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क्या अध्यादेश से हल होगा बैंकिंग संकट?

अजय शाह /  May 18, 2017

बैंकिंग नियमन में सबसे बड़ी चुनौती है आरबीआई के भीतर मौजूद दबाव। यह दबाव बैंकों की बुरी खबरों को दबाता है क्योंकि वे बैंकिंग नियमन और नियामक के बारे में गलत संदेश देती हैं। बता रहे हैं अजय शाह

 
नौकरशाही की विफलता की आशंका रहती है। अच्छा प्रदर्शन करने के लिए यह जरूरी है कि उद्देश्य स्पष्टï हो और जवाबदेही सुनिश्चित हो। फंसे हुए कर्ज से निपटते समय जिन निर्णयों की जरूरत होती है उन्हें लेने के लिए ऊर्जा चाहिए और मुनाफे से जुड़ी सोच। सरकारी बैंकों में ऐसा करना काफी मुश्किल है और आरबीआई में यह करना तो खासा मुश्किल है। हमें पता है कि कैसे आरबीआई को मौद्रिक अर्थशास्त्र और बैंकिंग नियमन के काम करने के लिए तैयार किया जाता है लेकिन हमें यह नहीं पता कि आरबीआई को वाणिज्यिक निर्णय लेने के लिए कैसे तैयार किया जाए। आरबीआई से यह कहना सही नहीं है कि फंसे हुए कर्ज से निपटने के क्रम में वह मोर्चा संभाल ले। बैंकों की नौकरशाही ने फंसे हुए कर्ज से निपटने में गलतियां की हैं। परंतु इसके बदले में हम आरबीआई की नौकरशाही को अतिरिक्त अधिकार देना चाहते हैं। हमें ठहरकर खुद से पूछना चाहिए कि आखिर हम क्यों मानते हैं कि आरबीआई की नौकरशाही सही निर्णय ही लेगी? 
 
फंसे हुए कर्ज से निपटना आसान काम नहीं है। इसके लिए संभावित पुनर्गठन पर बात करनी होती है। यह आकलन करना होता है कि अगर इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) लागू किया गया तो क्या बकाया वसूली हो सकती है। निजी इक्विटी फंड और रणनीतिक खरीदारों से बात करनी होती है ताकि आईबीसी लागू होने की स्थिति में वे काम आएं। पुनर्गठन के लिए एक तार्किक सोच चाहिए होती है ताकि अगर नकदी बहुत ज्यादा है तो कैसे कर्जदार की पेशकश पर समझौता किया जाए। अगर ऐसा कोई समझौता नहीं हो पाता है तो आईबीसी लागू कर विभिन्न पेशकश के बीच निर्णय करना होता है। 
 
यह काम पूरी तरह मुनाफे से संचालित वाणिज्यिक निर्णय का है जो भविष्य को लेकर लगाए गए अनुमान पर आधारित होता है। सवाल यह है कि आईबीसी मार्ग से क्या राह निकलेगी? आखिर कितना पैसा हासिल होगा और कैसे? यह नई व्यवस्था कितनी भरोसेमंद है? आज मिल रही नकदी की तुलना में इसमें कितनी रियायत की जाएगी? इससे क्या अनिश्चितताएं जुड़ी हैं?
 
दुनिया भर में बैंकों में नौकरशाही की प्रवृत्ति होती है और इस तरह के काम में वे सही साबित नहीं होते। भारत के बैंक इस मामले में खासतौर पर बुरे हैं। आरबीआई के नियमों ने बैंकों को ऐसी नौकरशाही में तब्दील कर दिया है जो आंख मूंदकर सूक्ष्म प्रबंधन नियमों का पालन करते रहते हैं। भविष्य में देखने की क्षमता, अटकल वाली दृष्टिï और जोखिम का प्रबंधन भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में नदारद नजर आता है। सरकारी बैंकों में तो हालत और बुरी है। आरबीआई और वित्त मंत्रालय के बीच उनकी नौकरशाही की सोच और सीमित है। 
 
इस काम के लिए सबसे सही जगह है निजी इक्विटी फंड। निजी इक्विटी फंड पूरी तरह निजी होता है और उसे नियमन बांध नहीं सकते। वह तेजी से कड़े फैसले लेने में सक्षम है। वहां नौकरशाही नहीं होती और निर्णय लेने वालों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन बहुत अधिक होते हैं। फिलहाल बैंकों के पास यही रास्ता है कि वे अपनी फंसी हुई परिसंपत्ति निजी इक्विटी फंड्स को बेचें।
 
आरबीआई इस काम के लिए सही जगह नहीं है। आरबीआई एक नौकरशाही व्यवस्था है जो सरकारी बैंकों से भी अधिक जटिल है। आखिर ऐसे माहौल में वाणिज्यिक निर्णय कैसे लिए जाएंगे? भविष्य को लेकर नजरिया कैसे प्रकट किया जाएगा? दो जोखिम भरे रास्तों में से एक कैसे चुना जाएगा? गलती होने पर किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? एक नियामक का मूल काम तीन नियमों से जुड़ा है जो विधायिका, कार्यपालिका और अद्र्घन्यायिक शाखाओं से संबंधित है। अपने विधायी काम में आरबीआई को एक ऐसा मैनुअल लाना चाहिए जिसमें यह शामिल हो कि नियम कैसे लिखे जाते हैं। अपनी कार्यपालक प्रक्रिया में उसे ऐसे प्रोसेस मैनुअल का पालन करना चाहिए जिसके जरिये लाइसेंस बांटे जाएं, जांच की जाए और गड़बडिय़ों का पता लगाया जाए। अद्र्घन्यायिक कार्यों में उसे साफ सुथरी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जहां एक निष्पक्ष मस्तिष्क के साथ वह दोनों पक्षों को सुने और फिर इस बात को लेकर तार्किक निर्णय दे जो एसएटी में अपील और फिर सर्वोच्च न्यायालय में टिक सके।
 
ये तीन प्रक्रियाएं बोर्ड प्रशासन और रिपोर्टिंग और जवाबदेही की कमियों से घिरी हुई हैं। फिलहाल हमारे सामने एक बड़ा काम है ऐसा आरबीआई तैयार करना जिसमें पांच सख्त और मजबूत प्रक्रियागत मैनुअल हों और वह उन पर खरा रहता हो। परंतु इन पांच क्षेत्रों में कम से कम हमारे पास जानकारी है और इस बात का अंतरराष्टï्रीय अनुभव है कि इस काम को कैसे अंजाम दिया जाए। भारतीय वित्तीय संहिता के मसौदे में पांच प्रक्रियागत मैनुअल शामिल हैं। हमारे पास इसकी व्यापक तस्वीर मौजूद है कि क्या किया जाना है। आरबीआई सुधार की चुनौतियों को देखते हुए इस संबंध में उचित प्रतिरोध आवश्यक है।
 
यहां तक कि आरबीआई सुधार की सबसे महत्त्वाकांक्षी योजनाओं की बात करें तो भी एक नियामक के अधीन वाणिज्यिक निर्णयों की कोई योजना नहीं है। हमें नहीं पता कि यह कैसे हो सकता है। ऐसा कोई भी नहीं है जिसके पास इसकी जानकारी या ऐसा अंतरराष्टï्रीय अनुभव हो जो हमें बता सके कि यह काम कैसे करना है। भारतीय वित्तीय संहिता जैसा कोई दस्तावेज नहीं है जिसमें यह करने का तय खाका मौजूद हो। बैंकिंग व्यवस्था में आरबीआई के भीतर सबसे बड़ी चुनौती है बैंकों की बुरी खबरों को छिपाना। ऐसा इसलिए क्योंकि बैंकों के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी आरबीआई की होती है। अगर आरबीआई एनपीए को लेकर वाणिज्यिक निर्णय करता है तो यह दिक्कत कम हो सकती है। आरबीआई पर ये नए बोझ लादना उचित नहीं है। उसके पास पहले ही बहुत काम हैं। बैंकों का नियमन और मुद्रास्फीति को निशाना बनाना दो ऐसे ही काम हैं। आरबीआई के शीर्ष प्रबंधन पर बोझ बढ़ाने का वक्त नहीं है। खासतौर पर वाणिज्यिक निर्णय करने संबंधी काम उसको सौंपने से उसकी दिक्कत और बढ़ जाएगी। 
 
ठोस नीतिगत विचार के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक प्रशासन में अहम प्रबंधन संबंधी प्रश्नों से निपटा जा सके। हमें हाथ हिलाकर हर काम आरबीआई पर नहीं छोड़ देना चाहिए। बल्कि हमें प्रोत्साहन, कौशल, प्रक्रिया मैनुअल और हितों के टकराव पर भी पूरा विचार करना चाहिए। हमारे देश में राज्य की क्षमता को अक्सर एजेंसियों की खामियों के चलते नुकसान उठाना पड़ा है। आरबीआई का एक सक्षम केंद्रीय बैंक और बैंकिंग नियामक के रूप में उभार को भी इन कामों की वजह से क्षति पहुंच सकती है। इसकी अतिरिक्त भूमिका का निर्वाह ठीक तरह से नहीं हो सकेगा और एक मजबूत आरबीआई बनाने की प्रक्रिया बाधित होगी।
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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