बिजनेस स्टैंडर्ड - अब बिजली इफरात में तो चुनौती भी साथ में
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अब बिजली इफरात में तो चुनौती भी साथ में

अजय शंकर /  May 16, 2017

भारत बिजली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है लेकिन अब उसे इस क्षेत्र में अतिरिक्त मांग पर ध्यान देने की जरूरत है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं अजय शंकर 

 
दशकों से बिजली की कमी और बिजली का बैकअप समाधान एक सामान्य परिपाटी बनी रही है। लेकिन आज भारत के पास बिजली उपलब्धता की विलासिता वाली स्थिति है। देश के सामने विकास के उच्च स्तर को हासिल करने की राह में एक बड़ी बाधा रही बिजली की कमी अब बीते दौर की बात हो चुकी है। यह कामयाबी बिजली उत्पादन में प्रतिस्पद्र्धी निजी निवेश हासिल करने में मिली कामयाबी का नतीजा है। पिछले दशक में निजी क्षेत्र ने बिजली उत्पादन में जितनी बढ़ोतरी की है, वह सार्वजनिक क्षेत्र के प्रदर्शन से भी बेहतर है। इस त्वरित एवं आशातीत सफलता ने देश के समक्ष नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। बिजली एक्सचेंजों में होने वाले बिजली कारोबार की अच्छी-खासी मात्रा ने बिजली दरों को वर्ष 2009 के छह रुपये प्रति यूनिट से घटाकर अब 2.50 रुपये प्रति यूनिट पर ला दिया है। कोयला-आधारित तापीय बिजली संयंत्रों की क्षमता में गिरावट आई है। कई राज्यों ने इन संयंत्रों से पैदा होने वाली बिजली क्षमता में 25-30 फीसदी कमी कर दी है। केंद्रीय बिजली प्राधिकरण ने बिजली योजना के मसौदे में कहा है कि वर्ष 2022 तक उत्पादन क्षमता में वृद्धि की कोई जरूरत नहीं है। हालांकि अभी करीब 50,000 मेगावॉट क्षमता की कोयला-आधारित बिजली परियोजनाएं विभिन्न चरणों में चल रही हैं। 
 
लेकिन इन संयंत्रों में पैदा होने वाली बिजली को बिजली वितरण कंपनियों द्वारा अनुबंध के आधार पर या परंपरागत तरीके से खरीदे जाने की संभावना कम ही है। करीब 15,000 मेगावॉट क्षमता वाली गैस आधारित बिजली परियोजनाओं में पैदा होने वाली बिजली भी महंगी होने से उनका कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। इन कारकों से निवेशकों की बड़ी पूंजी फंस जाने की समस्या खड़ी होने लगी है। बिजली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की दरकार होती है। कोयला-आधारित संयंत्रों में पैदा होने वाली एक मेगावॉट बिजली की औसत लागत पांच करोड़ रुपये पड़ती है। इसकी वजह से इन परियोजनाओं के प्रवर्तक और उनके कर्जदाता दोनों ही गहरे दबाव में हैं।
 
इस तरह के हालात से निपटने का सामान्य तरीका तो यह है कि सीमित एवं मध्यम अवधि में किस तरह और कहां अतिरिक्त मांग पैदा करने के अवसर तलाशे जाएं। भारत में बिजली क्षेत्र के लिए यह नई परिघटना है। हालांकि परंपरागत प्रतिमान से परे हटकर देखें तो बिजली में स्थायी मांग पैदा करने के लिए सार्थक संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। केंद्रीय अनुदान से प्रायोजित ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम अब लगभग पूरा होने वाला है। इसमें सभी गांवों और गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले सभी घरों को बिजली कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि जिन इलाकों में बिजली पहुंच चुकी है वहां भी सभी ग्रामीण घरों तक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने में लंबा वक्त लगेगा। उत्तर प्रदेश और बिहार के 50 फीसदी से भी अधिक घरों तक अब भी बिजली नहीं पहुंच पाई है। यह देश की कुल आबादी के करीब 25 फीसदी हिस्से के बराबर है। सरकार को सभी घरों तक बिजली पहुंचाने केे लिए संसाधनों के लिहाज से कमजोर राज्यों पर अधिक ध्यान देना होगा क्योंकि वे राज्य अपने बूते ऐसा नहीं कर पाएंगे।
 
फिलहाल चल रहे ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम में न केवल गरीब परिवारों बल्कि सभी घरों को दायरे में लाने की जरूरत है जिससे अगले दो-तीन वर्षों में ग्रामीण विद्युतीकरण का लक्ष्य हासिल किया जा सके। लेकिन इसके लिए केंद्र को अनुदान का दायरा बढ़ाना होगा। सरकार गरीब परिवारों समेत सभी घरों को योजना के दायरे में लाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा कोष से वित्तीय मदद दे सकती है। कोयले पर अधिभार की रकम से इस कोष में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे सरकार को ग्रामीण इलाकों में रोशनी के लिए इस्तेमाल होने वाले केरोसिन तेल पर सब्सिडी देने की भी जरूरत नहीं रह जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए तो अब मुख्यत: जैव-ईंधनों का ही इस्तेमाल हो रहा है। करीब 10 करोड़ अतिरिक्त घरों को इस योजना के दायरे में लाने से इन घरों में रोशनी उपकरणों के अलावा पंखों, टेलीविजन, फ्रिज और कूलर जैसे उपकरणों की भी मांग खासी बढ़ जाएगी। 
 
बिजली वितरण कंपनियों के लिए इन घरों में प्रीपेड मीटरों के साथ कनेक्शन देने का जिम्मा दिया जाए। ये मीटर अब तर्कसंगत दरों पर उपलब्ध हैं। लंबे समय से इन्हें नहीं लगाया जा सका है। इससे इस अतिरिक्त मांग को वाणिज्यिक रूप से सक्षम तरीके से पूरा किया जा सकेगा। दूरसंचार क्षेत्र में तो प्रीपेड मीटरों का इस्तेमाल काफी सफल साबित हुआ है। बिजली निर्यात की भी काफी संभावनाएं हैं। भारत अपने पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल को बिजली की आपूर्ति कर रहा है। इन देशों को अब भी बिजली के अभाव का सामना करना पड़ता है लिहाजा भारत के लिए बिजली निर्यात में बढ़ोतरी की संभावनाएं हैं। पाकिस्तान भी अपने यहां बिजली की बढ़ी जरूरतें पूरा करने के लिए थोड़े समय के लिए भारत से बिजली का आयात करता रहा है। भारत के साथ रिश्तों में तल्खी के बावजूद पाकिस्तान अपने यहां पर्याप्त बिजली उत्पादन न होने तक बिजली आयात को तरजीह दे रहा है। एक देश से दूसरे में बिजली भेजने के लिए जरूरी पॉवर इंटरकनेक्टर्स लगाने में अधिक वक्त नहीं लगता है और उनकी लागत भी अधिक नहीं आती है।
 
बिजली से चलने वाले वाहनों को प्रोत्साहन देने से तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है। इससे मध्यम अवधि में व्यापक प्रभाव पड़ेगा। अब भारत ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि जीवाश्म ईंधनों के बगैर भी वह अन्य स्रोतों से अपनी जरूरत की बिजली पैदा कर सकता है। ऐसे में अगर सभी गाडिय़ों को बिजली से ही चलाया जाने लगे तो जीवाश्म ईंधन की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। यह ग्लोबल वार्मिंग के दीर्घावधि नजरिये से बेहद वांछित परिणाम होगा। रेलवे अपने डीजल इंजनों को सिलसिलेवार तरीके से हटाकर बिजली से चलने वाले इंजनों का इस्तेमाल बढ़ा सकता है। ऐसा करने से रेलवे को काफी बचत होगी। रेलवे के भीतर बनी जड़ता को दूर करने के लिए बिजली इंजनों का इस्तेमाल अनिवार्य करने की जरूरत है। ई-रिक्शा पहले से ही बाजार में बढ़त बना रहे हैं।
 
शहरों में चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए सार्वजनिक निवेश बढऩे और बिजली चालित वाहनों की कीमतें तर्कसंगत होने के साथ ही कई तरह के प्रोत्साहन मिलने से भविष्य में बस, मिनी बस, टैक्सी और तिपहिया जैसे सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहन में तब्दील किया जा सकता है। वित्तीय अनुदान और एक साल बाद परमिट का नवीनीकरण किए जाने को केवल इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए लागू किया जा सकता है। इसे शुरुआत में महानगरों और पर्यटक स्थलों में आजमाया जा सकता है। अगर इलेक्ट्रिक वाहनों को थोक में खरीदा जाए तो उनकी कीमतें भी नीचे आ जाएंगी। जब तक इस तरह के वाहन वाणिज्यिक रूप से सक्षम न हो जाएं, सरकार की तरफ से सार्वजनिक परिवहन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों की खरीद पर वित्तीय अनुदान दिया जाए। अगर चार्जिंग में इस्तेमाल होने वाली बिजली और इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में सब्सिडी दी जाए तो इन वाहनों की परिचालन लागत भी आम वाहनों जैसी ही होगी। इससे शहरों में मौजूद प्रदूषण के ऊंचे स्तर को भी कम करने में मदद मिलेगी। इससे स्वच्छ ऊर्जा कोष से इसके लिए ली जाने वाली मदद भी न्यायोचित ठहराएगा।
 
(लेखक औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग के पूर्व सचिव हैं। वह ऊर्जा मंत्रालय में विशेष और अतिरिक्त सचिव भी रह चुके हैं।)
Keyword: power, electric,,
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