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सूचीबद्घता गंवा चुके शेयरों में निवेशकों के लिए कम उम्मीद

तिनेश भसीन /  May 21, 2017

जब स्टॉक एक्सचेंज किसी कंपनी की सूचीबद्घता समाप्त कर देता है तो उसके शेयरों में रकम लगा चुके निवेशकों के लिए यह अच्छी खबर नहीं होती। उस सूरत में उन्हें इस बात की उम्मीद कम ही दिखती है कि अपने शेयरों की उन्हें अच्छी कीमत हासिल हो सकेगी। हाल ही में नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) ने 19 कंपनियों की सूचीबद्घता समाप्त की है, जिनमें डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स, कुटॉन्स रिटेल इंडिया और अंकुर ड्रग्स ऐंड फार्मा मुख्य रूप से शामिल हैं। हालांकि इन कंपनियों के शेयरधारकों की मदद के लिए प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इस बात की उम्मीद कम ही है कि निवेशकों को उन प्रावधानों का फायदा मिल पाएगा।

 
सैमको सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख उमेश मेहता कहते हैं, 'इनमें से ज्यादातर कंपनियां कॉरपोरेट प्रशासन से संबंधित चुनौतियों से जूझ रही थीं। कुछ पर भारी कर्ज भी था। कुछ ही मामलों में निवेशकों को रकम वापस मिलने की उम्मीद है। लेकिन रकम वापस मिलेगी भी तो भारी-भरकम प्रक्रिया से गुजरने के बाद। विश्लेषकों का कहना है कि जब कोई एक्सचेंज किसी कंपनी की सूचीबद्घता समाप्त करता है तो उसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि कंपनी ने सूचीबद्घता से संबंधित समझौते का उल्लंघन किया हो। हो सकता है कि एक्सचेंज ने कंपनी को मानकों पर अमल करने का सुझाव बार-बार दिया हो। अगर उसके बाद भी कंपनी बाज नहीं आती है तो एक्सचेंज को आखिरी कदम के तौर पर उसकी सूचीबद्घता समाप्त करनी ही पड़ती है। आईआईएफएल के कार्यकारी उपाध्यक्ष (बाजार एवं कंपनी मामले) संजीव भसीन का कहना है, 'नए निवेशकों को इन कंपनियों में फंसने से बचाने और पहले ही निवेश कर चुके लोगों को उनकी रकम वापस दिलाने में मदद करने के लिए पहल शुरू की गई है।'
 
अब सवाल उठता है कि निवेशक को अपने निवेश के बदले कुछ मिलेगा या नहीं। यह कंपनी की स्थिति पर निर्भर करता है और अलग-अलग कंपनी के लिए इसका जवाब अलग-अलग हो सकता है। नियम तो यही है कि जब कोई एक्सचेंज किसी कंपनी की सूचीबद्घता समाप्त करता है तो उसे अंकित मूल्य तय करने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता की नियुक्ति करनी पड़ती है। मूल्यांकनकर्ता की रिपोर्ट के आधार पर प्रवर्तक को निवेशकों से शेयर खरीदने होते हैं। यदि कंपनी का उचित बाजार मूल्य सकारात्मक है तो निवेशकों को अपने पास मौजूद शेयरों के एवज में कुछ हासिल होने की उम्मीद रहती है। प्रॉक्सी फर्म स्टेकहोल्डर्स एंपावरमेंट सर्विसेज के संस्थापक एवं बाजार नियामक सेबी के पूर्व कार्यकारी निदेशक जे एन गुप्ता कहते हैं, 'जिन कंपनियों की सूचीबद्घता खत्म की गई है, उन पर नजर डालें तो पता चलेगा कि अब तक कोई भी कंपनी निवेशकों को किसी तरह की रकम लौटाने में कामयाब नहीं रही है।' 
अन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि आपका निवेश फंस जाता है तो फौरन मायूस होकर पीछे न हट जाएं। यदि कंपनी को कॉरपोरेट प्रशासन के बजाय अन्य समस्याओं (उदाहरण के लिए अत्यधिक कर्ज) की वजह से कारोबार बंद करना पड़ा है तो इस बात की पूरी संभावना रहती है कि कोई और उसके कारोबार को खरीद ले अथवा प्रवर्तक ही उसे दोबारा जिंदा कर दे। इसीलिए तब तक इंतजार करें, जब तक एक्सचेंज सूचीबद्घता से जुड़ी प्रक्रिया पूरी नहीं कर लेता।
 
यदि आपके पास इस तरह की किसी कंपनी के शेयर पड़े हैं तो आपको स्टॉक एक्सचेंज द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में जानकारी भेजी जाएगी। इसके बाद आपको एक्सचेंज से होने वाली घोषणाओं पर पैनी नजर रखनी पड़ेगी ताकि आप इस मोर्चे पर हो रही प्रगति और दूसरे घटनाक्रम के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर सकें। पिछले साल सरकार ने कहा था कि यदि कोई कंपनी सूचीबद्घता के पैमानों पर खरी नहीं उतरती है और उसके शेयर में छह महीने से भी अधिक समय तक किसी भी तरह का कारोबार नहीं होता है तो एक्सचेंज उसके शेयर की सूचीबद्घता खत्म कर सकते हैं। नियमों में बदलाव इसीलिए किया गया था क्योंकि बड़ी तादाद में कंपनियों को 7 साल से अधिक की अवधि के लिए ट्रेडिंग से रोक दिया गया। इनमें बीएसई पर 1,021 और एनएसई पर 132 कंपनियां शामिल हैं। 
 
अगर कोई कंपनी अपनी मर्जी से सूचीबद्घता खत्म करने के लिए दरख्वास्त देती है तो वह मामला वैसा नहीं होता, जिसमें मानकों का उल्लंघन करने पर एक्सचेंज किसी कंपनी की सूचीबद्घता खत्म करता है। दोनों मामले अलग-अलग होते हैं। कंपनी अगर खुद ही सूचीबद्घता खत्म करने के लिए आवेदन करती है तो उसके पैमाने अलग होंगे और आम तौर पर निवेशक उस मामले में लाभ में ही रहते हैं।
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