रॉडबैंड पर स्ट्रीमिंग कारोबार तैयार नहीं किया जा सकता है। वायरलेस सेवा में डाटा उपयोग पर शुल्क लिया जाता है, वहीं कई घंटों के वीडियो की स्ट्रीमिंग में तकनीकी जटिलता है। उपरोक्त बात में दम है और भारत में हो सकता है नेटफ्लिक्स जैसी विसंगति पैदा न की जा सके लेकिन इसके बावजूद हमें इस पर नजर रखनी होगी। एसवीओडी निस्संदेह परंपरागत मीडिया के लिए एक बड़ी त्रासदी साबित होता है। नेटफ्लिक्स हो या कोई और भारत में वह अपना हिस्सा तैयार कर लेगा। भारत में कोई न कोई एसवीओडी कोड का तोड़ निकालेगा और भारी पैसा कमाएगा। 
Keyword: e commerce, amazon, netflix,,
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