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संपादकीय /  May 24, 2017

चिकनगुनिया, डेंगू, मलेरिया आदि मच्छरों से फैलने वाली तमाम अन्य बीमारियों ने इस वर्ष देश के कई हिस्सों में आमतौर पर पहले हमला बोल दिया है। यह इस बात का संकेत है कि स्वास्थ्य विभाग बचाव के उचित उपाय अपनाने में नाकाम रहा है। आमतौर पर ऐसी बीमारियां बारिश के मौसम में सर उठाती हैं क्योंकि वह मौसम मच्छर-मक्खी आदि के पनपने के लिए अनुकूल होता है। स्वाभाविक तौर पर सबसे बुरा असर शहरों पर पड़ा है। अकेले दिल्ली में जनवरी से अब तक चिकनगुनिया और डेंगू के 92 मामलों की पुष्टिï हो चुकी है जबकि 38 पीडि़तों की मौत हो गई है। दिल्ली उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने सोमवार को सरकार और नगर निकायों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इन बीमारियों से बचाव के समुचित इंतजाम क्यों नहीं किए गए। अगर बीमारियों में इजाफा मौजूदा दर पर होता रहा तो इस वर्ष हालत 2016 से भी बुरी होगी। जबकि उस वर्ष चिकनगुनिया का सबसे बुरा हमला हुआ था। अकेले दिल्ली में 12,221 मामले दर्ज किए गए थे।

 
विशेषज्ञों के मुताबिक बीमारियों के समय पूर्व हमले के लिए खराब सफाई, लापरवाह निर्माण कार्य, असुरक्षित टैंक और जल भंडारण की अन्य व्यवस्थाएं तथा ठोस कचरे के निपटान की खराब व्यवस्था जिम्मेदार है। इसके अलावा मच्छरों पर नियंत्रण में नाकामी तो समस्या है ही। इस बार बुरी बात यह है कि स्वाइन फ्लू (एच1एन1) जैसी समान रूप से घातक बीमारी भी साथ-साथ उभरी है। इस वर्ष पहले ही स्वाइन फ्लू के 8,650 मामले सामने आ चुके हैं जिनमें 346 मौतें हो चुकी हैं। यह पिछले वर्ष कुल पुष्टï मामलों का पांच गुना है। ऐसी घातक और संक्रामक बीमारी को लेकर ऐसा रुख ठीक नहीं है। यह बीमारी जानवरों से मनुष्यों और मनुष्यों से जानवरों में संचारित होती है। यह पीडि़त के लार और बलगम से फैलती है।
 
संयोगवश इस बार एच1एन1 का जो प्रकार फैल रहा है वह अन्य की तुलना में अपेक्षाकृत कम घातक है। इसके बावजूद देश भर में इसके प्रसार की गति भी चिंताजनक है। तमिलनाडु में स्वाइन फ्लू के 2,800 मामले सामने आ चुके हैं। महाराष्ट्र में सबसे अधिक 180 मौत हो चुकी हैं। लेकिन जोखिम भरे इलाकों में रहने वालों के बचाव के कोई खास उपाय किए जा रहे हों, ऐसा भी नजर नहीं आता। इसके लिए टैमीफ्लू और जानामवीर जैसी दवाएं इस्तेमाल होती हैं जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इन दवाओं से संक्रमण कम होता है, बीमारी की गंभीरता और उसकी अवधि सीमित होती है। इससे मरीजों को बड़ी राहत मिलती है। 
 
मच्छरों और मक्खियों से फैलने वाली बीमारियों के मामले में फॉगिंग की मदद ली जाती है जो अब मच्छरों से निपटने में प्रभावी नहीं रह गई। इससे केवल बड़े मच्छर मरते हैं जबकि छोटे मच्छर और लार्वा आदि प्रभावित नहीं होते। अच्छी बात है कि अब कई अन्य जैविक और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर उपाय उपलब्ध हैं जिनकी मदद से मच्छरों को नियंत्रित किया जा सकता है। मछलियों की कुछ प्रजातियां ऐसी हैं जो लार्वा पर ही जिंदा रहती हैं। इनकी तादाद बढ़ानी चाहिए और उन जलाशयों में छोड़ा जाना चाहिए जहां मच्छर तेजी से पनपते हैं। जानकारी है कि चीन जीन संवद्र्घित नर मच्छरों का इस्तेमाल कर रहा है जो संबंध बनाते वक्त मादा मच्छर में जहर डाल कर उसे मार डालता है। आयुर्वेद और होमियोपैथी जैसी वैकल्पिक चिकित्सा पद्घतियां भी दावा करती हैं कि उनमें पास इसका इलाज है। केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद ने 'आयुषपीजे7' नामक दवा विकसित करने की घोषणा की है जो डेंगू को नियंत्रित कर सकती है। ऐसे विकल्प जो आसानी से उपलब्ध हैं और आम आदमी की पहुंच में हैं उनको बढ़ावा देने की जरूरत है। तभी इन बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है। 
Keyword: चिकनगुनिया, डेंगू, मलेरिया,
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