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जागरूकता के अभाव में स्वर्ण योजनाओं की चमक फीकी

विमुक्त दवे / अहमदाबाद May 21, 2017

भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद (आईआईएम-ए) के इंडिया गोल्ड पॉलिसी सेंटर (आईजीपीसी) ने कहा है कि सरकार को अपनी स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (जीएमएस), सॉवरिन स्वर्ण बॉन्ड और भारतीय स्वर्ण सिक्का जैसी अपनी योजनाओं के लिए अनुचित विपणन की वजह से निवेशकों में दिलचस्पी पैदा करने में सफलता नहीं मिली और इस वजह से इन योजनाओं को लोगों की कमजोर प्रतिक्रिया हासिल हुई।

 
ये निष्कर्ष आईजीपीसी द्वारा शहरी और ग्रामीण भारत में चार राज्यों के चार जिलों में एक हजार स्वर्ण उपभोक्ताओं के बीच कराए गए शोध के निष्कर्ष में सामने आए हैं। आईजीपीसी के प्रमुख एवं आईआईएम-ए में संकाय सदस्य अरविंद सहाय ने कहा, 'हमने अध्ययन के दौरान पाया कि यदि योजना के बारे में प्रतिभागियों को पर्याप्त जानकारी दी मिले तो वे इन योजनाओं में निवेश के लिए इच्छुक हैं।'
 
अध्ययन के अनुसार 1,000 लोगों में से सिर्फ पांच ही सरकार प्रायोजित स्वर्ण योजनाओं के बारे में अवगत थे। सहाय ने कहा कि भारतीय परिवारों के पास रखे 25,000 टन सोने में से सिर्फ पांच टन को ही अब तक स्वर्ण मुद्रीकरण योजना के दायरे में लाया गया है। सहाय ने कहा, 'सरकार को स्वर्ण नीतियों को सफल बनाने के लिए तीन बातों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उचित विपणन, सोने का प्रमाणन और बैंकों को प्रोत्साहन ऐसे प्रमुख मुद्दे होंगे जिन पर सरकार को काम करना चाहिए।'
 
अन्य शोध में केंद्र ने पाया कि इमर्जिंग मार्केट एंड डेवलपिंग इकोनोमीज (ईएमडीई) केंद्रीय बैंक द्वारा रखे गए स्वर्ण भंडार की मात्रा वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद तेजी से बढ़ी है। ईएमडीई में केंद्रीय बैंकों द्वारा विदेशी एक्सचेंज की प्रतिशतता जी4 (डॉलर, येन, पाउंड और यूरो) के संदर्भ में 94 प्रतिशत से घटकर 84 प्रतिशत रह गई और ज्यादातर गिरावट की भरपाई स्वर्ण की होल्डिंग में वृद्घि के जरिये की गई है। 
 
सहाय ने कहा, 'स्वर्ण निवेश में भारी वृद्घि रूस, चीन और ब्राजील में देखी गई थी, भारत में नहीं। इस पर भी भारतीय रिजर्व बैंक को विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है।' अध्ययन के अनुसार स्वर्ण ऋण बेहद लोकप्रिय स्वर्ण-आधारित वित्तीय योजना है और अनौपचारिक स्वर्ण ऋणों का बाजार भागीदारी में बड़ा योगदान है जिसमें औपचारिक स्वर्ण ऋण प्रदाताओं के मुकाबले अधिक ब्याज दरों पर कम स्वर्ण ऋण मुहैया कराया जाता है। 
 
उन्होंने कहा, 'औसत 40 फीसदी की ऊंची ब्याज दरों के बावजूद ऋण लेने वाले लोग अनौपचारिक ऋणदाताओं से ऋण हासिल करना पसंद करते हैं क्योंकि वे बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों में ऋण के लिए सप्ताहभर की लंबी प्रक्रिया से परहेज करना चाहते हैं, हालांकि उनकी ब्याज दरें 20-25 फीसदी के बीच होती हैं।' अध्ययन में चार जिलों कोयंबटूर, कोल्हापुर, हुगली और सहारनपुर के 1,000 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था और इसमें 83 प्रतिशत प्रतिभागी पुरुष थे।
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