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राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के लिए वाम से दूरी दूर कर पाएंगी ममता बनर्जी!

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  May 21, 2017

कुछ वर्ष पूर्व भारतीय सांख्यिकी संस्थान के एक प्रोफेसर ने बांग्ला भाषा का एक रोचक विश्लेषण पेश किया। उनका कहना था कि इस भाषा में सबसे अधिक उपयोग 'न' शब्द का होता है। बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में उनके पास इस शब्द के इस्तेमाल की सबसे अधिक शक्ति होगी। दरअसल आने वाले कुछ सप्ताहों में ही राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष के उम्मीदवार का चयन किया जाएगा। 

 
ममता की पार्टी इस समय बेहतर स्थिति में है। दार्जिलिंग क्षेत्र के नगर निकाय चुनावों में पार्टी को भारी जीत हासिल हुई है। अब तक इस इलाके में तृणमूल कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं थी। भाजपा के बारे में माना जा रहा था कि वह बंगाल में अच्छा प्रदर्शन करेगी लेकिन इन चुनावों में उसे भी दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। आप कह सकते हैं कि यह केवल एक नगर निकाय का मामला है। लेकिन दिल्ली में जब भाजपा ने स्थानीय निकाय चुनाव जीते तो उसे भी तो पार्टी की व्यापक लोकप्रियता का प्रमाण माना गया था। दो जगहों पर दो मानकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। 
 
अभी नारद और सारदा मामलों के झटकों का असर गया नहीं है लेकिन इसका व्यक्तिगत रूप से ममता पर कोई असर नहीं पड़ा है। हां उनकी राजनीतिक शैली में अवश्य थोड़ा नरमी आई है। क्या वाकई ऐसा हुआ है? उनके आलोचक और अनुयायी दोनों को सन 1996 का वह दौर याद है जब ममता ने राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के कुछ उम्मीदवारों के नामांकन के वक्त सार्वजनिक रूप से आत्महत्या करने का नाटक किया था। इस कहानी को थोड़ा विस्तार से समझने की आवश्यकता है। ममता अधीर चौधरी (कांग्रेस सांसद), शंकर सिंह, सुल्तान अहमद (सांसद और पिछली संप्रग सरकार में तृणमूल के मंत्री) और रितेश दत्त का नाम विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की सूची से हटवाना चाहती थीं। ये चुनाव कुछ दिन बाद होने थे। उनका कहना था कि ये नेता असामाजिक हैं और इनका आपराधिक अतीत है। इन्हें पार्टी से टिकट नहीं दिया जाना चाहिए। पहले उन्होंने यह कहकर आलाकमान पर दबाव बनाया कि अगर इन चारों को चुनाव लड़ाया गया तो वह स्वयं चुनाव नहीं लड़ेंगी। उनके समर्थक निराश हो गए। वह शायद यही चाहती भी थीं। आखिरकार एक दिन उनके समर्थकों ने कालीघाट स्थित घर को घेर लिया। वह घर से बाहर निकलीं। उनके हाथ में काले रंग की शॉल थी। उन्होंने भावनात्मक खेल खेलते हुए आत्महत्या करने की धमकी दी। आखिरकार सौगत राय ने उन पर दबाव बनाया कि वह नामांकन दाखिल करें और चुनाव लड़ें। 
 
उनके पार्टी सहयोगी भले ही उनको समझ पाने में नाकाम रहते हों लेकिन वह इस बात को अच्छी तरह समझती हैं कि पश्चिम बंगाल में माकपा का समर्थन न करने वाले लोग दरअसल क्या चाहते हैं? उन्होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव माकपा के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ जाधवपुर से लड़ा था। उन्होंने चटर्जी को इतनी करारी शिकस्त दी कि वह दोबारा कभी वहां से चुनाव लडऩे की हिम्मत नहीं जुटा पाए। सन 1998 में ममता ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और एक ऐसी नेता के रूप में उभरीं जिसके पास राज्य में सबसे बड़ा जनाधार था। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि सत्ता में रहते हुए या सत्ता से बाहर रहते हुए वह कभी भी अपने आधार को नहीं भूलीं। वह एक सामान्य से घर में रहती हैं जिसकी छत टिन की है। पास में ही एक खुली नहर बनती है जहां मच्छर ही मच्छर हैं। वह हैंडलूम की साधारण साडिय़ां पहनती हैं, हवाई चप्पल में रहती हैं (सोनिया गांधी से मिलते समय उन्होंने सफेद हवाई चप्पल पहनी थीं)। उनके शरीर पर गहने के नाम पर केवल एक घड़ी होती है, वह भी भारतीय। वह मो ब्लांपेन और महंगी कारों की शौकीन नहीं हैं। हाल ही में उनके घर का सुधार कार्य शुरू हुआ तो वह कुछ दिन के लिए बाहर थीं लेकिन अब दोबारा लौट चुकी हैं। 
 
ममता माकपा के खिलाफ हैं। पश्चिम बंगाल में अनेक लोग हैं जो माकपा के खिलाफ हैं। उनकी आग उगलने वाली वक्तृत्व शैली यह सुनिश्चित करती है कि माकपा के खिलाफ जितनी भी शहरी या ग्रामीण जनता है वह उनके झंडे तले एकजुट हो जाए। लेकिन समस्या यह है कि कोई यह नहीं जानता है कि वह कब क्या करेंगी। ममता ने लगातार वाम धड़े के नेताओं के साथ मंच साझा करने से इनकार किया है। वह केवल वर्ष 2007 में सिंगूर समस्या के समाधान के लिए राज भवन में त्रिपक्षीय बैठक के लिए पहुंची थीं। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अब मामला राष्ट्रपति पद के लिए साझा उम्मीदवार तय करने का है। उन्होंने पहले ही सोनिया गांधी से एक मुलाकात कर ली है। सवाल यह है कि क्या विपक्ष इस पद के लिए एक साझा उम्मीदवार खड़ा कर पाएगा या नहीं? अगर ऐसा करना है तो उनको वाम के प्रति अपनी भावना बदलनी होगी। क्या ऐसा कभी हो पाएगा? ममता के सामने असली परीक्षा यही है।
Keyword: mamta, kolkata, president,,
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