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ऊर्जा योजनाओं के दम पर जीता यूपी

शाइन जैकब और श्रेया जय /  05 23, 2017

नजर कदम दर कदम

नरेंद्र मोदी सरकार 26 मई को अपने कार्यकाल का 3 साल पूरा करने जा रही है। इस दौरान कड़ी-दर-कड़ी सरकार के कामकाज का जायजा पेश किया जा रहा है

गरीब परिवारों के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को कई लोगों ने प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश योजना कहा क्योंकि इसके लाभार्थियों में 30 फीसदी से अधिक इसी राज्य के थे। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में मार्च में हुए विधानसभा चुनावों में धमाकेदार जीत दर्ज की। चाहे वह प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना हो या फिर दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, गरीबों तक  ऊर्जा की पहुंच बढ़ाने के लिए शुरू किए गए प्रमुख कार्यक्रमों से राजग सरकार को फायदा हुआ है।

दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और समेकित बिजली विकास योजना (आईपीडीएस) के लिए वर्ष 2017-18 के बजट में क्रमश: 43 फीसदी और 30 फीसदी अधिक आवंटन किया गया है। आईपीडीएस का मकसद शहरी क्षेत्रों में बिजली के बुनियादी ढांचे का विस्तार करना है। विद्युतीकरण की योजनाओं के बारे में हो रहे प्रचार और कई वेबसाइट शुरू होने के बावजूद बाजार की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ है। प्राइसवाटरहाउसकूपर्स के लीडर, एनर्जी, यूटिलिटीज ऐंड माइनिंग कामेश्वर राव ने कहा कि यह प्रगति केवल नियामकीय सुधारों तक सीमित है। उनके मुताबिक ऊर्जा क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव और कर्ज तथा सब्सिडी पर इसकी निर्भरता समाप्त करने के लिए बिजली वितरण में प्रतिस्पद्र्घा और निजी भागीदारी के लिए अहम है।

सरकारी बिजली वितरण कंपनियों के कर्ज के पुनर्गठन के लिए शुरू किए गए कार्यक्रम उदय के तहत वितरण की समस्याओं से निपटने का प्रयास किया गया है। 26 राज्य केंद्र की उदय और सभी के लिए बिजली परियोजनाओं से जुड़े हैं। इनमें गैर भाजपा शासित राज्य भी शामिल हैं। फिर भी डेटा एग्रीगेटिंग वेबसाइट न्यूमेरिकल डॉट कॉम डॉट इन के मुताबिक उदय के साथ समझौते के बावजूद वितरण कंपनियों का उत्पादन कंपनियों पर बकाया अप्रैल, 2016 के बाद छह महीने में 7,626 करोड़ रुपये बढ़ गया है जो 62 फीसदी अधिक है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की सफलता को देखते हुए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान इसके लिए बजट में 4,800 करोड़ रुपये ज्यादा आवंटन की मांग कर रहा है। लेकिन इस योजना के क्रियान्वयन में भी कई पेच रहे हैं। इस योजना के तहत आवंटित एक सिलिंडर में उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के करीब हुए धमाके में छह लोग मारे गए थे जिससे सुरक्षा मानकों पर सवाल उठ रहे हैं। इस घटना के बाद ही इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन जैसी तेल विपणन कंपनियों ने सुरक्षा और जागरूकता पहलुओं पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है।

आलोचकों का कहना है कि इस योजना को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए सुधार की जरूरत है। तेल विपणन कंपनियों का कहना है कि इस योजना के तहत अनियमितताओं के 37 मामले सामने आ चुके हैं। एक समस्या यह भी है कि कम से कम छह फर्जी वेबसाइट इस योजना की आधिकारिक वेबसाइट होने का दावा कर रही हैं। कई तो डिस्ट्रिब्यूटरशिप के लिए पैसे भी वसूल रही हैं। इस योजना के तहत अभी तक 694 जिलों में 2.225 करोड़ एलपीजी कनेक्शन दिए जा चुके हैं। सरकार का अनुमान है कि इन अतिरिक्त कनेक्शनों से कम से कम 25 करोड़ लोगों को फायदा होगा और इससे करीब 100,000 रोजगार पैदा होंगे। सरकार ने वित्त वर्ष 2016-17 के लिए 1.5 करोड़ कनेक्शन का लक्ष्य रखा था जिसे पार कर लिया गया था। 

डेलॉयट टच तोमात्सू इंडिया में पार्टनर देवाशिष मिश्रा ने कहा, 'सरकार ने खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन तक गरीबों की पहुंच बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत शानदार काम किया है। पहल योजना के जरिये जनधन, आधार और मोबाइल (जेएएम) के तिकड़ी का इस्तेमाल कर सरकार उन लोगों को सब्सिडी का लाभ देने में सफल रही है जो इसके हकदार हैं।' पहल एलपीजी सब्सिडी के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना है जिसके तहत लाभार्थी को सब्सिडी मिलती है। साल में 12 सिलिंडरों के लिए यह सब्सिडी सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में हस्तांतरित की जाती है।

साथ-साथ सरकार ने डुप्लिकेट कनेक्शन खत्म करने की दिशा में भी काम किया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने खुद 'गिवइटअप' अभियान चलाकर लोगों को एलपीजी सब्सिडी छोडऩे के लिए उत्साहित किया है। इसके तहत अभी तक 1.5 करोड़ परिवार एलपीजी सब्सिडी छोड़ चुके हैं। सरकार का दावा है कि उसने फर्जी और डुप्लिकेट एलपीजी कनेक्शन खत्म करके और पहल योजना के जरिये कम से कम 21,000 करोड़ रुपये की बचत की है। हालांकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक इन योजनाओं के कारण एलपीजी  सब्सिडी में केवल 1,764 करोड़ रुपये की बचत हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में गिरावट से 21,552 करोड़ रुपये की बचत हुई है।

ग्रामीण विद्युतीकरण की समस्याएं कुछ अलग तरह की हैं। यहां केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के कामकाज पर नजर रखने का काम किया है। 14 अक्टूबर, 2015 को शुरू हुए ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (गर्व) के पहले चरण में 18,000 फील्ड इंजीनियरों को नियुक्त किया गया था। इनका काम यह देखना था कि राज्य सरकारें गांवों के विद्युतीकरण पर फंड का इस्तेमाल सही ढंग से कर रही है या नहीं। अब विद्युतीकरण का मतलब है कि गांव के हर घर में बिजली का कनेक्शन और नियमित बिजली की आपूर्ति हो। पिछले साल नवंबर में गर्व का दूसरा चरण शुरू किया गया था। इसके तहत निगरानी तंत्र 760,000 गांवों के सभी घरों में मीटर, बिजली आपूर्ति और बिजली कटौती के बारे में विस्तृत सूचना देता है।

राव ने कहा, 'ग्रामीण विद्युतीकरण, छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना और एलईडी बल्बों का वितरण जैसे कार्यक्रम काफी सफल रहे हैं। साथ ही सरकार कोयला उत्पादन से लेकर ताप और अक्षय ऊर्जा के उत्पादन तथा वितरण की क्षमता भी प्रतिस्पर्धी लागत पर बढ़ाने में सफल रही है।' दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण ज्योति योजना के लिए 1.08 लाख करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं जिनमें से 49,539 करोड़ रुपये राज्यों को दिए गए हैं। गांवों के विद्युतीकरण यानी वहां वहां ग्रिड पहुंचाने का लक्ष्य 95 फीसदी पूरा हो चुका है। लेकिन 760,000 गांवों में प्रत्येक घर को बिजली से रोशन करने का काम अभी 55 फीसदी ही पूरा हुआ है। साथ ही अभी 24 घंटे बिजली आपूर्ति भी सुनिश्चित नहीं हुई है। अक्सर राज्य सही आंकड़े देने से इनकार करते हैं जिससे निगरानी में मुश्किल होती है।

आईपीडीएस के लिए मंजूर किए गए 25,898 करोड़ रुपये में से 2,659 करोड़ रुपये शहरी इलाकों के लिए जारी किए जा चुके हैं। यह केंद्र सरकार की एकमात्र ऐसी योजना है जिसमें केंद्रीय अनुदान 60 फीसदी से अधिक है। 1,228 कस्बों में बिजली व्यवस्था को सुदृढ़ करने की जरूरत है। इनमें से 738 कस्बों को राजग सरकार के तीन साल के कार्यकाल में कवर किया जा चुका है। वर्ष 2019 तक 4,041 शहरों को सूचना प्रौद्योगिकी आधारित बिजली आपूर्ति व्यवस्था से जोड़ा जाना है। इनमें से 1,405 को इससे जोड़ा जा चुका है। 

बिजली मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'राज्य आगे नहीं आ रहे हैं जिसके कारण कम ही मंजूरी दी गई है। लेकिन पिछले तीन सालों में जबसे शहरी विद्युतीकरण के विभिन्न कार्यक्रमों को एक व्यापक योजना के तहत लाया गया है तबसे इसकी गति में सुधार आया है। साथ ही पहली बार शहरी विद्युतीकरण के लिए बजट में इतना ज्यादा आवंटन किया गया है।'

अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी सरकार के प्रयास रंग लाते दिख रहे हैं। 2016-17 के दौरान अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में 11,320 मेगावॉट की रिकॉर्ड क्षमता जोड़ी गई। 31 मार्च, 2017 तक देश में ग्रिड से जुड़ी अक्षय ऊर्जा क्षमता 57,260 मेगावॉट थी। यह स्थिति तब है जब सौर और पवन ऊर्जा की दरें नीलामी के हर चरण के बाद नीचे आ रही हैं। पवन ऊर्जा की दर 3.46 रुपये यूनिट पर पहुंच गई है जबकि राजस्थान के भादला सौर पार्क के लिए लगी बोली में सौर ऊर्जा की दर 2.62 रुपये प्रति यूनिट पर आ गई जो ताप बिजली से भी कम है।

अक्षय ऊर्जा से देश में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी और साथ ही कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में मदद मिलेगी। लेकिन टैरिफ में कमी सरकार के लिए एक चुनौती है। चुनौतियों के बावजूद विश्लेषकों का कहना है कि सभी के लिए ऊर्जा उपलब्धता की योजना सही दिशा में आगे बढ़ रही है। उदाहरण के लिए एलपीजी का मामला ही लीजिए। देश में आजादी के बाद 67 वर्षों में 14 करोड़ कनेक्शन दिए गए जबकि नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में 20 करोड़ कनेक्शन दिए गए हैं। साथ ही ग्रामीण विद्युतीकरण में 95 फीसदी सफलता से जमीनी स्तर पर राजग सरकार की लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन आने वाले वर्षों में योजनाओं का समयबद्घ क्रियान्वयन, कामकाज में सुधार और उपभोक्ताओं के भरोसे को बरकरार रखना निर्णायक साबित होंगे। खासकर साल 2019 में जब इन लक्ष्यों को पूरा किया जाना है और राजग लोकसभा चुनावों का सामना करेगा।
Keyword: power, solar, ऊर्जा narendra modi,,
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