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घटे रोजगार, बढ़े सुधार मगर लोकप्रियता बरकरार

अरुप रायचौधरी और अर्चिस मोहन / नई दिल्ली 05 14, 2017

नजर कदम दर कदम

नरेंद्र मोदी सरकार 26 मई को अपने कार्यकाल का 3 साल पूरा करने जा रही है। इस दौरान कड़ी-दर-कड़ी सरकार के कामकाज का जायजा पेश किया जा रहा है

वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने जनता, विशेष रूप से युवाओं को लुभाने के लिए अपने भाषणों में रोजगार, सुधार और 'अच्छे दिनों' का वादा किया था। अब मोदी को सत्ता में आए तीन साल हो गए हैं और इस दौरान उनका काम मिला-जुला रहा है। विनिर्माण में सुधार के कुछ संकेत दिखाई दे रहे हैं। निर्यात में कोई सुधार नहीं आया है, लेकिन इसकी वजह मोदी सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं। सरकारी प्रयासों विशेष रूप से सिंचाई सुविधाओं में सुधार के बावजूद कृषि क्षेत्र मुश्किलों से बाहर नहीं आया है। असल समस्या यह है कि पिछले तीन वर्षों के दौरान रोजगार वृद्धि की दर में भारी गिरावट आई है, जिसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। 

सरकार को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है और विपक्षी नेतृत्व पूरी तरह निष्प्रभावी है। लेकिन 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के 1,100 दिनों बाद भी लोगों को मोदी के वादों पर भरोसा है। हाल में उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत के बाद मोदी की लोकप्रियता में और इजाफा हुआ है। ऐसा होना लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में दुर्लभ है। वर्ष 1971 की प्रसिद्ध जीत के बाद न इंदिरा गांधी और न ही 1984 की प्रचंड जीत के बाद राजीव गांधी सत्ता में तीन साल बाद जनता के बीच इतने लोकप्रियता बरकरार रख पाए थे। 

मोदी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा सबूत नोटबंदी का फैसला था। इससे क्या लाभ हुआ, इसका छह महीने बीतने के बाद भी पता नहीं चल पाया है। लेकिन मतदाताओं को भरोसा है कि इससे गरीबों को फायदा हुआ और अमीरों पर तगड़ी चोट पड़ी है। इस बात का पहले से ही अनुमान था कि 30 साल बाद बनी पूर्ण बहुमत की यह सरकार साहसी आर्थिक फैसले लेगी, जो पिछले कुछ दशकों की कमजोर गठबंधन सरकारें नहीं ले पाई थीं। ऐसा नहीं है कि इस सरकार ने सुधारों के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं, लेकिन इन्हें बहुत ही सफाई से गरीब कल्याण के रूप में पेश किया गया है। 

यहां तक कि स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को भी 'गरीब कल्याण' के रूप में पेश किया जा रहा है। मोदी सरकार के तीन साल के आंकड़े मिली-जुली तस्वीर पेश करते हैं। इस सरकार का एक सकारात्मक पहलू यह है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने में सफल रहे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में राजकोषीय घाटा 2016-17 में घटकर 3.5 फीसदी पर आ गया है, जो वित्त वर्ष 2013-14 में 4.5 फीसदी था। 

सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा पूंजीगत खर्च का बोझ उठाए जाने के बावजूद सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने में सफल रही है। सकल स्थायी पूंजी निर्माण 2013-14 में 2.1 फीसदी बढ़ा था, जो 2015-16 में 6.1 फीसदी पर पहुंच गया। हालांकि इसमें 2016-17 में 0.6 फीसदी आने का अनुमान है, जिसकी वजह निजी क्षेत्र द्वारा कम पूंजी खर्च किया जाना है। मुख्य खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लक्ष्य दायरे की ऊपरी सीमा के भीतर रही है। असल में यह अप्रैल में गिरकर 2.99 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर आ गई। वहीं नोटबंदी के बावजूद जीडीपी वृद्धि दर 7.1 फीसदी रहने का अनुमान है। हालांकि बैंकिंग तंत्र में करीब 7 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज से निपटना आगामी दो साल में मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती होंगे। बैंकों के कुल कर्ज में फंसे कर्ज यानी एनपीए का प्रतिशत 2012-13 में 3.2 फीसदी था, जो 2015-16 में बढ़कर 8.4 फीसदी हो गया। 

बैंकों की सकल ऋण वृद्धि तेजी से घटी है। यह 2013-14 में 14 फीसदी थी, जो 2016-17 में गिरकर 7.4 फीसदी पर आ गई है। भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने कहा, 'एनपीए ऐसा मसला है, जिससे सरकार को इसी कार्यकाल में निपटना होगा।' घोष ने कहा कि मोदी सरकार के पहले तीन वर्षों में सुधारों की रफ्तार में भारी तेजी आई है। उन्होंने कहा, 'छोटे-छोटे सुधारों के बाद अब सरकार ने जीएसटी और दिवालिया कानून जैसे बड़े सुधारों पर कदम बढ़ाए हैं।'

लेकिन वैश्विक हालात के चलते कुछ उद्योगों में रोजगार सृजन सुस्त है और आगे भी रहेगा। उन्होंने कहा, 'वित्तीय सेवाएं और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में स्वचालन और विलय की स्थिति को देखते हुए रोजगार सृजित करना मुश्किल है। सरकार ने मुद्रा और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं के जरिये उद्यमिता को बढ़ावा देने की कोशिश की है।' सरकार रोजगार वृद्धि के आंकड़ों को लेकर बहसबाजी में नहीं पडऩा चाहती है, लेकिन उसका दावा है कि मुद्रा योजना से उद्यमिता को बढ़ावा मिला है और सरकार ये आंकड़े संकलित नहीं कर सकती है। इस योजना के 7 करोड़ से अधिक लाभार्थी हैं। गो रक्षक के रूप में सामाजिक अराजकता और छिटपुट जातिगत और सांप्रदायिक झगड़े चिंता का विषय हैं। हाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जातिगत झगड़े इसका सबूत हैं। रोजगार वृद्धि को बढ़ावा देने और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की संरक्षणवादी बयानबाजी का जवाब देने के लिए मोदी सरकार एक मेगा पॉलिसी के बारे में विचार कर रही है, जिसमें कुछ अहम क्षेत्रों में कच्चा माल घरेलू बाजार से खरीदना होगा। 

फरवरी 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार के बाद मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध हुआ। सूट-बूट की सरकार के रूप में आलोचना हुई और उसे अमीरों की सरकार कहा गया। इसके बाद प्रधानमंत्री ने सबसे सुरक्षित चुनावी दांव 'गरीब कल्याण' को अपनाया और बदलाव व सुधार के अपने सुर बंद कर दिए। केंद्र का कम से कम अपने बयानों में सुधारों के बजाय लोकलुभावन की तरफ लौटने का सबसे बड़ा सबूत महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम है। लोक सभा में अपनी जीत के कुछ महीने के भीतर ही मोदी ने ग्रामीण रोजगार योजना को संप्रग की लोकलुभावन नीतियों की असफलता का 'जीता जागता स्मारक' बताया था। लेकिन 2015 में दिल्ली और उसके बाद बिहार में हार के बाद सरकार का रुख बदला। 

आंकड़ों के मुताबिक मोदी सरकार के तहत इस योजना पर अब तक सबसे ज्यादा पैसा खर्च हुआ है। मनरेगा पर 2014-15 में 32,500 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जिसका 2016-17 का संशोधित अनुमान 47,500 रुपये है। इससे इस योजना पर खर्च में 46 फीसदी बढ़ोतरी का पता चलता है। वर्ष 2017-18 के लिए 48,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। हालांकि श्रमिकों को मजदूरी के भुगतान में देरी आम बात हो गई है और कहा जा रहा है कि देरी के एवज में कामगारों को दिए जा रहे हर्जाने को केंद्र कम करके दिखा रहा है।

मोदी सरकार के तीन बजट, विशेष रूप से 2017-18 का बजट गरीब केंद्रित रहा है। बजट में 5 लाख रुपये से कम आय वालों के लिए आयकर कम किया गया है। एमएसएमई क्षेत्र को मद्देनजर रखते हुए कंपनियों पर कर में कटौती की गई है। ग्रामीण क्षेत्र और किसानों के लिए प्रोत्साहनों की घोषणा की गई है। 

इस एजेंडे को भाजपा की राज्य सरकारों ने भी आगे बढ़ाया है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अप्रैल में किसानों का 36,000 करोड़ रुपये का ऋण माफ किया है। लेकिन सुस्त औद्योगिक गतिविधियों, जीएसटी लागू करने के सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों पर संभावित असर और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थितियों को देखते हुए मोदी सरकार के लिए अगले दो साल में रोजगार वृद्धि सुनिश्चि करना एक अहम चुनौती होगी। 

अगर इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनाव 'गरीबी हटाओ' के नारे से जीते थे तो मोदी और भाजपा ने 2019 के चुनावों में जाने से पहले 'गरीब कल्याण' को मूलमंत्र बना लिया है। इस समय विपक्ष में एक भी ऐसा नेता नहीं है, जो जनता की नजरों में मोदी के कद का है। इसका मोदी को फायदा मिल रहा है। इसके अलावा अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के वादे सहित हिंदुत्व के एजेंडा की स्वीकार्यता भी बढ़ रही है।
Keyword: लोकसभा, चुनाव प्रचार, नरेंद्र मोदी, रोजगार, विनिर्माण, निर्यात, सिंचाई, कृषि क्षेत्र, भ्रष्टाचार,
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