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आईएनएक्स: दो पूर्व नियामक प्रमुखों की भूमिका पर सवाल

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 19, 2017

विदेशी निवेश संवद्र्धन बोर्ड (एफआईपीबी) विवादास्पद लग रहे अपने एक फैसले को लेकर इन दिनों सुर्खियों में है। लेकिन अगर इस फैसले के समय निर्णायक भूमिका में रहे लोगों पर ध्यान दिया जाए तो आगे चलकर यह खबर और भी विवादित हो सकती है। एफआईपीबी के वर्ष 2007 और 2008 में लिए गए दो फैसलों को लेकर जवाबदेही तय करने की कोशिश की जा रही है।

 
एफआईपीबी 600 करोड़ रुपये तक के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रस्तावों पर गौर करने वाला अंतर-मंत्रालय संगठन है जिसमें सचिव स्तर के अधिकारी होते हैं। देश में एफडीआई लानेे के लिए किए गए उदारीकरण के बाद वर्ष 1992 में इसका गठन किया गया था। पिछले 25 वर्षों में यह कभी भी किसी बड़े विवाद का हिस्सा नहीं बना था। लेकिन इस सप्ताह जो भी कुछ हुआ वह काफी अलग और असामान्य था। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की एक जांच में इसका नाम सामने आया है। सीबीआई इन आरोपों की जांच कर रही है कि क्या टेलीविजन कंपनी आईएनएक्स मीडिया को एफआईपीबी की तरफ से तय राशि से अधिक विदेशी निवेश लेने की इजाजत देने में कोई आपराधिक साजिश रची गई थी?
 
वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सचिव की अध्यक्षता वाले एफआईपीबी ने जुलाई, 2007 में आईएनएक्स मीडिया के शेयर तीन विदेशी कंपनियों को बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इस बिक्री के जरिये 4.62 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा जुटाने का लक्ष्य घोषित किया गया था। कंपनी ने यह भी कहा था कि वह अपनी सहयोगी कंपनी में आगे और विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश करेगी। हालांकि एफआईपीबी ने 4.62 करोड़ रुपये के निवेश को स्वीकृति दे दी लेकिन यह भी कहा था कि भविष्य में निवेश के नए प्रस्ताव के लिए कंपनी को अलग से आवेदन करना होगा।
 
लेकिन एफआईपीबी की मंजूरी मिलने के बाद आईएनएक्स मीडिया में 300 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश करा लिया गया जबकि उसे केवल 4.62 करोड़ रुपये के विदेशी निवेश की ही इजाजत मिली थी। एफआईपीबी को इस गड़बड़ी के बारे में वर्ष 2008 की शुरुआत में पता चला जिसके बाद उसने आयकर विभाग को यह जानकारी दी कि वह इस मामले की पड़ताल कर रहा है। नियमों के खुलेआम उल्लंघन वाले इस मामले में बोर्ड ने आईएनएक्स मीडिया से जवाब भी तलब किया था।
 
आईएनएक्स ने अपनी सफाई में कहा कि उसे नए सिरे से आवेदन करने की इजाजत दी गई थी और एफआईपीबी ने निवेश को मंजूरी भी दे दी थी। सीबीआई की तरफ से दर्ज प्राथमिकी में कहा गया है 'वित्त मंत्रालय की अनुमति के बगैर तय सीमा से अधिक निवेश करा लेना यह दिखाता है कि मंत्रालय के अधिकारियों की तरफ से बेईमानी और बदनीयती बरती गई।'
 
लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि मंजूर सीमा से अधिक निवेश लेने पर भी उसे अनुमति देने के फैसले के पीछे क्या कोई खास कारण थे? सीबीआई की एफआईआर में एफआईपीबी के रुख में अचानक आए बदलाव पर काफी जोर दिया गया है। बोर्ड ने 2008 के शुरुआती दौर में तो इस मामले की आयकर विभाग को जानकारी दी थी लेकिन उसी साल के अंतिम महीनों में अतिरिक्त विदेशी निवेश को भी परवर्ती प्रभाव से मंजूरी दे दी। सीबीआई इस फैसले के पीछे की वजह को लेकर सवाल उठा रही है।
सामने आई जानकारियों के आधार पर निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि एफआईपीबी ने ये फैसले किस तारीख को लिए थे लेकिन इस अवधि में दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डी सुब्बाराव और अशोक चावला ही इस बोर्ड के प्रमुख रहे थे। सुब्बाराव सितंबर, 2008 के शुरुआती दिनों तक वित्त सचिव थे और उसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बना दिए गए थे। वह मई 2007 में ही आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव नियुक्त हुए थे और दो महीने बाद वित्त सचिव बना दिए गए थे। 
 
सुब्बाराव के गवर्नर बन जाने के बाद चावला को आर्थिक मामलों का सचिव बनाया गया था। वित्त मंत्रालय में ही रहते हुए उन्हें एक साल बाद वित्त सचिव नियुक्त कर दिया गया। सेवानिवृत्त होने के बाद वह अक्टूबर, 2011 में भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग के अध्यक्ष बनाए गए थे जिस पद पर वह अगले पांच वर्षों तक रहे। इन विवरणों से यह स्पष्ट है कि एफआईपीबी ने आईएनएक्स मीडिया को 4.62 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश लेने की जब मंजूरी दी थी और फिर जब उसने इस कंपनी से अधिक निवेश को लेकर सफाई मांगी थी, तब एफआईपीबी के प्रमुख के तौर पर सुब्बाराव ही आसीन थे। हालांकि यह साफ नहीं हो पा रहा है कि जब अतिरिक्त निवेश को परवर्ती प्रभाव से मंजूरी दी गई तब बोर्ड की कमान चावला के पास थी या नहीं। इन दोनों मामलों में एफआईपीबी के फैसलों पर अंतिम मुहर तत्कालीन वित्त मंत्री की ही तरफ से लगाई गई थी। यहां पर राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका सामने आती है। बहरहाल दो अहम नियामकों के प्रमुख रहे देश के दो शीर्ष नौकरशाहों के सीबीआई जांच के दायरे में आने की संभावना है। 
 
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब वित्त मंत्रालय ने एफआईपीबी को भंग करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा हुआ है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2017-18 का बजट पेश करते समय एफआईपीबी को भंग करने की बात कही थी। यह संयोग काफी अनूठा है। आर्थिक सुधारों के बाद देश में एफडीआई लाने के लिए सबसे पहले एफआईपीबी का ही गठन हुआ था। अब जब इस बोर्ड के भंग होने में कुछ समय ही रह गए हैं तो आईएनएक्स मीडिया से संबंधित उसके दो फैसलों से जुड़े हालात और उनकी वजहों के बारे में जानने को लेकर पूरा देश उत्सुक नजर आ रहा है। 
Keyword: FIPB, विदेशी निवेश संवद्र्धन बोर्ड (एफआईपीबी),
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