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बढ़ते बाजार में तीन बातों पर टिका दुनिया का भविष्य

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  May 15, 2017

वह बदलाव का दौर था। वह भोलेपन का पल था। वह उम्मीदों का युग था। वह 1992 का साल था जब पाक्षिक पत्रिका 'डाउन टू अर्थ' ने अपना सफर शुरू किया था। उस समय अर्थ चार्टर पर दस्तखत किए जा चुके थे जिससे वैश्विक स्तर पर पर्यावरण से जुड़े मसलों को अहमियत के संकेत मिलने लगे थे। उस समय विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) भी आकार लेने वाला था जिससे लगा था कि अब दुनिया में सभी के लिए समृद्धि के दरवाजे खुलेंगे। 

 
गरीबी, अन्याय और अफ्रीकी देशों पर कर्ज का भारी बोझ जैसे मुद्दे दुनिया के एजेंडे में शामिल थे। लेकिन तब से 25 साल बीत चुके हैं। ऐसा लगता है कि वह एजेंडा नाकाम हो चुका है। दुनिया अब अव्यवस्थित हो चुकी है और हमें उसका अहसास भी है। ऐसी स्थिति में हमें चर्चा करनी चाहिए कि अगले 25 साल हमारे लिए क्या बदलाव लेकर आने वाले हैं? मेरी राय में इस धरती पर हमारे जीवन को बनाने या बिगाडऩे में तीन बड़ी प्रवृत्तियों का अहम योगदान होगा। बदलते हुए जलवायु के साथ तारतम्य बिठाने और उसके असर को कम करने की हमारी क्षमता सबसे असरदार सिद्ध होगी। आज मौसम के बदलते मिजाज को लेकर कोई संदेह नहीं रह गया है। मौसम हाशिये पर अपनी जिंदगी बिताने के लिए मजबूर गरीबों के लिए बेहद कठोर और विनाशकारी रूप अख्तियार कर चुका है। यही वे लोग हैं जो तपती गर्मी में लू के थपेड़े खाते हैं। मौसमी घटनाओं के कारण आने वाली बाढ़, सूखा और फसल खराब होने की मार भी उन्हें ही सहनी पड़ती है। मानव जाति वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का भारी मात्रा में उत्सर्जन अब भी जारी रखे हुए है। सवाल यह है कि कल या फिर उसके अगले दिन क्या होगा? जब धरती का तापमान पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा, तब के लिए हमारे वैज्ञानिक मॉडल एकदम तैयार नहीं हैं। दरअसल हम घनघोर अनिश्चितता की ओर बढ़ रहे हैं। 
 
हमारे ग्रह की सीमाओं को लगातार तोड़ा जा रहा है। इस स्थिति में किसी को भी नहीं मालूम कि भविष्य अपने आंचल में हमारे लिए क्या समेटे हुए है? यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना हमारे लिए अपरिहार्य होना चाहिए। अब यह हमारे हाथ है कि हम इसे किस तरह अंजाम देते हैं। असुरक्षा और भय का माहौल वह दूसरी प्रवृत्ति होगी जो भविष्य की गतिविधियां तय करेगी। आज हम दुनिया में एक तरह की आभासी टूटन देख रहे हैं। 
 
निस्संदेह बीते 25 वर्षों में हमारी दुनिया में असमानता केवल बढ़ी ही है। धनी लोग और अधिक समृद्ध होते चले गए हैं जबकि बाकी लोग इस अभिशाप से मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। इस आर्थिक असुरक्षा का सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान की राजनीति के साथ तेजी से घालमेल हो रहा है। ऐसे में  लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है और अब खतरनाक हो चला है। हमें फिर नहीं मालूम कि असुरक्षा के इस भाव का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा? मौजूदा दौर में इसके चलते एक तरफ तो संरक्षणवाद की मांग तेज हो रही है वहीं युद्ध का उन्माद भी बढ़ रहा है। आज हम जिस मुहाने पर खड़े हैं, वहां से आखिर हमें कौन और किस तरह से वापस लेकर आएगा? संरक्षणवाद का मतलब कहीं यह तो नहीं है कि देश स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में ही निवेश करेंगे और वहीं से प्रगति की राह पकड़ेंगे? क्या स्थानिकता से समावेशी विकास का रास्ता खुलेगा या उससे स्थानिकता को ही बढ़ावा मिलेगा? इसका जवाब भविष्य के गर्भ में ही छिपा है।
 
तीसरी प्रवृत्ति तो काफी हद तक वास्तविक है। यह हमारे लोकतंत्र से नहीं बल्कि हमसे जुड़ी है। इस बाजारवादी विकास के दौर में लोकतंत्र का जो स्वरूप बना है, उसमें ऐसा लगता है कि हमारे जैसे तमाम लोग हवा में हैं। हम सभी सोशल मीडिया के ही जरिये अपनी सक्रियता दिखा रहे हैं। यह हमारे प्रभाव का चक्र है। लेकिन हम गलत दिशा में जा रहे हैं। भविष्य सुनिश्चित करने के लिए हमारा जोर तकनीकी प्रगति के ऐसे इस्तेमाल पर होना चाहिए कि वह सभी की जरूरतें पूरी करने के साथ ही निरंतरता भी कायम रख सके। फिलहाल तो हम इसे सही तरीके से नहीं कर पा रहे हैं। 
 
मूकदर्शकों की तरह हम तकनीक को अपनी जिंदगी और आजीविका पर नियंत्रण स्थापित करते हुए देख रहे हैं। स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे कामकाज के तरीके बदल रहे हैं। लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि इन तकनीकी बदलावों का रोजगार उत्पादन की क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? इस बात पर भी कोई बहस नहीं हो रही है कि ये तकनीकी बदलाव सभी लोगों की जरूरतों को किस तरह से पूरा कर सकते हैं?  
 
हम कॉर्पोरेट एजेंडे को लोकतंत्र चलाने की इजाजत दे रहे हैं और हमें अपनी खोई हुई जगह पाने की जद्दोजहद भी नहीं दिख रही है। यह सशक्त अंतर्धारा पूरी दुनिया को एक ही दिशा में खींच रही है और इस पर लगाम लगाने के लिए लोग अपने गुस्से, खीझ और हताशा को मतपत्र के जरिये व्यक्त कर रहे हैं। तेजी से ध्रुवीकृत, असुरक्षित व विचारशून्य हो रही इस दुनिया में धुर-वामपंथ और धुर-दक्षिणपंथ उभार पर हैं। अगले 25 वर्षों के दौरान हमें राज्य, बाजार और समाज के सवाल पर नए सिरे से सोचना होगा। हम राज्य को विखंडित कर चुके हैं, बाजार को बढ़ाते जा रहे हैं और ऐसा मानते हैं कि हमने समाज का सशक्तीकरण किया है। हम ऐसा मान बैठे हैं कि लोग बाजार के ही हिसाब से अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे। 
 
लेकिन हम यह पूछना भूल गए कि कौन सा समाज किसके लिए सशक्त हो रहा है? इस तरह धीरे-धीरे राज्य, बाजार और उपभोक्तावादी समाज के विभेद कम होते चले गए हैं और आखिर में एकाकार हो गए है। इस चक्र के बाहर खड़े किसी शख्स को लेकर कोई भी फिक्र नहीं है। धीरे-धीरे उसका वजूद खत्म किया जा रहा है। लेकिन ऐसे नहीं चल सकता है। यह हमारे भविष्य के लिए सबसे अहम भावी एजेंडा है। कुल मिलाकर अगले 25 साल में निर्माण या विनाश हमारे हाथ में ही हैं। लेकिन इतना तो तय है कि अगर हम अपने अतीत की गलतियों से सबक लेते हैं और सूझबूझ के साथ आगे बढ़ते हैं तो हम बदलाव की दिशा मोड़ सकते हैं। हमें मिलजुलकर साझा एजेंडे पर आगे बढऩा होगा। 
Keyword: poverty, market,,
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