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बैंकों का फंसा हुआ कर्ज और एआरसी

जैमिनी भगवती और शुहेब खान /  May 24, 2017

बैंक अपनी फंसी परिसंपत्ति मूल्य कम करने के लिए तैयार नहीं हैं। जबकि एआरसी को ऐसी कीमत स्वीकार्य नहीं है। इसकी वजह से फंसे कर्ज के निपटान में दिक्कत आ रही है, बता रहे हैं जैमिनी भगवती और शुहेब खान 

 
देश में दीर्घावधि के अधिकांश ऋण सरकारी बैंक (पीएसबी) मुहैया कराते हैं। बीते 10 वर्ष में इन बैंकों ने इस्पात उत्पादन, बिजली उत्पादन और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के लिए जो ऋण दिया वह समझदारी भरा नहीं था। मार्च 2016 के आखिर में इन बैंकों का शुद्घ फंसा हुआ कर्ज (एनपीए) 2.5 लाख करोड़ रुपये था। जीडीपी के स्तर के रूप में यह 1.9 फीसदी और तमाम अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों में 2.6 फीसदी था। सितंबर 2016 तक सरकारी बैंकों में कुल अग्रिम के मुकाबले एनपीए का अनुपात बढ़कर 7.4 फीसदी हो गया था। सरकार ने इन बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 80,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था की जो अपर्याप्त नजर आती है। 
 
सरकारी बैंकों का बढ़ता फंसा हुआ कर्ज दीर्घावधि के ऋण को प्रभावित कर रहा है। इसका असर रोजगार निर्माण पर पड़ रहा है। सरकारी बैंकों को ऐसी फंसी हुई परिसंपत्ति से निजात पाने में मदद की आवश्यकता है। इस आलेख में हम समीक्षा करेंगे कि कैसे परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) की सीमित भूमिका को बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि उनकी स्थापना से जुड़ी तयशुदा लागत पहले ही व्यय हो चुकी है। (इक्रियर का पत्र: क्या एआरसी देश की ऋण समस्या के हल का हिस्सा हो सकती है? लेखक: जैमिनी भगवती, मोहम्मद शुहेब खान और रामकृष्ण रेड्डी बोगटी)।
 
ताजा आर्थिक समीक्षा के मुताबिक ढेर सारी राशि तो महज कुछ कर्जदारों के पास है। उदाहरण के लिए औसतन 50 कंपनियों के पास 20,000 करोड़ रुपये का कर्ज है। 10 कंपनियां ऐसी हैं जिन पर 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। समीक्षा में कहा गया है कि देनदारी चूकने वाले कारोबारियों के लिए ऋण माफी को नैतिकता के आधार पर नहीं नकारा जाना चाहिए। सरकार और आरबीआई को इसके लिए जरूरी पूंजी मुहैया करानी चाहिए। दरअसल नैतिकता का प्रयोग उलटा असर छोड़ सकता है। बहरहाल, सरकार द्वारा हमेशा करदाताओं के पैसे पर निजी उद्यमों को उबारना भी कोई स्थायित्व भरा मॉडल नहीं है। 
 
वर्ष 2008 के बाद अमेरिका सरकार ने बैंकों को ट्रबल्ड ऐसेट्स रिलीफ प्रोग्राम (टीएआरपी) के तहत 275 अरब डॉलर की राशि मुहैया कराई। यह राशि अब उसे लौटा दी गई है। बहरहाल, बैंकों की मदद की पूरी दास्तान में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा मॉर्गेज समर्थित प्रतिभूतियां खरीदना भी शामिल रहा है। फेडरल रिजर्व ने वास्तविक ब्याज दर में अप्रत्याशित कमी की। यहां तक कि वह उसे नकारात्मक स्तर तक ले गया। बीते आठ सालों में उसने वेतनभोगियों और पेंशन पाने वालों की काफी आय बैंकों के हवाले की है। 
 
बैंकों को अपना फंसा हुआ कर्ज एआरसी को बेचने का अधिकार सन 2002 में आए साराफेसी अधिनियम से मिला। वर्ष 2002 से अगस्त 2014 तक विभिन्न एआरसी ने अधिग्रहीत संपत्ति के उल्लिखित मूल्य का केवल 5 फीसदी ही चुकाया। शेष 95 फीसदी राशि प्रतिभूति प्राप्तियों (एसआर) के जरिये देने की बात कही गई। एसआर के साथ किसी तरह का ब्याज नहीं जुड़ा होता है और इसे वह बैंक खरीदता है जिसने अपना एनपीए किसी एआरसी को बेचा हो। अगर कोई रिकवरी होती है तो सबसे पहले कानूनी और समझौते संबंधी व्यय की पूर्ति की जाती है। इसके पश्चात एआरसी प्रबंधन शुल्क, बकाया एआरसी का करीब 1.5 फीसदी सालाना काटकर शेष बकाया एआरसी की ओर से एसआर धारकों को बांट दिया जाता है।
 
अगस्त 2014 में आरबीआई ने एआरसी के आरंभिक भुगतान को एनपीए के अधिग्रहीत मूल्य के पांच से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया गया। वर्ष 2013 के बाद अधिग्रहण मूल्य को भी तय मूल्य के 20 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी से ऊपर किया जा चुका था। इसकी वजह से एआरसी द्वारा एनपीए की खरीद में काफी कमी आई थी। अब तक आरबीआई ने एआरसी को भारतीय पूंजी बाजार में जाकर इक्विटी या डेट पूंजी जुटाने की इजाजत नहीं दी है। चूंकि एआरसी के पास जोखिम वाली पूंजी पर्याप्त नहीं होती इसलिए अधिग्रहीत संपत्ति के पुनर्गठन के बजाय उसका नकदीकरण ज्यादा होता है। आरबीआई को एआरसी को यह इजाजत देनी चाहिए कि वह सभी निजी पूंजी बाजार स्रोतों से पूंजी जुटाए।
 
इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड 2016 दिवालियापन के मामलों में लगने वाले समय को कम कर सकता है। हालांकि फिलहाल जबकि राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट और भारतीय इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी बोर्ड का गठन किया जा रहा है तब यह स्पष्ट नहीं है कि भारतीय अदालतें भी ऋणदाताओं को तेज राहत देंगी या नहीं। हाल में आए एक अध्यादेश की मदद से बैंकिंग नियमन अधिनियम में बदलाव लाया गया। इसने आरबीआई को यह अधिकार दिया है कि वह सरकारी बैंकों को एनपीए के निपटान संबंधी निर्देेश दे सके। यह तो वक्त ही बताएगा कि व्यवहार में यह अध्यादेश किस कदर बदलाव लाने में सक्षम है।
 
फंसे हुए कर्ज के निपटान में एक समस्या यह भी आती है कि बैंक अपनी फंसी हुई परिसंपत्ति का मूल्य कम करने के इच्छुक नहीं दिखते। एआरसी तथा अन्य लोग इनका अपेक्षाकृत कम मूल्य देने के इच्छुक होते हैं। समस्या इस बात से भी बढ़ जाती है कि यह परिसंपत्ति ज्यादातर सरकारी बैंकों के बहीखाते में होती है जबकि एआरसी का स्वामित्व अधिकांश मामलों में निजी क्षेत्र के हाथों में होता है। खुली बोली लगाकर परिसंपत्तियों की नीलामी के जरिये समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकता है। एनपीए की सफल खरीद के लिए आवश्यक है कि इस प्रक्रिया में दिवालियापन और विलय एवं अधिग्रहण क्षेत्र के अनुभवी लोग शामिल हों। इसके अलावा लचीले श्रम कानून और क्रेडिट लाइंस की जरूरत है।
 
वित्त मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति ने एनपीए के सार्वजनिक अंकेक्षण की संभावना पर विचार किया। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक सरकार इस्पात और बिजली क्षेत्र की कंपनियों को प्रोत्साहित कर सकती हैकि वे ऐसी नीलामी में भाग लें। नकदी संपन्न सरकारी कंपनियों को सरकार मजबूर नहीं कर सकती है कि वे खराब परिसंपत्तियों के लिए बढ़ाचढ़ाकर बोली लगाएं। इसमें निजी कंपनियों को शामिल करना जरूरी है। खासकर उनको जिनको इस बोली प्रक्रिया का ज्ञान हो। जापान, यूरो क्षेत्र और अमेरिका में इस समय अत्यंत कम ब्याज दरें चल रही हैं। ऐसे में एआरसी के जरिये अच्छी खासी विदेशी पूंजी जुटाई जा सकती है। यह देश में आने वाले प्रत्यक्ष पूंजी निवेश के समान होगी।
 
हमारे देश की हकीकत यह है कि बढ़ते फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटने का कोई भी प्रयास राजनीतिक और कानूनी पेच में उलझ जाएगा। संक्षेप में कहें तो देनदारी में चूक करने वाली फर्मों को अदालत मजबूर कर सकती है कि अनुबंध के दायित्व का पालन करें। पारदर्शी बोली प्रक्रिया में निजी निवेशक भी धन लगाने को तैयार हैं। अगर ऐसा होता है तो करदाताओं को सरकारी बैंकों के लिए कम से कम फंडिंग करनी होगी। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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