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नियम में खामी से बनेंगी गैर-कारोबारी कंपनियां

राजेश भयानी / मुंबई May 17, 2017

जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने पर प्रवर्तक एजेंसियों के लिए अनुपालना के मोर्चे पर एक अन्य चुनौती पैदा होगी। इसकी वजह कानून में कमी है, जिसमें कहा गया है कि कंपनियों को राज्य से बाहर अपनी शाखाओं में माल भेजने पर आईजीएसटी (अंतराराज्यीय जीएसटी) देना होगा। हालांकि अगर वही कंपनी मंजूरी लेकर राज्य के बाहर ग्राहकों को माल बेचती है तो उसे आईजीएसटी के भुगतान के लिए 6 महीने की मोहलत मिलेगी। 
 
इंडियन बुलियन ऐंड ज्वैलर्स एसोसिएशन के सचिव सुरेंद्र मेहता ने कहा, 'जीएसटी अधिनियम में सबसे बड़ी खामी यह है कि किसी कंपनी द्वारा राज्य के बाहर अपनी शाखा में माल भेजने पर कर का तुरंत भुगतान करना होगा, लेकिन मंजूरी लेकर ग्राहकों को माल बेचने पर कर भुगतान के लिए छह महीने का वक्त मिलेगा। इस प्रावधान से जीएसटी का भुगतान कुछ समय तक टालने के लिए कंपनियां दूसरे राज्यों में शाखाएं बंद करेंगी और गैर-कारोबारी कंपनियां बनाएंगी।'
 
भारतीय ग्राहक और उनके सलाहकार कर भुगतान कम करने, इसमें देरी और बचने के लिए हमेशा रास्ते ढूंढते हैं। जीएसटी लागू होने के बाद आभूषण, कपड़ा और ऐसे अन्य उद्योगों में कर का बोझ वर्तमान से अधिक होगा और जो इस समय कर का भुगतान नहीं कर रहे हैं, वे कर दायरे में आ रहे हैं। ये सभी ऐसे उद्योग है, जहां पुराने समय से कारोबार असंगठित है और अवैध बाजार हमेशा मौजूद रहा है। 
 
बहुत से सराफा कारोबारी दुनियाभर में अपनी दुकानें खोल रहे हैं। कपड़े में अवैध बाजार बहुत बड़ा है और अभी कपड़े पर उत्पाद शुल्क नहीं लगता है। राज्य से बाहर की शाखाओं को माल भेजने और मंजूरी लेकर राज्य के बाहर बिक्री पर कर नियमों से अनुपालन की दिक्कतें हो सकती हैं। इंडियन क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के चेयरमैन राहुल मेहता ने कहा, 'भारत में शातिर लोग आमतौर पर सरकार की नीतियों और नियमों का तोड़ निकाल लेते हैं। हालांकि जीएसटी के तहत किसी शृंखला में क्रम स्पष्ट होगा और इसलिए कर अधिकारियों की नजरों से बचना आसान नहीं होगा।' मालाबार समूह के प्रबंध निदेशक (भारतीय कारोबार) अशर ओ ने कहा कि मॉडल जीएसटी कानून के तहत देशभर में कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए चिंता का विषय एक-दूसरी जगह भेजे जा रहे माल की कीमत और जीएसटी के तहत इनपुट टैक्स क्रेडिट होगा। 
 
कपड़ा क्षेत्र को जीएसटी पर फैसले का इंतजार 
 
कपड़ा उद्योग वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर पर फैसले का इंतजार कर रहा है। फिलहाल उद्योग को यह नहीं पता कि यह दर 5 फीसदी होगी या 12 फीसदी। अभी इस उद्योग पर कोई अप्रत्यक्ष कर नहीं लगता है। यह क्षेत्र करीब 4.5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष और 6 करोड़ लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मुहैया कराता है। उद्योग का  विनिर्माण में करीब 10 फीसदी हिस्सा है। कपड़ा जिंसों का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 7 अंक का भारांश है। इस क्षेत्र में एक बड़ा अवैध बाजार है, जो कर भुगतान के दायरे से पूरी तरह बाहर है। 
 
इस समय कपड़े पर शुल्क पूरी तरह माफ है, लेकिन धागों और परिधानों पर कर लगता है। जीएसटी में इनपुट क्रेडिट का प्रावधान होगा, इसलिए सभी स्तरों पर होने वाले मूल्य संवर्धन पर कर लगेगा और यह खरीदारों से लिया जाएगा। हालांकि एक ऐसा क्षेत्र जो पूरी तरह कर के दायरे से बाहर है, उसके लिए 12 फीसदी की दर को पचाना बड़ा मुश्किल होगा। क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन राहुल मेहता ने कहा, 'पूरे क्षेत्र पर 5 फीसदी की जीएसटी दर से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और इससे स्वैच्छिक कर अनुपालना को प्रोत्साहन मिलेगा। इस वृद्धि से भारत वर्ष 2025 तक 3.5 करोड़ रोजगार सृजन और 200 अरब डॉलर का निवेश लाने का लक्ष्य हासिल कर पाएगा।'
 
उन्होंने कहा, 'अलग-अलग कर होने से कपड़े की तटस्थतता पर असर पड़ेगा। परिधान विनिर्माताओं का कम कर वाले कपड़े से परिधान बनाने की ओर रुझान बढ़ेगा। ऐसे कर ढांचे से कपड़ों को विभिन्न कर वर्गों में रखने से विवाद हो सकते हैं।' एसोसिएशन का कहना है कि कपड़े और परिधान दोनों पर जीएसटी लागू करने से कर में बढ़ोतरी होगी। अगर इस क्षेत्र में 50 फीसदी भी कर अनुपालना हुई तो 5 फीसदी की दर से सरकार को हर साल 10,850 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होगा। वर्तमान व्यवस्था में छूट, रियायत और कैसकेड टैक्स का दबदबा है। कपड़ों को केंद्रीय उत्पाद शुल्क और राज्य मूल्य संवर्धित कर से छूट मिली हुई है। परिधानों पर भी प्रभावी दर बहुत कम (1.2 फीसदी उत्पाद शुल्क और 5 फीसदी राज्य वैट) है। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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