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कर प्रशासन में सुधार की सख्त दरकार

पार्थसारथि शोम /  May 22, 2017

भारतीय कर प्रशासन को चाहिए कि वह सकारात्मक कदमों में इजाफा करे और पुरातन व्यवस्थाओं को त्याग दे। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
भारतीय कर प्रशासन ने सीमा शुल्क निकासी एवं सीमा प्रबंधन में सुधार के लिए सफलतापूर्वक प्रयास किए हैं। इस मामले में देश 2014 के 65वें स्थान से सुधरकर 2016 में 38वें स्थान पर आ गया। सीमा पार व्यापार और सुधार (मसलन कारोबार के लिए एकल खिड़की व्यवस्था) के मानकों, इलेक्ट्रॉनिक संदेश व्यवस्था, आयात और निर्यात घोषणा की डिजिटल हस्ताक्षर के साथ ऑनलाइन व्यवस्था आदि के चलते उक्त संकेतक में सुधार देखने को मिला है। 
 
प्रत्यक्ष कर प्रशासन को चुकाए गए कर का 88 फीसदी हिस्सा ई-भुगतान के जरिये चुकाया गया और 97 फीसदी रिटर्न इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किए गए। यह भी सराहनीय है। कर विभागों की ओर से संकेत है कि उन्होंने कर प्रशासन सुधार आयोग (टार्क) की अनुशंसाओं का विश्लेषण और उसका परीक्षण कर लिया है। उन्होंने इसके जिस हिस्से का क्रियान्वयन किया है या जिसे उन्होंने अपनाया है वह सब राजस्व विभाग की वेबसाइट में अपलोड किया जा रहा है। टार्क के कुछ सदस्यों ने भी इस दिशा में प्रगति के होने या न होने के बारे में चर्चा जारी रखी है। 
हालांकि इस मसले को विश्व बैंक के कर चुकाने की सुगमता संबंधी सूचकांक (ईपीटी) में ले जाना असंभव नहीं है लेकिन बेहतर यह है कि इनका परीक्षण किया जाए और यह पता किया जाए कि देश के कर प्रशासन के कार्य व्यवहार में कहां दिक्कत है? जरूरी नहीं कि ईपीटी की रैंकिंग ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हो लेकिन कुछ संकेतक ऐसे हैं जो उन इलाकों की ओर संकेत कर सकते हैं जहां सुधारों के गहन और गंभीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। 
 
भारत के ईपीटी को लेकर विश्व बैंक की समयबद्घ शृंखला पर नजर डालें तो इनमें ताजातरीन उपलब्ध वर्ष है वर्ष 2015-16। इससे एक संकेत यह भी निकलता है कि देश की समग्र रैंकिंग घटकर 172 हो गई है जबकि पिछले वर्षों में यह इससे काफी बेहतर थी। रोचक बात यह है कि ऐसा तब है जबकि हर वर्ष करदाताओं की तादाद, कर चुकाने में लिए गए समय, मुनाफे के प्रतिशत के रूप में कुल चुकाए गए कर आदि जैसे घटकों में बीते वर्षों की तुलना में सुधार आया। परीक्षण करने पर पता चला कि यह गिरावट सूचकांक में फाइलिंग के बाद वाला घटक शामिल करने से आया। इस मानक पर भारत को 100 में से महज 4.3 अंक मिले।
 
एक अन्य हिस्सा बताता है कि  फाइलिंग के बाद वाले सूचकांक में भारत का प्रदर्शन ब्रिक्स के अन्य देशों, ब्रिटेन और अमेरिका की तुलना में कैसा रहा? यह सूचकांक एक सीआईटी अंकेक्षण पूरा करने और अनुपालन में लगे समय तथा मूल्यवर्धित कर अथवा वस्तु एवं सेवाकर रीफंड पाने में लगे समय के औसत अंक पर आधारित है। भारत की बात करें तो मूल्यवर्धित कर वाला हिस्सा शामिल नहीं किया जा सका हालांकि उम्मीद यही थी कि एक बार जीएसटी के सामने आने के बाद इसे लागू कर लिया जाएगा। कॉर्पोरेट आयकर चुकाने के बाद यही होता है। इसकी वजह से ही ईपीटी सूचकांक में पिछड़ापन देखने को मिला। जाहिर सी बात है इस क्षेत्र में ध्यान देने और तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है। 
 
ईपीटी की समग्र रैंकिंग में भी भारत की स्थिति ठीक नहीं है और वह ब्रिक्स देशों में ब्राजील के अलावा सबसे बुरी स्थिति में है। सीआईटी अंकेक्षण के लिए भारत में 54 घंटे का समय लगता है जबकि ब्राजील में यह महज 38.5 घंटे है। अन्य देशों में भी यह काफी कम है। कर चुकाने की व्यवस्था को इलेक्ट्रॉनिक कर देना एक बात है और फाइलिंग के बाद की प्रक्रिया को तेज करना दूसरी बात। इसलिए क्योंकि फाइलिंग के बाद वाली प्रक्रिया में करदाता और कर अधिकारी का आपसी संपर्क टाला नहीं जा सकता है और यह उन्हें अन्य कर प्रशासन से तुलना योग्य बनाता है। टार्क ने बहुत मजबूती से इस बात पर जोर दिया कि जांच-परख और अंकेक्षण का काम पूरा करने के मामले में कर प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। अगर एक तय अवधि में काम पूरा न हो तो इसे करदाताओं के पक्ष में जाना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ है और इसमें ज्यादा समय नहीं गंवाया जा सकता है। 
 
जीएसटी को ऐतिहासिक अप्रत्यक्ष कर सुधार के रूप में पेश किया जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे सारी मूल्य शृंखला का साधारणीकरण होगा, यह सुसंगत होगी और डिजिटलीकरण होगा। परंतु कई स्तरों वाले कर ढांचे, वस्तुओं एवं सेवाओं में अंतर और कई अहम रियायतों के बाद ऐसा करना खासा कठिनाई भरा होगा। इस जटिल ढांचे की भरपाई के लिए कर प्रशासन जीएसटी के क्रियान्वयन के लिए अतिरिक्त शक्तियां ले रहा है। जीएसटी पेश होने के तत्काल बाद विश्व बैंक का पोस्ट फाइलिंग सूचकांक जीएसटी रीफंड को भी अपने घटकों में शामिल कर सकता है। ऐसे में हमें प्रतीक्षा करनी होगी कि भारत विभिन्न देशों के साथ तुलना में कहां ठहरता है। 
 
देश की कर नीति और कर प्रशासन से मेरा जुड़ाव तीन दशकों का है। ऐसे में मेरी चिंताएं स्वाभाविक हैं। मैं देखता हूं कि कर प्रशासन टार्क सदस्यों के जरिये चुनिंदा सकारात्मक प्रयास करता है। इसमें विभाग के भीतर के लोग भी शामिल होते हैं और बाहर के भी। महसूस तो यह भी होता है कि मूलभूत ढांचागत सुधार संबंधी टार्क की अनुशंसा के अहम तत्त्वों का प्रतिरोध किया गया या उनको परे कर दिया गया। इसके अलावा ऐसे नए अधिकार हासिल किए जा रहे हैं जो अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के परे जाते हैं। मसलन प्रत्यक्ष कर में नया खोज और जब्ती नियम जिसे जीएसटी या अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के तहत हुई अनुचित बातों को दूर करने के लिए लाया गया है। 
 
आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि डिस्टेंस टु फ्रंट (डीटीएफ) सूचकांक यानी कोई देश अपनी ही संभावनाओं में कहां तक आगे जा पाया है, के मामले में भी भारत काफी पीछे है। इस सूचकांक में वह केवल ब्राजील से आगे है। जाहिर सी बात है इस क्षेत्र में उत्कृष्टïता हासिल करने के लिए गहन प्रयास करने से देश अपनी संभावनाओं में और अधिक बेहतर होता चला जाएगा। मेरा मानना है कि भारतीय कर प्रशासन में यह क्षमता है कि वह एक अत्यंत किफायती व्यवस्था हासिल कर सके। इस दौरान मैं इसकी नीतियों और कदमों पर नजर रखना भी छोड़ नहीं सकता।
Keyword: income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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