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जुलाई से पहले ही पूरी कर लें तैयारी

बीएस संवाददाता /  May 21, 2017

जीएसटी के लिए खुद को तैयार करने के लिए कारोबारियों के पास अब 40 दिन का ही वक्त बचा रह गया है। नई कर प्रणाली को लेकर बरती जाने वाली सावधानियों और तैयारियों के बारे में बता रहे हैं विशेषज्ञ 

 
जीएसटी संबंधित कानूनी उलझन से कैसे बचें?
 
संभावना तो यही है कि जीएसटी के अमल में आ जाने के बाद कर संबंधी कानूनी विवाद कम हो जाएंगे। क्रेडिट शृंखला के निर्बाध होने और कर का बोझ अंतिम उपभोक्ता पर ही पडऩे से यह उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि भारत में लागू होने जा रहा जीएसटी का प्रारूप थोड़ा जटिल है और अगर कारोबारियों ने सावधानी नहीं बरती तो कानूनी रूप से विकट परिस्थितियों में फंस सकते हैं। प्रस्तावित जीएसटी कानून में पंजीकरण की भूमिका बेहद अहम होगी। लिहाजा जीएसटी के आने पर अनचाहे विवादों से बचने के लिए अपने कारोबार का पंजीकरण कराना और पुराने पंजीकरण का नवीनीकरण कराने से संबंधित फैसले की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। 
 
इसके अलावा बिना पंजीकरण वाले प्रतिष्ठानों से की जाने वाली आपूर्ति को लेकर भी बड़े पैमाने पर विवाद खड़े होने की आशंका है। जीएसटी प्रणाली के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अगर कोई पंजीकृत फर्म किसी गैर-पंजीकृत प्रतिष्ठान से आपूर्ति स्वीकार करता है तो फिर उसे ही कर का भुगतान करना होगा। अधिकांश कंपनियों में ऐसे कारोबारी लेनदेन किए जाते हैं जिनके बारे में कोई स्पष्ट नाम-पता या रसीद नहीं मौजूद होती है। लेकिन जीएसटी के तहत ऑडिट के दौरान कर अधिकारी इस तरह के लेनदेन के विवरण मांग सकते हैं। 
 
जीएसटी कानून के लागू होने पर कंपनियों को इस पहूल पर भी ध्यान देना होगा कि वस्तु और सेवा की आपूर्ति कहां की जा रही है? दरअसल अधिकांश कंपनियां आपूर्ति की जगह को लेकर उतनी तवज्जो नहीं देती हैं लेकिन जीएसटी प्रणाली में ऐसा होने पर कर के गलत भुगतान का खतरा पैदा हो जाएगा। ऐसी स्थिति में कर भुगतान को लेकर कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं। इसके अलावा वस्तुओं एवं सेवाओं के वर्गीकरण पर भी आने वाले दिनों में विवाद पैदा होने की संभावनाएं हैं। 
 
ध्यान रखें: 
 
अपने कारोबारी प्रतिष्ठान और कार्यालयों के पंजीकरण से संबंधित जानकारियों को अद्यतन कर लें
 
गैर-पंजीकृत व्यक्ति से आपूर्ति लेने की स्थिति में रिवर्स चार्ज के आधार पर कर का भुगतान करें
 
वस्तुओं की आपूर्ति से संबंधित स्थान का ध्यान रखें
 
जीएसटी पंजीकरण का सही तरीका
 
किसी कारोबारी के लिए नई कर प्रणाली जीएसटी की तरफ बढ़ाया जाने वाला पहला कदम पंजीकरण होगा। हालांकि कानूनी तौर पर पंजीकरण की अनिवार्यता तभी होगी जब कोई वस्तु या सेवा निर्धारित दायरे के पार जाती है। हालांकि ऐसा नहीं होने पर भी पंजीकरण कराने से कारोबारी क्रेडिट का हकदार बन जाएगा और आउटपुट टैक्स लगाकर ग्राहकों को सीधे उसका लाभ दे सकेगा। सरकार की तरफ से जीएसटी पंजीकरण संबंधी नियमों को अंतिम रूप दिया जा चुका है लेकिन कुछ बुनियादी मसलों के जवाब मिलने अब भी बाकी हैं। जहां कोई सेवा प्रदान की जा रही है उसका पंजीकरण वहीं पर होना चाहिए। अचल संपत्ति को किराये पर देने के मामले में भी कुछ असमंजस बना हुआ है। अगर किराये पर दी गई संपत्ति और उसका मालिक दोनों अलग राज्यों में हैं तो फिर उसके लिए पंजीकरण कहां कराना होगा? इसी तरह के सवाल सूचना प्रौद्योगिकी, बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय सेवा जैसे क्षेत्रों से भी जुड़े हुए हैं जिनमें सेवाओं का वितरण अलग-अलग राज्यों में है। (पंकित शाह के योगदान के साथ)
 
ध्यान रखें: 
 
जीएसटी प्रणाली की तरफ पहला कदम है पंजीकरण
 
अगर पंजीकरण के लिए अर्हता हासिल करने के 30 दिनों के भीतर आवेदन कर दिया जाता है तो उसी दिन से पंजीकरण प्रभावी मान लिया जाएगा
 
मौजूदा नियमों के तहत पंजीकरण के काबिल हरेक फर्म को जीएसटी के तहत पंजीकरण कराना होगा
 
किसी राज्य या केंद्रशासित क्षेत्र में स्थित एसईजेड में विभिन्न इकाइयों वाले कारोबार का सभी इकाइयों के लिए एक ही पंजीकरण से काम चल सकता है 
 
मूल्यांकन के खतरे को किस तरह कम करें
 
सिद्धांत रूप में जीएसटी को लेनदेन या रसीद की कीमत पर लगाया जाना है। लेकिन मूल्यांकन से संबंधित नियमों में कुछ अपवादों का भी जिक्र है। खास तौर पर एक ही कंपनी के भीतर हुए लेनदेन को अपवाद के दायरे में रखा गया है। इस तरह के मामलों में रसीद पर घोषित रकम तभी मान्य होगी जब रसीद पाने वाला व्यक्ति उस पर लगे जीएसटी का क्रेडिट लेने के लिए दावा करने के काबिल होगा। अगर किसी मामले में क्रेडिट नहीं है तो खुले बाजार में मूल्य (ओएमवी) के आधार पर जीएसटी की गणना होगी। ओएमवी का मतलब प्राप्तकर्ता की तरफ से चुकाई जाने वाली राशि की कीमत से है। इसमें आपूर्तिकर्ता संबंधित नहीं होता है और कीमत ही इकलौती निर्धारक होती है। वस्तुओं के मामले में ओएमवी की सामान्य तौर पर गणना की जा सकती है लेकिन सेवाओं के मामले में तुलनात्मक मूल्य निर्धारण खासा मुश्किल होगा। 
 
यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस तरह की लेनदेन में घोषित मूल्य को क्या इस तरह से स्वीकार किया जा सकता है कि प्राप्तकर्ता को रिवर्स क्रेडिट करने की जरूरत पड़े। जैसे, अगर सामान खो गया हो, नष्ट हो गया हो .ा मुफ्त नमूने या उपहार के तौर पर इस्तेमाल किया गया हो तो उसके लिए क्रेडिट देने से साफ मनाही होगी। आपूर्ति के समय सामान्य रूप से ऐसे उत्पादों को पहचाना नहीं जा सकता है लिहाजा अधिकारी अगर ऐसे मामलों में घोषित मूल्य पर सवाल उठाते हैं तो उसे साबित कर पाना एक बड़ी चुनौती होगी। 
 
दूसरी बड़ी चुनौती एक ही कंपनी के भीतर अलग-अलग कार्यालयों में होने वाले लेनदेन से जुड़ा है। यह स्पष्ट नहीं है कि क्या कर्मचैारियों के वेतन और मूल्यह्रïास जैसे मदों में होने वाले खर्च को अनिवार्य रूप से कंपनी खर्च में शामिल करना होगा या उसे तीसरे पक्ष को भुगतान के रूप में देखा जाएगा? कुछ साल पहले उच्चतम न्यायालय ने फिएट इंडिया मामले में कहा था कि बाजार में दखल बढ़ाने के लिए किए प्रयासों पर भी उत्पाद शुल्क छूट को लेकर विचार किया जा सकता है। लेकिन जीएसटी प्रावधानों में इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से आगे चलकर विवाद खड़ा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। 
 
ध्यान रखें: 
 
मूल्यांकन नियम एक ही कंपनी के भीतर हुए लेनदेन के मामले में अपवाद का प्रावधान करते हैं। 
 
सेवाओं के मामले में मुक्त बाजार मूल्य (ओएमवी) तय करना खासा मुश्किल हो सकता है। 
 
एक ही कंपनी पर लगने वाले शुल्कों को लेकर मूल्यांकन की चुनौती खड़ी हो सकती है।
 
क्रियान्वयन अड़चनों के लिए तैयारी
 
जीएसटी से संबंधित नियमों एवं प्रक्रियाओं को लेकर बाजार के भीतर काफी असमंजस और अनिश्चितता देखी जा रही है। इस संक्रमण काल में सभी कारोबारी प्रतिष्ठानों को जीएसटी के हिसाब से ढाल लेना है लेकिन महज 40 दिन का ही समय बचे रह जाने से ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा। कई बार यह कहा जा चुका है कि जीएसटी कारोबार के लिए फायदेमंद साबित होगा लेकिन इसके लिए समय से तैयारी करनी होगी। अभी तक जीएसटी के लिए नामांकन भी पूरा नहीं हो पाया है जबकि 1 जून से जीएसटी की वेबसाइट शुरू होने की समयसीमा देखते हुए अब तक नामांकन प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी। कारोबारियों को रसीद में दर्ज किए जाने वाले विवरणों के संशोधन, पंजीकरण नंबर के साथ आपूर्तिकर्ताओं की सूची में सुधार करने और जीएसटी में दाखिल किए जाने वाले रिटर्न से संबंधित तकनीकी सुधार करने होंगे। 
 
ध्यान रखें: 
 
समय से योजना बनाकर काम करने से बदलाव की प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है
 
रसीद में दर्ज किए जाने विवरणों को संशोधित करें, आपूर्ति करने वाले कारोबारियों की सूची में उनके जीएसटी पंजीकरण नंबर को भी दर्ज करें, जीएसटी रिटर्न के स्वरूप और राज्यों के हिसाब से खुद को तैयार करना होगा। 
 
सरकार की तरफ से बनाई गई जीएसटी पंजीकरण व्यवस्था का प्रायोगिक परीक्षण होना जरूरी
 
इनपुट क्रेडिट का दावा निपटान 
 
जीएसटी की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि इनपुट क्रेडिट की प्रक्रिया आपूर्ति से जुड़े लोगों के लिए कितनी सहज साबित होती है। जो लोग तय प्रारूप में समय से रिटर्न नहीं जमा करेंगे उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट से वंचित होना पड़ेगा। आपूर्तिकर्ताओं के स्तर पर करों के भुगतान और रिटर्न जमा करने से संबंधित चूक होने पर उन्हें क्रेडिट देने से मना किया जा सकता है। अग्रिम भुगतान पर कोई इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगा और कारोबारियों को वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति के समय के साथ इस भुगतान का मिलान करना होगा। अगर कोई कारोबारी तीन महीने के भीतर भुगतान नहीं करता है तो उसका इनपुट क्रेडिट वापस ले लिया जाएगा। इसके बावजूद नकदी प्रवाह को लेकर उठापटक होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। 
 
इनपुट क्रेडिट केवल कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की गई वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए ही उपलब्ध होगा। कारोबारी प्रतिष्ठानों को अपनी इनपुट सेवाओं का वर्गीकरण कारोबारी मकसद और अन्य मकसद के आधार पर करने का कष्ट उठाना होगा। इसी तरह पूंजीगत उत्पादों पर इनपुट क्रेडिट नहीं मिल सकेगा अगर करारोपण के समय ही मूल्यह्रïास का दावा कर लिया गया है। 
 
जीएसटी के तहत इनपुट क्रेडिट की व्यवस्था को ठीक से समझना कारोबारियों के ही हित में होगा। 
 
ध्यान रखें: 
 
तयशुदा प्रारूप में समय पर रिटर्न नहीं भरने वाले कारोबारियों को इनपुट क्रेडिट छोडऩा पड़ेगा
 
अग्रिम भुगतान की स्थिति में इनपुट टैक्स पर कोई भी क्रेडिट नहीं मिलेगा
 
कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल सेवाओं एवं वस्तुओं के लिए ही इनपुट क्रेडिट मिल पाएगा
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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