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फंसे कर्ज पर अध्यादेश से जुड़े पांच सवाल

देवाशिष बसु /  May 23, 2017

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) पर अध्यादेश एक अनिच्छुक नियामक पर बाहरी आदेश के जरिये सार्वजनिक बैंकों के कारोबार को साधने की कोशिश है। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
सरकार फंसे हुए कर्जों से निपटने के लिए हाल ही में अध्यादेश लेकर आई जिसके जरिये बैंकिंग नियमन अधिनियम में दो नए प्रावधान जोड़कर भारतीय रिजर्व बैंक को गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) या फंसे कर्ज के मामले में अधिक अधिकार दे दिए गए हैं। निवेशकों और कारोबारियों ने इसका स्वागत करते हुए इसे एक राष्ट्रवादी, संकल्पबद्ध और उद्देश्यपूर्ण सरकार की तरफ से उठाया सख्त कदम बताया है। 
 
लेकिन इस अध्यादेश के जरिये बैंकिंग अधिनियम में जोड़े गए दोनों प्रावधानों में क्या जिक्र है? धारा 35ए ए के मुताबिक अगर कर्ज भुगतान में चूक होती है तो केंद्र सरकार रिजर्व बैंक को इस बात के लिए अधिकृत कर सकती है कि वह किसी परिसंपत्ति को दिवालिया घोषित करने के लिए बैंकों को प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दे। वहीं अधिनियम की धारा 35ए बी के मुताबिक रिजर्व बैंक कर्जदार परिसंपत्तियों को उबारने के लिए बैंकों को निर्देश दे सकता है। रिजर्व बैंक इन परिसंपत्तियों को संकट से निकालने के लिए बैंकिंग कंपनियों को परामर्श देने के वास्ते समितियों या प्राधिकरणों को भी चिह्नित कर सकता है। असल में, इस संशोधन में केवल यह कहा गया है कि केंद्र सरकार रिजर्व बैंक को बताएगी कि कर्ज में फंसी परिसंपत्तियों के समाधान की जरूरत के बारे में बैंकों को बताया जाए। क्या इससे फंसे हुए कर्जों के निपटारे की गति और दिशा में कोई बदलाव आएगा? इस मसले से पांच सवाल उभरकर सामने आते हैं:
 
पहला, इस सरकार ने दो ज्ञान संगमों के आयोजन, इंद्रधनुष और बैंक बोर्ड ब्यूरो के गठन जैसे जो कदम पहले उठाए थे, उनका क्या हुआ? एनपीए की समस्या से निपटने के लिए रिजर्व बैंक ने भी कई योजनाएं शुरू की थीं। क्या इन सभी कदमों के नतीजों का कोई विश्लेषण किया गया है? नए नियम बन जाने के बाद क्या पहले से जारी योजनाएं बंद कर दी जाएंगी?
 
दूसरा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए दो साल पहले इंद्रधनुष योजना शुरू की गई थी। उसमें बैंकों के वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति, बैंक बोर्ड ब्यूरो का गठन, बैंकों में अधिक पूंजी डालने, फंसे कर्ज की मात्रा कम करने, बैंक प्रबंधन को सशक्त करने, जवाबदेही बढ़ाने और बेहतर शासन पर जोर दिया गया था। बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित लेख में मैंने उस समय भी इस विचार से जुड़ी समस्याओं का जिक्र किया था। इन सात में से सरकार ने केवल उन तीन बातों पर ही अमल किया जो आसान थे और सार्वजनिक बैंकों को गहराई से प्रभावित करने वाली असली समस्याओं से उनका मामूली नाता ही था। 
 
सरकार ने बैंकों के शीर्ष पदों पर नियुक्ति में आधे-अधूरे मन से ही प्रयास किए और बैंकों में थोड़ी अधिक पूंजी लगा दी। बाद में बैंक बोर्ड ब्यूरो का गठन किया गया लेकिन अभी तक उसकी भूमिका ही तय नहीं हो पाई है। इंद्रधनुष योजना के चार अन्य बिंदुओं पर तो ठीक से गौर भी नहीं किया गया। 
 
तीसरा, अगर प्रबंधन का सशक्तीकरण संदेह पैदा करने का ही दूसरा नाम है तो फिर सरकार इसे बखूबी अंजाम दे रही है। सरकार ने कुछ दिन पहले अचानक ही कुछ बैंकों के प्रमुखों की अदला-बदली कर दी। मुश्किलों से घिरे आईडीबीआई बैंक के प्रमुख को बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले इंडियन बैंक में भेज दिया गया है। नए चेयरमैन ने आते ही कॉर्पोरेट क्षेत्र को कर्ज बढ़ाने की बात करनी शुरू कर दी। यह बयान देते समय उन्होंने इस तथ्य पर भी ध्यान नहीं दिया कि बिना सोचे-समझे निजी क्षेत्र को कर्ज नहीं देने से ही इंडियन बैंक अब तक एनपीए के बोझ से बचा रहा है। पंजाब नैशनल बैंक और बैंक ऑफ इंडिया के प्रमुखों को बिना कोई वजह बताए अपेक्षाकृत छोटे बैंकों में भेज दिया गया है। इसे उन बैंक प्रमुखों की पदावनति के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में उन्हें जिन बैंकों में भेजा गया है, उनके लिए वे कितने मददगार साबित होंगे?
 
चौथा, इस पृष्ठभूमि में रिजर्व बैंक बैंकिंग अधिनियम में जोड़े गए दो नए प्रावधानों का किस तरह उपयोग करेगा? धारा 35 के मुताबिक रिजर्व बैंक किसी भी बैंक के बहीखातों का निरीक्षण और समीक्षा कर सकता है। यह धारा बैंकों को रिजर्व बैंक के साथ पूरी तरह सहयोग करने के लिए बाध्य करती है। रिजर्व बैंक की निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार किसी भी बैंक को जमा लेने पर रोक लगा सकती है या उसे कामकाज समेटने का भी आदेश दे सकती है। क्या रिजर्व बैंक ने अपनी शक्तियों का उस समय इस्तेमाल किया जब सार्वजनिक बैंकों का कर्ज बढ़ता जा रहा था? बैंकों का कर्ज फंसने के वाकये 1980 के दशक, 2000 के शुरुआती वर्षों और मौजूदा समय में खूब हुए हैं लेकिन रिजर्व बैंक ने कभी भी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया। सवाल उठता है कि क्या दो नई धाराएं जोड़ देने से रिजर्व बैंक यह काम करने लगेगा? क्या रिजर्व बैंक के पास एनपीए को नियंत्रित करने या उसे खत्म करने के संसाधन मौजूद हैं?
 
पांचवां और अंतिम, बैंक के निदेशकों और शीर्ष प्रबंधन की फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटने में क्या भूमिका रह जाती है? अगर बैंकों के बोर्ड में बैठे हुए रिजर्व बैंक निदेशक पहले एनपीए संकट को गहराते हुए देखते रहे हैं तो भविष्य में वे आखिर क्या कर लेंगे? 
 
अगर किसी संस्थान के कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए उसमें प्रोत्साहन के आंतरिक प्रावधान होते हैं तो वह बेहतर प्रदर्शन करता है। शायद इस सरकार के लिए ऐसी व्यवस्था लागू कर पाना अधिक सुधारवादी कदम हो जाएगा। यह अध्यादेश दरअसल एक अनिच्छुक नियामक पर बाहरी आदेश के जरिये सार्वजनिक बैंकों के कारोबार को साधने की कोशिश है। अगर आप किसी बेहतर परिणाम की उम्मीद लगाए बैठे हैं तो फिर आप चमत्कार में ही यकीन कर रहे हैं। 
Keyword: loan, debt, NPA,,
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