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भारत को चाहिए एक राजकोषीय परिषद

रथिन रॉय /  May 17, 2017

राजकोषीय परिषद को विधायिका या कार्यपालिका का हिस्सा बनाया जा सकता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं रथिन रॉय 

 
राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम)समीक्षा समिति की रिपोर्ट पर नीतिगत हलकों में चर्चा चल रही है। लेकिन एक स्वतंत्र वित्तीय परिषद कायम करने के उसके प्रस्ताव के बारे में अब तक कोई खास बातचीत नजर नहीं आई है। राजकोषीय परिषद अब 80 से अधिक देशों में संस्थागत राजकोषीय उपकरण के रूप में काम कर रही हैं। इनमें कई उभरते और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था शामिल है। इन परिषदों के पास काम करने की पर्याप्त गुंजाइश है और ऐसी परिषदों के अस्तित्व की वजह स्पष्ट है। दुनिया भर में अनियोजित सरकारी घाटा समय के साथ बढ़ता रहा है। भारत में भी यह एक बड़ी समस्या बन चुका है। उपरोक्त कानून से उसमें कुछ बेहतरी तो हुई है लेकिन उसने इसे संस्थागत रूप से ठीक नहीं किया है। 
 
भारत समेत अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय नियम तय हैं। यहां अनुभव बताता है कि इनको तोडऩे की तमाम दलीलें मौजूद हैं और सरकारें राजनीतिक कीमत और राजकोषीय अनुशासन में से हमेशा पहले वाले को चुनती हैं। सरकारें अक्सर राजस्व बढ़ाने और व्यय को नियंत्रित करने के मामले में अपनी क्षमता का बढ़ाचढ़ाकर आकलन करती हैं। राजकोषीय परिषद की मदद से सरकार की कोशिश इन चुनौतियों को एक संस्थागत हल मुहैया कराने की है। इसके लिए जरूरी विश्लेषण और तकनीकी उपाय अपनाए जाएंगे ताकि सरकार बेहतर ढंग से राजकोषीय अनुमान लगा सके और इनको अधिक विश्वसनीय तथा आम आर्थिक रुझानों के अनुकूल कर सके। ऐसा करके ही राजकोषीय ढिलाई दूर की जा सकेगी और राजकोषीय नियमों का क्रियान्वयन किया जा सकेगा। 
 
राजकोषीय परिषद कार्यपालिका या विधायिका का हिस्सा हो सकती है। अगर वह विधायिका का हिस्सा हुई तो परिषद एक निगरानी संस्था के रूप में काम करती है जहां विधायिका के पास अवसर होता है कि वह सरकार के राजकोषीय प्रस्तावों का आकलन कर सके और तब जाकर उनको मंजूरी दे। अमेरिकी कांग्रेस के बजट कार्यालय (सीबीओ) ने सन 1975 से लगातार इस भूमिका का निर्वाह किया है। यह स्वतंत्र बजटीय और आर्थिक अनुमान जाहिर करती है और विधायिका के व्यय की लागत भी प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त यह कार्यालय कार्यपालिका के खर्च की योजनाओं की निरंतरता का आकलन भी करती है। ब्रिटेन का बजट जवाबदेही कार्यालय आम लोगों के प्रति जवाबदेह होता है और इसे देश के सार्वजनिक वित्त की सही तस्वीर का आकलन करने के लिए तैयार किया जाता है। यह सीबीओ के सारे दायित्व निबाहता है और इसके अलावा उभरते राजकोषीय जोखिमों की पड़ताल और आकलन का काम भी करता है। कई अन्य ऐसे मॉडल भी हैं जहां राजकोषीय परिषद अपने स्तर पर विभिन्न सरकारी शाखाओं को रिपोर्ट करती हैं। एफआरबीएम समिति ने एक राजकोषीय परिषद की अनुशंसा की है जो वित्त मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था होगी। मेरी नजर में यह चयन भारतीय दृष्टि से समझदारी भरा है। इसकी तीन वजह हैं। 
 
पहली, हमारे संविधान में राजकोषीय भूमिका वाले संस्थानों की तादाद निश्चित है। इनमें वित्त आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अहम हैं। ये संस्थान क्रमश: अंतर सरकारी राजकोषीय मुद्दों और सरकार की राजकोषीय जवाबदेही का ध्यान रखते हैं। इनमें से पहले वाला संस्थान एक राजकोषीय खाका भी सुझाता है जिसके आधार पर पांच साल तक काम हो। इसे संसद के समक्ष पेश किया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रासंगिक संसदीय समिति भी जरूरत के मुताबिक विशेषज्ञों की राय का आह्वान कर सकती है। 
 
बहरहाल, कार्यपालिका की वित्तीय शाखा केंद्र और राज्य दोनों ही स्तरों पर संस्थागत समर्थन से वंचित है। अगर यह समर्थन होता तो उसे अपने राजकोषीय कदमों के लिए विश्वसनीय और महत्त्वपूर्ण वैधता हासिल हो पाती। देश में कार्यपालक विभागों का गठन प्रशासनिक काम करने के लिए किया गया है, न कि विश्लेषण संबंधी। विश्लेषणात्मक काम या तो तकनीकी विशेषज्ञों को आउटसोर्स किए जाते हैं या फिर समय-समय पर विषय आधारित समितियां बनाकर इनको अंजाम दिया जाता है। जैसे-जैसे हमारी अर्थव्यवस्था का विकास होता है, वैसे-वैसे नीति निर्माण की प्रक्रिया और अधिक जटिल होती जाती है। इस पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि रहती है। जाहिर है ऐसे में विश्लेषण के काम को स्थायी रूप से संस्थागत स्वरूप देने की आवश्यकता है। 
 
दूसरी बात, राजकोषीय परिषद को नीति निर्माण संस्थान बनाने का इरादा भी नहीं। यह अधिकार तो निर्वाचित सरकार को ही होना चाहिए जो विधायिका को जवाब दे। खासतौर पर जब हम राजकोषीय मामलों की बात कर रहे हों। यह राज्य का मूल कर्तव्य ठहरा। तीसरी बात, राजकोषीय परिषद को मौजूदा संस्थानों और अधिकार केंद्रों से किसी तरह की छेड़ नहीं करनी चाहिए। अगर राजकोषीय परिषद को एक विश्वसनीय संस्थान बनाना है तो उसे मौजूदा संस्थानों के ढांचे का ध्यान रखना होगा। उसके दायरे से यह परिलक्षित होना चाहिए। 
 
इन वजहों के चलते प्रस्तावित राजकोषीय परिषद के 11 में से नौ काम सरकार की निर्णय प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ाने वाली जानकारी मुहैया कराने और कठिन समय में सरकार को उपलब्ध नीतिगत विकल्प सुझाने से संबंधित हैं। परिषद दो विश्लेषणात्मक रिपोर्ट भी तैयार करेगी जिनको सार्वजनिक किया जाएगा। वृहद आर्थिक ढांचा संबंधी वक्तव्य देश की वृहद आर्थिक स्थिति का आकलन करेगा। इसे वित्त मंत्री केंद्रीय बजट के साथ पेश करेंगे। इसके अलावा एक सालाना राजकोषीय नीति रिपोर्ट तैयार की जाएगी जो उस वक्त के प्रासंगिक राजकोषीय मुद्दों से संबंधित होगी। ये सार्वजनिक दस्तावेज नीतिगत बहस और इन अहम मसलों पर होने वाले संवाद को लेकर ठोस जानकारी पेश करेंगे। 
 
राजकोषीय परिषद की आवश्यकता समय-समय पर सर उठाती रही है। कई वित्त आयोगों ने इसकी सिफारिश की है। राजकोषीय परिषद को सर्व स्वीकार्यता मिल जाएगी अगर इसकी तकनीकी, सलाहकार और सार्वजनिक सूचना संबंधी भूमिका स्पष्ट हो। यह भी साफ होना आवश्यक है कि यह कोई नीति निर्माण संस्था नहीं बल्कि एक अनिवार्य संस्थान है जो सरकार को बेहतर राजकोषीय नीति बनाने में मदद करेगा। मेरा मानना है कि मध्य और लंबी अवधि में राजकोषीय नीति की सेहत दुरुस्त रखने की दृष्टि से यह एक अत्यंत अहम अनुशंसा है। इस पर समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए। 
Keyword: FRBM, एफआरबीएम, राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम,
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