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अच्छा किंतु अपर्याप्त

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 19, 2017

नरेंद्र मोदी ऐसे नेताओं में से एक हैं जिनको लेकर उनके आलोचक और प्रशंसक कभी एकमत नहीं हो सकते। एक धड़ा उनको सांप्रदायिक दृष्टिïकोण वाला व्यक्ति मानता है जो आत्म प्रशंसा में लिप्त रहता है और जो ऐसे वादे करता है जिनको पूरा करने में उसकी रुचि नहीं रहती। कहा यह भी जाता है कि वह उपलब्धियों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करते हैं। दूसरा तबका उनको ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता है जो देश की अर्थव्यवस्था और समाज को बदल रहा है, देश की सभ्यता को नया रूप दे रहा है और जिसके नेतृत्व में देश एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। 

 
हमें यह मानना होगा कि दोनों पक्षों की बातों में एक हद तक सच्चाई है। अब इस बहस को अगले चरण में ले चलते हैं। हम अपनी शुरुआत इस धारणा के साथ करते हैं कि निकट भविष्य में भारत को मोदी जैसी लोकप्रियता और राजनीतिक क्षमता से संपन्न एक और नेता मिलने की संभावना नहीं है। उक्त क्षमताएं यह गुंजाइश भी पैदा करती हैं कि वह अपने कार्यक्रमों पर खरे उतर सकें। 
 
मोदी एक दशक से अधिक वक्त तक एक राज्य में मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ऐसे में जमीनी प्रशासन की उनकी समझ भी औरों की तुलना में बेहतर है। परियोजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में वह बहुत अधिक रुचि रखते हैं। तकनीक को लेकर उनका लगाव और उसे अपनाने की उनकी ललक जगजाहिर है। इसका उदाहरण, वह वित्तीय समावेशन में व्यापक बदलाव लाने की इच्छा रखते हैं और सौर ऊर्जा के नए लक्ष्य स्थापित कर रहे हैं। इसके अलावा तमाम अन्य नेताओं की तरह उनमें राजनीतिक आग्रहों का शिकार होने की प्रवृत्ति भी नहीं दिखती। निश्चित तौर पर उनमें कुछ गुणों की कमियां भी हैं। मसलन अच्छी नीति बनाने को लेकर रुचि का अभाव। इसकी वजह से वह स्वाभाविक सुधारक नहीं बन पा रहे। जैसा कि एक टीकाकार ने कहा भी था, वह सुधारक कम प्रबंधक ज्यादा हैं। इसके बावजूद, इन कमियों को छोड़ दें तो अधिकांश लोग मानेंगे कि मोदी इस स्थिति में हैं कि देश के विकास और आर्थिक वृद्घि को लेकर वह लक्ष्यों को हासिल कर सकें। 
 
लेकिन हम उनके रिकॉर्ड का आकलन करते हैं तो यहां निराशा हाथ आती है। बीते तीन साल के दौरान मोदी ने कठिन लेकिन जरूरी बदलाव हासिल करने के लिए कोई जोखिम उठाने की मंशा नहीं जताई है। गत नवंबर में नोटबंदी ही एक मात्र ऐसा कदम माना जा सकता है। वह कदम भी व्यवस्था में सुधार की दृष्टिï से उठाया गया लेकिन उसे सही मानने या न मानने पर बहस हो सकती है। कड़े फैसले लेने में उनकी अनिच्छा का एक नतीजा बैंकों के फंसे हुए कर्ज के रूप में हमारे सामने आया है। इस समस्या के निदान के लिए हल्काफुल्का हल तलाश करने की कोशिश का ही नतीजा है कि 2017 में भी हालात 2014 जैसे ही हैं। यह अवश्य है कि समस्या को अधिक पारदर्शी ढंग से देखा जा रहा है। सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में निवेश में आ रही गिरावट इसी का नतीजा है। 
 
देश के प्रतिबंधात्मक और अनुत्पादक साबित हो रहे श्रम कानूनों की समस्या से नहीं निपट पाना भी राजनीतिक जोखिम नहीं उठाने की एक और बानगी है। इसकी वजह से मेक इन इंडिया कार्यक्रम में अनुकूल प्रगति नहीं हो रही है और उन युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है जिन्होंने इसी वादे पर पार्टी को वोट दिया था। निवेश, विनिर्माण और रोजगार में कमी की बात करें तो कायदे से ऐसे विशिष्टï बहुमत वाले नेता के रहते भविष्य को लेकर आशंकाएं प्राय: नहीं होनी चाहिए। परंतु दिक्कत यह है कि मोदी का प्राथमिक लक्ष्य राजनीतिक प्रतीत होता है, न कि आर्थिक। वह भाजपा का दबदबा कायम करना चाहते हैं बजाय कि नीतिगत और आर्थिक मोर्चे पर जीत हासिल करने के। 
 
मोदी जैसे नेता के नेतृत्व में देश का रिकॉर्ड मौजूदा से बेहतर हो सकता था।  7-7.5 फीसदी की वृद्घि दर प्रतिकूल वैश्विक माहौल में ठीक है लेकिन रोजगार की जरूरतों को देखें तो यह अपर्याप्त है। मोदी सरकार के प्रवक्ताओं ने हमेशा 10 फीसदी दर की बात की है। कुछ पूर्वी एशियाई देशों ने तेज वृद्घि के दौर में इससे बेहतर प्रदर्शन किया है। इस विकास दर के साथ हम चीन का सामरिक दबदबा कैसे रोक पाएंगे? एक और वजह है जिसके चलते समय हमारे अनुकूल नहीं है। जननांकीय लाभांश हमारे हाथ से निकल रहा है। अगर मोदी सचमुच इतिहास बनाना चाहते हैं तो उन्हें कड़े फैसले लेने होंगे।
Keyword: narendra modi, development,,
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