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जीएसटी पर तमाम भ्रांतियां दूर करने की जरूरत

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 17, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन की समयसीमा पूरी होने में अब केवल कुछ सप्ताह ही बाकी रह गए हैं। ऐसे में नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के बारे में फैली आशंकाओं और उन्हें दूर करने के लिए किए गए सरकारी प्रयासों पर नजर डालने का यह माकूल समय है। जीएसटी को लेकर पहली बड़ी आशंका इसकी कई दरों और उसमें विभिन्न सेवाओं एवं वस्तुओं को रखे जाने के तरीकों को लेकर है। यह जीएसटी परिषद के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती साबित होने जा रही है। हालांकि राज्यों और विपक्षी दलों के दबाव में आकर जीएसटी की कई दरों और उसमें दी जाने वाली कई रियायतों पर सहमति जताकर राजनीतिक नेतृत्व पहले ही खासा नुकसान कर चुका है। 

 
लेकिन जीएसटी से संबंधित कानून बनाने का कार्य संपन्न हो जाने के बाद जीएसटी परिषद के सदस्य अब नई कर प्रणाली की खामियों पर बेहतर तरीके से ध्यान दे सकेंगे ताकि आगे चलकर परिषद ताकतवर उद्योग जगत और दबाव समूहों के आगे घुटने न टेके। उद्योग जगत के समूह अपने विरोधियों समेत दूसरों की कीमत पर उत्पादों और सेवाओं के लिए अधिक मुफीद दरें लागू कराने की पूरी कोशिश करेंगे। हालांकि जीएसटी की दरें जितनी कम होंगी और रियायतों का दायरा जितना छोटा होगा, विवादों की गुंजाइश उतनी ही कम होगी।
 
दूसरी आशंका यह है कि कारोबारियों पर अपने धंधे को जीएसटी के अनुकूल बनाने के लिए अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उद्योग जगत का कहना है कि जीएसटी के तहत उन्हें साल भर में कम-से-कम 37 रिटर्न जमा करने पड़ेंगे। हरेक महीने तीन रिटर्न जमा करने के साथ ही साल के अंत में एक समग्र रिटर्न भरने की बात कही जा रही है। इसके अलावा एक से अधिक राज्यों में लेनदेन करने वाले कारोबारियों को वहां पर भी यही प्रक्रिया अपनानी होगी। 
 
सरकार इन आशंकाओं को दूर करने के लिए प्रयास कर रही है। इसके लिए सरकार ने पहले ही जीएसटी नेटवर्क के लिए सूचना प्रौद्योगिकी आधारित नेटवर्क का विकास किया है। उस प्लेटफॉर्म पर जाकर कारोबारी और उद्योगपति इलेक्ट्रॉनिक तरीके से रिटर्न जमा कर सकेंगे। हालांकि कारोबारियों के दावों के उलट उन्हें हरेक महीने अपना पहला विस्तृत रिटर्न 10 तारीख तक अपलोड करना होगा और अगले दोनों रिटर्न आगत कर जमा के विवरण का मिलान होने के बाद ऑनलाइन जमा करने होंगे।
 
अगर कोई कारोबारी अपनी बिक्री के बारे में आंकड़े ध्यानपूर्वक अपलोड नहीं करेगा तो फिर मुश्किल खड़ी हो सकती है। इससे उस कारोबारी के आंकड़े बेमेल हो जाएंगे जो उससे वह उत्पाद खरीदेगा। हालांकि खरीदार फर्म सिद्धांत रूप में इसकी वास्तविक आगत कर जमा से इनकार कर सकती है। सरकार ने ऐसे विवादों के निपटारे के लिए 60 दिन का समय दिया है और तब तक आगत कर जमा संबंधी दावों को खारिज नहीं किया जा सकता है।  सरकार का तर्क यह है कि कारोबारी जगत को ऐसे वितरकों के प्रति सतर्कता बरतनी होगी जो अपने लेनदेन के बारे में विवरण ईमानदारी से अपलोड नहीं करते हैं। आखिरकार जीएसटी का एक फायदा यह भी है कि इसमें अप्रत्यक्ष कर की गणना और उसके संग्रहण में कराधान अधिकारियों की भूमिका को ही खत्म किया जा रहा है। 
 
जीएसटी नेटवर्क पर अपनी बिक्री के बारे में सही जानकारी नहीं देने वाले कारोबारियों पर कार्रवाई करने की जरूरत है जिससे खुद-ब-खुद दूसरे कारोबारियों के सामने नजीर पेश की जा सके। जीएसटी के तहत आगे चलकर सभी तरह के लेनदेन में उत्पादों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक तौल बिल को जरूरी किया जाना है। बिक्री की गलत जानकारी वाली फर्मों के लिए ई-बिल बहुत बड़ा खतरा पेश करेगा। यह व्यवस्था भी होगी कि ई-तौल बिल नहीं दिखा पाने वाले उत्पादों पर कर चोरी की कोशिश के तहत कार्रवाई की जाएगी।
 
सरकार ने जीएसटी के बारे में कारोबारियों को जानकारी देने के लिए पहले ही 30 जीएसटी सुविधा प्रदाता नियुक्त कर दिए हैं। इन सुविधा प्रदाताओं को नई कर प्रणाली के तहत अपनाई जाने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में कारोबारियों का मार्गदर्शन करने का जिम्मा सौंपा गया है। जल्द ही सरकार 30 अन्य जीएसटी सुविधा प्रदाताओं को भी नियुक्त करने जा रही है। जीएसटी के बारे में फैली एक और भ्रांति यह है कि केवल उपभोक्ताओं से सीधा संपर्क रखने वाली फर्मों को ही जीएसटी के अनुरूप अपना कारोबार ढालने की जरूरत है। इस तरह की कारोबारी फर्मों के लिए क्रियान्वयन का मतलब केवल अपनी खरीद के आंकड़े दर्ज करना और उपभोक्ताओं को की गई बिक्री का रिकॉर्ड भी जीएसटीएन प्लेटफॉर्म पर अपलोड करना है। 
 
आखिर बिक्री के एवज में उस फर्म को कर मिलेगा और खरीद के लिए उसे कर का भुगतान करना होगा। कर भुगतान और कर प्राप्ति के इस विवरण को ही रिटर्न के तौर पर दाखिल करना होगा। अगर उस फर्म ने अधिक कर जमा कर दिया है तो वह रिफंड के लिए दावा कर सकेगी। आखिर में, जीएसटी से संबंधित विधेयकों पर अब राज्यों की विधानसभाओं की मुहर लगनी है और राजनीतिक क्षेत्र में इसे लेकर अनिश्चितता जताई जा रही है। आशंका है कि क्या सभी राज्य इन विधेयकों को तय समय के भीतर अपनी स्वीकृति दे देंगे? जो राज्य 1 जुलाई के पहले जीएसटी विधेयकों को पारित नहीं कर पाएंगे, वे अपने कारोबारियों और उद्यमियों पर एक अतिरिक्त बोझ डालेंगे और उसके रिफंड का भी कोई इंतजाम नहीं होगा।
 
सवाल यह है कि अगर कोई राज्य 16 सितंबर के बाद भी जीएसटी कानून पारित नहीं कर पाता है तो फिर क्या होगा? उस स्थिति में वह राज्य मूल्य-संवद्र्धित कर (वैट) और अन्य अप्रत्यक्ष करों के आरोपण की शक्ति भी गंवा बैठेगा। दरअसल सभी अप्रत्यक्ष करों को संविधान संशोधन के तहत जीएसटी में समाहित किया जा चुका है। इसका मतलब है कि राज्यों के पास जीएसटी लागू करने के अलावा कई और रास्ता नहीं है। वैसे सिद्धांत रूप में जम्मू कश्मीर के पास इस तरह का विकल्प बचा हुआ है।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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